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    दिल्ली में प्रदूषण संकट: 2024-25 में रही सबसे गंदी हवा, सर्दियों में एक बार भी नहीं बही 'स्वच्छ वायु'

    Updated: Wed, 11 Mar 2026 08:00 PM (GMT+05:30)

    'क्लाइमेट ट्रेंड्स' के विश्लेषण के अनुसार, 2024-25 में दिल्ली भारत का सबसे प्रदूषित शहर रहा, जहाँ PM 2.5 का स्तर सर्वाधिक था। सर्दियों में एक भी दिन ह ...और पढ़ें

    गैर सरकारी संस्था 'क्लाइमेट ट्रेंड्स' के एक नए विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2024-25 के दौरान दिल्ली भारत का सबसे प्रदूषित शहर रहा है।

    गैर सरकारी संस्था 'क्लाइमेट ट्रेंड्स' के एक नए विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2024-25 के दौरान दिल्ली भारत का सबसे प्रदूषित शहर रहा है।

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    राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। गैर सरकारी संस्था 'क्लाइमेट ट्रेंड्स' के एक नए विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2024-25 के दौरान दिल्ली भारत का सबसे प्रदूषित शहर रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में पीएम 2.5 का वार्षिक स्तर सबसे अधिक दर्ज किया गया और सर्दियों के दौरान यहां ''गंभीर'' श्रेणी वाले वायु प्रदूषण का लंबा दौर देखा गया। इस सूची में बिहार की राजधानी पटना दूसरे स्थान पर रही।

    प्रमुख शहरों का विश्लेषण

    केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन में दिल्ली, पटना, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे छह प्रमुख शहरों का विश्लेषण किया गया है। शोधकर्ताओं ने मौसम संबंधी स्थितियों और स्थानीय उत्सर्जन के बीच के अंतर को स्पष्ट किया।

    • दिल्ली की स्थिति : स्थानीय उत्सर्जन और क्षेत्रीय कारकों के कारण दिल्ली राष्ट्रीय स्तर पर सबसे गंभीर प्रदूषण संकट का सामना कर रही है। यहां ''आपातकालीन'' श्रेणी वाले दिनों की संख्या सबसे अधिक रही।
    • पटना का संकट : रिपोर्ट में पुष्टि की गई है कि पटना दिल्ली के बाद दूसरा सबसे प्रदूषित शहर है। गंगा के मैदानी इलाकों में वायुमंडलीय स्थिरता के कारण यहां पीएम 2.5 का स्तर लगातार उच्च बना हुआ है।
    • दक्षिण भारत में बदलाव : ऐतिहासिक रूप से कम प्रदूषित माने जाने वाले बेंगलुरु और चेन्नई में भी सर्दियों के महीनों में वायु गुणवत्ता में गिरावट देखी गई है, जो एक नई चिंता का विषय है।

    स्वच्छ वायु दावों की जमीनी हकीकत उजागर

    'क्लाइमेट ट्रेंड्स' के इस विश्लेषण ने भारत के स्वच्छ वायु दावों की ज़मीनी हकीकत भी उजागर की है। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में सर्दियों के दौरान एक भी दिन हवा 'साफ' नहीं रही, इसके बावजूद वार्षिक आंकड़ों में सुधार का दावा किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान मापदंड मौसमी उछाल को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, जिससे जनता पर पड़ने वाला असली स्वास्थ्य जोखिम छिप जाता है। इसके अनुसार हवा की गुणवत्ता केवल धुएं (उत्सर्जन) से तय नहीं होती। डेटा बताता है कि मौसम बदलने मात्र से प्रदूषण का स्तर 40 प्रतिशत तक ऊपर-नीचे हो सकता है।

    मौसम और प्रदूषण का संबंध

    आईआईटी दिल्ली के वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र के प्रमुख साग्निक डे के अनुसार, उत्तर भारत के शहरों में हवा की गति एक मीटर प्रति सेकंड से कम होने और उच्च आर्द्रता के कारण प्रदूषण के कण हवा में ही रुक जाते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान 'राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम' (एनसीएपी) के मूल्यांकन में मौसम के प्रभाव को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, जिससे नीतिगत प्रभावशीलता का गलत आकलन हो सकता है।

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    सुधार के सुझाव

    रिपोर्ट में एनसीएपी के तीसरे चरण के लिए महत्वपूर्ण सुधारों का प्रस्ताव दिया गया है, जिसमें शामिल हैं...

    • सर्दियों के लिए अलग प्रदूषण लक्ष्य निर्धारित करना।
    • मौसम के अनुरूप गतिशील कार्ययोजना तैयार करना।
    • पूरे 'एयरशेड' (क्षेत्रीय वायु क्षेत्र) को आधार बनाकर एकीकृत योजना बनाना।

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