विचार: पुलिस को भी है प्रतिकार का अधिकार
प्रदर्शन के नाम पर पुलिस पर हमला, उनके वाहन जलाना अथवा उनकी जान को खतरे में डालना केवल किसी व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि राज्य की विधिक व्यवस्था और कानून के शासन को चुनौती देना है।
HighLights
जंतर-मंतर प्रदर्शन में पैलेट गन प्रयोग पर बहस।
पुलिस को गैर-कानूनी जमावड़े पर बल प्रयोग का अधिकार।
बल प्रयोग न्यूनतम, आनुपातिक और अंतिम विकल्प होना चाहिए।
अशोक कुमार। हाल में दिल्ली के जंतर-मंतर पर काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के नेतृत्व में हुए आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा कथित रूप से पैलेट गन के प्रयोग को लेकर पूरे देश में व्यापक बहस छिड़ गई है। घटना की जांच भी प्रारंभ हो चुकी है। सवाल यह है कि पैलेट गन का प्रयोग हुआ या नहीं? यदि हुआ तो किन परिस्थितियों में हुआ? किंतु इस पूरे विवाद के बीच एक महत्वपूर्ण पक्ष लगभग चर्चा से बाहर है कि ऐसी परिस्थितियों में पुलिस को कानून क्या अधिकार देता है? मैंने अनेक बार ऐसे हालात देखे हैं, जब कुछ ही मिनटों में शांतिपूर्ण प्रतीत होने वाला प्रदर्शन हिंसक रूप धारण कर लेता है। ऐसे समय में पुलिस के प्रत्येक निर्णय का सीधा संबंध लोगों के जीवन, सार्वजनिक संपत्ति और कानून-व्यवस्था से होता है। इसलिए किसी भी घटना का मूल्यांकन केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि कानून और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। जब कोई प्रदर्शन हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़, पथराव अथवा सार्वजनिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन जाता है, तब राज्य का संवैधानिक दायित्व है कि वह कानून-व्यवस्था बहाल करे। पूर्व में भारतीय दंड संहिता यानी आइपीसी की धारा 141 में गैर-कानूनी जमावड़े की परिभाषा दी गई थी।
अब यह प्रविधान भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस की धारा 189 में निहित है। यदि पांच या उससे अधिक व्यक्ति किसी ऐसे उद्देश्य से एकत्र हों, जो कानून के विरुद्ध हो, तो वह गैर-कानूनी जमावड़ा माना जाएगा। इसमें सरकार के वैधानिक कार्यों में बाधा डालना, अपराध करना, सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, बलपूर्वक किसी की संपत्ति पर कब्जा करना अथवा किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य करने के लिए विवश करना शामिल हो सकता है। भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 189, 190 और 191 ऐसे गैर-कानूनी जमावड़े तथा दंगों में शामिल व्यक्तियों के लिए दंड का प्रविधान करती हैं। केवल हिंसा करने वाला व्यक्ति ही नहीं, बल्कि जानबूझकर ऐसे हिंसक जमावड़े का हिस्सा बने लोग भी कानूनी दायरे में आते हैं।
अब प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति में पुलिस क्या करे? इसका उत्तर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धाराओं 148 से 151 में मिलता है, जिन्होंने पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धाराओं 129 से 131 का स्थान लिया है। व्यवस्था के अनुसार कानून पुलिस को चरणबद्ध तरीके से कार्रवाई करने का अधिकार देता है। सबसे पहले उपनिरीक्षक या उससे वरिष्ठ अधिकारी किसी भी गैर-कानूनी जमावड़े अथवा शांति भंग करने की आशंका वाले समूह को तितर-बितर होने का आदेश दे सकता है। यदि भीड़ आदेश का पालन नहीं करती तो उसे हटाने के लिए पुलिस आवश्यक बल का प्रयोग कर सकती है, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर गिरफ्तारी भी शामिल है। कानून पुलिस को केवल उतना ही बल प्रयोग करने की अनुमति देता है, जितना परिस्थितियों में आवश्यक हो। इसे ग्रेडेड रिस्पांस कहा जाता है। इसका अर्थ है कि पुलिस सीधे कठोर बल का प्रयोग नहीं करती। पहले समझाइश, सार्वजनिक घोषणा और चेतावनी दी जाती है।
यदि उससे भी स्थिति नियंत्रित न हो तब वाटर कैनन, आंसू गैस तथा अन्य गैर-घातक उपाय अपनाए जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर सीमित लाठीचार्ज किया जा सकता है। इसके बाद भी यदि भीड़ हिंसक बनी रहे और लोगों के जीवन अथवा सार्वजनिक संपत्ति के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करे, तभी रबर बुलेट, प्लास्टिक पैलेट अथवा पंप-एक्शन एंटी-रायट गन जैसे विशेष उपकरणों का प्रयोग किया जा सकता है। इन उपकरणों का उद्देश्य किसी व्यक्ति की जान लेना नहीं, बल्कि हिंसक भीड़ को नियंत्रित करना और ऐसी स्थिति से बचना है, जहां वास्तविक गोलियों का प्रयोग करना पड़े। फिर भी, इनका उपयोग केवल प्रशिक्षित अधिकारियों द्वारा निर्धारित एसओपी के अनुसार ही किया जाना चाहिए। यदि इन उपायों के बाद भी स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए, तभी कानून विशेष परिस्थितियों में सशस्त्र बलों की सहायता लेने की अनुमति देता है। सामान्यतः ऐसी कार्रवाई कार्यपालक मजिस्ट्रेट के निर्देशन में की जाती है।
यदि किसी आपात स्थिति में मजिस्ट्रेट उपलब्ध न हो, तो कानून वरिष्ठतम उपनिरीक्षक अथवा उससे उच्च अधिकारी तथा सशस्त्र बलों के राजपत्रित अधिकारी को भी आवश्यक परिस्थितियों में आग्नेयास्त्रों के प्रयोग का आदेश देने का अधिकार प्रदान करता है। पैलेट आधारित भीड़ नियंत्रण प्रणाली भारत में लगभग दो दशकों से प्रचलन में है। जम्मू-कश्मीर में लंबे समय तक चले हिंसक पथराव के दौरान इसका उपयोग व्यापक चर्चा का विषय बना। व्यावहारिक दृष्टि से यह भीड़ नियंत्रण के सामान्य उपायों और घातक हथियारों के बीच का एक मध्यमार्गी विकल्प माना जाता है। स्पष्ट है कि कानून पुलिस को हिंसक एवं गैर-कानूनी भीड़ के विरुद्ध बल प्रयोग का अधिकार देता है। हालांकि बल का प्रयोग सदैव न्यूनतम, आवश्यक, अनुपातिक तथा अंतिम विकल्प के रूप में ही किया जाए। पुलिस का उद्देश्य नागरिकों को पराजित करना नहीं, बल्कि कानून का शासन स्थापित करते हुए शांति, जन-जीवन और सार्वजनिक सुरक्षा की रक्षा करना है।
पुलिस अधिकारी के लिए दंगा नियंत्रण कभी आसान निर्णय नहीं होता। ऐसी परिस्थितियों में यदि पुलिस निष्क्रिय रहे तो वही समाज उससे पूछता है कि उसने अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभाई। फिर भी, यदि कोई अधिकारी कानून की सीमा से बाहर जाकर कार्य करता है, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई के भी पर्याप्त प्रविधान हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पुलिसकर्मी भी इसी समाज का हिस्सा हैं। वे भी परिवार वाले नागरिक हैं, जो संविधान और कानून के प्रति अपनी शपथ का निर्वहन कर रहे होते हैं। प्रदर्शन के नाम पर पुलिस पर हमला, उनके वाहन जलाना अथवा उनकी जान को खतरे में डालना केवल किसी व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि राज्य की विधिक व्यवस्था और कानून के शासन को चुनौती देना है।
(लेखक उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक रहे हैं)




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