दिल्ली के होटल अग्निकांड में 21 मौतों का असली गुनाहगार कौन? DDA और MCD के नाकारापन की इनसाइड स्टोरी
दिल्ली में हादसों की मुख्य वजह डीडीए और एमसीडी की अकर्मण्यता और लापरवाही है। नियोजित विकास की विफलता और अवैध निर्माणों पर आंखें मूंदने से जान-माल का न ...और पढ़ें

मालवीय नगर में 21 मौतों का असली गुनाहगार एमसीडी और डीडीए है। फोटो: पीटीआई
HighLights
डीडीए की नियोजित विकास में विफलता, अवैध कॉलोनियों का बढ़ना
एमसीडी द्वारा अवैध निर्माणों पर आंखें मूंदना, भ्रष्टाचार का बोलबाला
अधिकारियों पर आपराधिक लापरवाही के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। देश की राजधानी में सरकारी एजेंसियों की अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार और लापरवाही सीधे तौर पर दिल्लीवासियों की जान पर भारी पड़ रही है।
डीडीए ने दिल्ली का नियोजित विकास किया होता और एमसीडी ने अवैध निर्माण पर कड़ा प्रहार किया होता तो आए दिन इमारत गिरने या आग लगने से सैकड़ों लोगों की मौत नहीं होती और आज दिल्ली की सूरत अलग होती।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक लचर टाउन प्लानिंग और अवैध निर्माण को आपराधिक लापरवाही के दायरे में लाकर डीडीए और एमसीडी के शीर्ष अधिकारियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक ऐसे हादसों में मासूमों की जान यूं ही जाती रहेगी।
ये हादसे सरकारी एजेंसियों की भारी चूक
शहरी योजनाकारों का मानना है कि दिल्ली में होने वाले बड़े हादसों जैसे फैक्ट्रियों और रेस्त्रां-होटलों में आग लगने या इमारतों के ढहने के पीछे सरकारी एजेंसियों की भारी चूक है।
दिल्ली का मास्टर प्लान तैयार करने वाली संस्था डीडीए राजधानी की बढ़ती आबादी के अनुपात में नियोजित व्यावसायिक व रिहायशी स्पेस देने में पूरी तरह नाकाम रही है।
MCD की नाक के नीचे चल रहे अवैध निर्माण
जब लोगों को वैध और सुरक्षित जगहें नहीं मिलतीं तो वे अवैध कालोनियों और तंग गलियों की तरफ रुख करते हैं। दिल्ली के हर कोने में धड़ल्ले से चल रहा अवैध निर्माण एमसीडी की नाक के नीचे होता है।
बिना सुरक्षा मानकों, बिना वेंटिलेशन और बिना फायर एनओसी के बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो जाती हैं। जब कोई बड़ा हादसा होता है तो एमसीडी केवल कारण बताओ नोटिस जारी कर या एक-दो कर्मचारियों को निलंबित कर पल्ला झाड़ लेती है।
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नक्शा पास करते वक्त मूंद लेते हैं आंख
डीडीए के पूर्व योजना आयुक्त एके जैन कहते हैं, डीडीए के मास्टर प्लान में एक नियोजित शहर के विकास की दृष्टि से सभी कुछ होता है, लेकिन उसका क्रियान्वयन ईमानदारी से नहीं हाेता।
वहीं, भ्रष्टाचार के चलते एमसीडी नक्शा पास करने में आंखें बंद कर लेती है तो अग्निशमन विभाग भी फायर एनओसी देने में सख्ती से मानकों के पालन पर ध्यान नहीं देता। पुलिस की भूमिका से भी सभी वाकिफ हैं।
इसे लेकर कोई सख्त कानूनी व्यवस्था बननी चाहिए। समय-समय पर निगरानी हो और कार्रवाई करने के लिए हादसे का इंतजार नहीं किया जाए तो हालात कुछ सुधर सकते हैं।
मल्टी एजेंसी सिस्टम है दिल्ली की बड़ी समस्या
डीडीए के पूर्व उपाध्यक्ष बलविंदर कुमार कहते हैं कि दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या मल्टी एजेंसी सिस्टम है। डीडीए, एमसीडी, जल बोर्ड, अग्निशमन विभाग, पुलिस इत्यादि... कोई कुछ करता है तो कोई कुछ।
इसके चलते किसी की जवाबदेही तय नहीं हो पाती और सभी बच निकलते हैं। कानून में खामियां भी उनकी मददगार बन जाती हैं। राष्ट्रीय राजधानी की बेहतरी के लिए विभिन्न विभागों की एक एकीकृत एजेंसी बनाना बहुत जरूरी है।
साथ ही लीगल फ्रेमवर्क बनाया जाना भी आवश्यक है। ऐसे मामलों में दोषी अधिकारियों के विरुद्ध सख्त से सख्त एक्शन लिया जाना चाहिए। एमसीडी का राजनीतिकरण भी बंद होना चाहिए। वहां पर हर स्तर पर राजनीतिक हस्तक्षेप पूरे सिस्टम को बिगाड़कर रख देता है।
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