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    अरावली में मिट्टी का तेज क्षरण: 2017-2024 में 13.8% सालाना नुकसान, निर्माण-खनन से 53% बढ़ा बिल्ट-अप क्षेत्र

    Updated: Sat, 21 Mar 2026 10:33 PM (GMT+05:30)

    अरावली श्रृंखला में अवैध निर्माण और अंधाधुंध खनन से पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हो रहा है। एक अध्ययन के अनुसार, 2017-2024 के बीच मिट्टी का क्षरण सालाना 1 ...और पढ़ें

    आईआईटी खड़गपुर और ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि अरावली वन क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र में 53 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

    आईआईटी खड़गपुर और ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि अरावली वन क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र में 53 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 

    HighLights

    1. अरावली में 13.8% सालाना मिट्टी का क्षरण बढ़ा।

    2. अवैध निर्माण से निर्मित क्षेत्र 53% तक बढ़ा।

    3. केवल पेड़ लगाना समस्या का समाधान नहीं।

    राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। उत्तर-पश्चिमी भारत में फैली 692 किलोमीटर लंबी अरावली श्रृंखला दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के लिए प्राकृतिक ढाल की तरह कार्य करती है। यह थार मरुस्थल की रेत को रोकती है। साथ ही कार्बन कणों एवं अन्य प्रदूषकों को भी रोकने में मदद करती है।

    यह भूजल को रिचार्ज करती है तथा कई दुर्लभ वनस्पतियों और वन्यजीवों को सुरक्षित आवास प्रदान करती है लेकिन अवैध निर्माण और अंधाधुंध खनन के कारण इसका पारिस्थितिकी तंत्र लगातार कमजोर हो रहा है।

    यही कारण है कि बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के बावजूद अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। यदि इस महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला को इसी तरह नष्ट किया जाता रहा, तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे।

    प्राचीन पर्वत की मिट्टी लगातार कमजोर हो रही

    ‘डाउन टू अर्थ’ के अनुसार, आईआईटी खड़गपुर और ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि यहां निर्मित क्षेत्र में 53 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस कारण वर्ष 2017 से 2024 के बीच प्रति वर्ष औसतन मिट्टी के क्षरण में 13.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यानी निर्माण और मानवीय गतिविधियों के कारण इस प्राचीन पर्वत की मिट्टी लगातार कमजोर हो रही है।

    भूमि की गुणवत्ता और पारिस्थितिकी प्रभावित

    इस शोध में वर्ष 2001 से 2021 के बीच भूमि उपयोग एवं भू-आवरण में आए बदलावों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के अनुसार, तेज ढलान वाले क्षेत्र, कमजोर मिट्टी वाले स्थान तथा खनन प्रभावित इलाके मिट्टी कटाव के प्रमुख हाटस्पाट हैं। इन स्थानों पर मिट्टी का तेजी से क्षरण होने के कारण भूमि की गुणवत्ता और पारिस्थितिकी दोनों पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

    वर्षा का जल सीधे बहकर मिट्टी को साथ ले जा रहा

    इसी अवधि में अरावली क्षेत्र में वन क्षेत्र 30.62 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 264.62 वर्ग किलोमीटर हो गया। वहीं, झाड़ीदार क्षेत्र में लगभग 2,911 वर्ग किलोमीटर की बड़ी कमी आई। वन क्षेत्र में वृद्धि के बावजूद मिट्टी का कटाव कम नहीं हुआ है। इसका अर्थ है कि बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने से निर्माण तथा खनन के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं हो पा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब जमीन पर कंक्रीट और पक्के ढांचों की संख्या बढ़ने से मिट्टी की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली क्षतिग्रस्त हो जाती है। इससे वर्षा का जल सीधे बहकर मिट्टी को साथ ले जाता है।

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    अरावली की पारिस्थितिकी तंत्र को नहीं बचा पाएंगे

    अध्ययन में इस बात पर बल दिया गया है कि यदि अरावली में तेजी से बढ़ते निर्माण और खनन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह क्षेत्र आने वाले समय में मिट्टी, जल स्रोतों और जैव-विविधता के लिए गंभीर संकट का कारण बन सकता है। यही भी कहा गया है कि सिर्फ पेड़ लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक बड़े स्तर पर भूमि उपयोग में हो रहे बदलाव जैसे कि निर्माण, खनन और शहरी विस्तार को नहीं रोका जाएगा, तब तक छोटे-मोटे प्रयास अरावली के पारिस्थितिकी तंत्र को नहीं बचा पाएंगे।

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