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    सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 41 साल पुरानी एमसी मेहता याचिका बंद, एनसीआर में प्रदूषण की सुनवाई का बदल गया तरीका

    Updated: Thu, 12 Mar 2026 05:47 PM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने 1985 की पर्यावरणविद एमसी मेहता की एनसीआर वायु प्रदूषण संबंधी याचिका को निस्तारित कर दिया है। दशकों से इस याचिका के तहत वाहनों की आयु, ...और पढ़ें

    एमसी मेहता बनाम भारत संघ वाली मूल याचिका को कोर्ट ने गुरुवार को निस्तारित करते हुए इसे पुनः नामित (re-captioned) करने का आदेश दिया है।

    एमसी मेहता बनाम भारत संघ वाली मूल याचिका को कोर्ट ने गुरुवार को निस्तारित करते हुए इसे पुनः नामित (re-captioned) करने का आदेश दिया है। 

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    संक्षेप में पढ़ें

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। वर्ष 1985 में पर्यावरणविद एमसी मेहता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। इसमें एनसीआर में व्याप्त वायु प्रदूषण की समस्या को उजागर किया गया था। दशकों से कोर्ट इसी याचिका के नाम पर कई नए-नए मुद्दों पर सुनवाई कर रहा था। इसी याचिका के तहत आयु पूरी कर चुके वाहनों का मामला, सीएनजी, पटाखे बंदी आदि कई बड़े मसलों पर कोर्ट सुनवाई करती रही है। मगर अब एमसी मेहता बनाम भारत संघ वाली मूल याचिका को कोर्ट ने गुरुवार को निस्तारित करते हुए इसे पुनः नामित (re-captioned) करने का आदेश दिया है। 

    स्वत: संज्ञान के रूप में किया पुनः नामित

    बता दें कि एमसी मेहता बनाम भारत संघ वाली याचिका में टैग करके दिल्ली में व्याप्त वायु प्रदूषण सहित कई याचिकाओं को दशकों से सुनवाई की जा रही थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तकरीबन 41 साल पुरानी मूल याचिका का निस्तारण करते हुए निर्देश दिया कि कार्यवाही को स्वत: संज्ञान के रूप में पुनः नामित किया जाए, जिसका शीर्षक होगा 'एनसीआर में वायु प्रदूषण के मुद्दे पर पुनर्विचार' (Re: Issues of Air Pollution in the National Capital Region)

    कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, 'इस याचिका में अदालत ने एनसीआर में बह रही जहरीली वायु को नियंत्रित करने के उद्देश्य से निरंतर परमादेश (mandamus) के माध्यम से निर्देश जारी किए हैं।' कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा वर्ष 1985 में उठाया गया था, लेकिन 1990 के दशक में इसमें तेजी आई, जिसमें नए मानक लागू किए गए और वाहनों की आयु सीमा तय करने तथा अन्य कई जरूरी उपाय किए गए।


    मूल रिट याचिका क्यों की गई पुन: नामित?

    निर्देश में आगे कहा गया कि अधिकांश मामलों में समय-समय पर अदालत द्वारा सुनवाई कर आवश्यक निर्देश भी जारी किए गए। पक्षकारों की सुनवाई के बाद अब यह उचित समय है कि 1985 की मूल रिट याचिका से उत्पन्न कार्यवाही का निस्तारण किया जाए। यह सुझाव दिया गया कि 1985 में सामने लाया गया यह मुद्दा हाल का नहीं है, इसलिए याचिका को उचित रूप से पुनः नामित किया जाना चाहिए।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि विद्वान एमिकस क्यूरी के सुझाव को ध्यान में रखते हुए हम औपचारिक रूप से डब्ल्यूपी (सिविल) 1985 का निपटारा करते हैं। उन प्रस्तावों का अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने भी समर्थन किया है। 

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    रजिस्ट्री को दिया गया आदेश

    पीठ के आदेशानुसार, अब रजिस्ट्री द्वारा उस मामले में कोई आईए (इंटरलॉक्यूट्री एप्लीकेशन) या एमए (मिसलेनियस एप्लीकेशन) दर्ज नहीं की जाएगी। इसी के साथ पीठ ने कहा कि रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि स्वत: संज्ञान (suo motu) कार्यवाही ‘एनसीआर में वायु प्रदूषण के मुद्दे पर’ के शीर्षक से पंजीकृत किए जाएं। वर्तमान में लंबित सभी आईए को रिट याचिकाओं के रूप में पुनः दुरुस्त किया जाए और प्रत्येक को स्वतंत्र रूप से निस्तारित किया जाए।

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    (एनआईए के इनपुट के साथ)