हरबंश दीक्षित। संविधान सभा स्वतंत्र भारत के संविधान को अंतिम रूप देने के ऐतिहासिक क्षण के निकट थी। तब डा. भीमराव आंबेडकर ने एक ऐसी चेतावनी दी थी, जिसकी प्रतिध्वनि आज भी सुनाई देती है। उन्होंने कहा था कि जब संवैधानिक उपाय उपलब्ध हों, तब उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए असंवैधानिक रास्तों का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

लगभग आठ दशक बाद इस चेतावनी को नए संदर्भ में पढ़ने की आवश्यकता है। आज प्रश्न यही नहीं है कि हम असहमति कैसे व्यक्त करें। उससे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम दूसरे की असहमति को भी उतनी ही सहजता से स्वीकार कर सकते हैं, जितनी दृढ़ता से अपनी असहमति व्यक्त करने का अधिकार चाहते हैं? यहीं से आज के लोकतांत्रिक विमर्श की एक गंभीर चिंता उपजती है।

आंदोलन लोकतंत्र के लिए अपरिचित नहीं हैं। भारत का स्वतंत्रता संग्राम स्वयं जन-आंदोलनों की महान परंपरा से निकला है। स्वतंत्र भारत में भी आंदोलनों ने शासन को नागरिकों की अपेक्षाओं के प्रति सजग किया है, अनेक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया है और हाशिए की आवाजों को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र तक पहुंचाया है। इसलिए आंदोलन को लोकतंत्र की कमजोरी मानना उचित नहीं होगा। शांतिपूर्ण असहमति लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है।

गांधी जी की पूरी राजनीतिक पद्धति में साधन की शुचिता को लक्ष्य की पवित्रता जितना ही महत्व मिला। इसीलिए गांधीवादी असहमति प्रतिद्वंद्वी को नष्ट करने के बजाय उसके अंतःकरण से संवाद करने का प्रयास करती थी। लोकतंत्र का संस्कार भी कुछ ऐसा ही है। मैं आपसे असहमत हूं, इसलिए आपका विरोध कर सकता हूं, लेकिन केवल इसलिए आपकी गरिमा, आपके अधिकार और आपकी लोकतांत्रिक वैधता को अस्वीकार नहीं कर सकता। यह सिद्धांत सत्ता और आंदोलनकारियों, दोनों पर समान रूप से लागू होता है।

सत्ता यदि प्रत्येक असहमति को शत्रुता अथवा अवज्ञा मानने लगे, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होता है। उसी प्रकार आंदोलनकारी यदि प्रत्येक असहमत नागरिक को सत्ता का समर्थक या अपने संघर्ष का विरोधी मान लें, तो आंदोलन की लोकतांत्रिक नैतिकता प्रभावित होती है। लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाने का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, दूसरे की आवाज सुनने का संस्कार भी उतना ही आवश्यक है। आज सार्वजनिक जीवन में यही संतुलन विशेष महत्व रखता है। इंटरनेट मीडिया ने प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति का अभूतपूर्व मंच दिया है, लेकिन उसने त्वरित प्रतिक्रियाओं, आरोपों और वैचारिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ाया है। कई बार हम तर्क सुनने से पहले व्यक्ति की पहचान देखते हैं और विचार पढ़ने से पहले यह तय कर लेते हैं कि वह किस ‘पक्ष’ का है। परिणाम यह होता है कि बहस सत्य की खोज से हटकर अपने-अपने खेमे की विजय का माध्यम बनने लगती है। यहीं से लोकतंत्र के लिए सबसे गंभीर संकट पैदा होता है-भरोसे का संकट।

लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि वह हमें एक जैसा बनाने का प्रयास नहीं करता। लोकतंत्र को केवल चुनावों से नहीं मापा जा सकता। चुनाव उसका अनिवार्य आधार हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्कृति उससे कहीं व्यापक है। वह तीन प्रकार के भरोसे पर खड़ी होती है-नागरिक का नागरिक पर भरोसा, नागरिक का संस्थाओं पर भरोसा और संस्थाओं का नागरिक के विवेक पर भरोसा। इनमें से कोई एक कमजोर होता है तो पूरी लोकतांत्रिक संरचना प्रभावित होती है। आज के विवादों और आंदोलनों को भी इसी कसौटी पर देखने की आवश्यकता है। कौन जीता और कौन हारा, इसका उत्तर अलग-अलग राजनीतिक दृष्टियों से अलग हो सकता है। कोई आंदोलनकारियों के प्रश्नों को अधिक न्यायसंगत बताएगा। लोकतंत्र इन दोनों मतों के लिए स्थान देता है, लेकिन एक तीसरा प्रश्न दोनों से बड़ा है-इस पूरे संघर्ष के बाद लोकतंत्र पर जनता का भरोसा कितना बचा?

यदि विवाद समाप्त होने के बाद नागरिक एक-दूसरे को अधिक संदेह से देखने लगें, संस्थाओं की निष्पक्षता पर विश्वास कमजोर हो जाए, सरकार और विपक्ष के बीच संवाद असंभव-सा लगने लगे तथा सार्वजनिक जीवन ‘हम’ और ‘वे’ में विभाजित हो जाए, तो किसी पक्ष की तात्कालिक राजनीतिक जीत भी लोकतंत्र की दीर्घकालिक उपलब्धि नहीं कही जा सकती। राजनीतिक विजय क्षणिक हो सकती है, संस्थागत अविश्वास की उम्र बहुत लंबी होती है। इसीलिए आंबेडकर की संवैधानिक चेतावनी आज और महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अधिकार है, किंतु आरोप के साथ प्रमाण का दायित्व भी है। सत्ता को निर्णय लेने का अधिकार है, किंतु उसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही का दायित्व भी जुड़ा है।

संस्थाओं को निष्पक्ष होना चाहिए और उनकी कार्यप्रणाली में निष्पक्षता दिखाई भी देनी चाहिए। लोकतंत्र का उत्तर अधिक लोकतंत्र है-अधिक संवाद, अधिक पारदर्शिता और अधिक भरोसा। लोकतंत्र में असहमति समस्या नहीं है। असहमति को सह न पाना समस्या है और जब असहिष्णुता संवाद को विस्थापित करती है, तो उसका अंतिम शिकार भरोसा होता है। लोकतंत्र में कोई चुनाव हार सकता है, कोई बहस हार सकता है, कोई आंदोलन भी अपने तात्कालिक लक्ष्य में असफल हो सकता है, लेकिन यदि इस प्रक्रिया में भरोसा हार गया, तो अंततः हार लोकतंत्र की होगी।

(लेखक विधि मामलों के विशेषज्ञ हैं)