राजीव सचान। सदियों के संघर्ष, असंख्य लोगों के बलिदान और दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद अयोध्या में साकार हुए राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी के मामले ने लोगों की आस्था पर गहरी चोट करने के साथ ही उनके भरोसे को डिगाने का काम किया है। किसी के लिए भी यह सोचना कठिन है कि चढ़ावे में चोरी वही लोग कर रहे थे, जिन पर उसकी पाई-पाई का हिसाब रखने की जिम्मेदारी थी। इस हैरान-परेशान करने वाले मामले की जांच एसआइटी की ओर से की जा रही है। आशा की जाती है कि सच में दूध का दूध और पानी का पानी होगा, लेकिन जब तक ऐसा हो न जाए, तब तक निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता।

कहना कठिन है कि चढ़ावे में चोरी कब से हो रही थी, लेकिन यह विचित्र है कि सबसे पहले इसकी भनक स्थानीय विपक्षी नेताओं को लगी और फिर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे सार्वजनिक किया। जब ऐसा हुआ तो मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने सब कुछ ठीक होने का दावा कर दान राशि में किसी तरह की हेराफेरी से इन्कार कर दिया। आखिर उन्हें ऐसा करने की जल्दी क्या थी? इस इन्कार के बाद यह सामने आया कि कुछ लोगों के ठिकानों से पैसा मिला। यह भी पता चला कि जो लोग दान राशि की गिनती में शामिल थे, उनकी आर्थिक हैसियत अचानक अच्छी हो गई थी और वे लाखों-करोड़ों की जमीन खरीद रहे थे। ऐसी बातें भी सामने आईं कि जिन लोगों ने भगवान राम को आभूषण आदि अर्पित किए, उन्हें दान की रसीद नहीं दी गई और कुछ से यह कहा गया कि उन्होंने भेंट स्वरूप चांदी या सोने का जो कुछ दिया था, उसे गला दिया गया। यह भी सामने आया कि दान पात्रों की निगरानी और दान राशि की गणना भी सही तरह नहीं हो रही थी।

जब कथित आंतरिक जांच में गंभीर किस्म की गड़बड़ी सामने आई तो मंदिर ट्रस्ट की ओर से राज्य सरकार से जांच कराने को कहा गया। इसके बाद एसआइटी का गठन हुआ। इसके पहले राम मंदिर निर्माण समिति के जो अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र यह कह रहे थे कि उनका काम केवल निर्माण कार्यों को देखना है, वे अचानक टीवी चैनलों में यह बताते हुए दिखाई दिए कि दान पात्रों की निगरानी और चौकसी में भारी कमी थी। उन्होंने चढ़ावा चोरी को डकैती कह कर स्वतः ही मामले की गंभीरता को रेखांकित कर दिया। उन्होंने इसकी भी जरूरत जतानी शुरू कर दी कि मंदिर प्रबंधन की देख-रेख के लिए किसी सीईओ की नियुक्ति आवश्यक है। आखिर इसकी आवश्यकता पहले क्यों नहीं महसूस की गई? वास्तव में ऐसे एक नहीं अनेक सवाल हैं। समझना कठिन है कि ट्रस्ट के सभी पदाधिकारी मंदिर की व्यवस्था के संचालन में सक्रिय क्यों नहीं थे? ऐसा क्यों लगता है कि कुछ सदस्य केवल नाममात्र के सदस्य थे? क्या ऐसा इसलिए था कि कुछ लोगों ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था? सच जो भी हो, यह विचित्र है कि करोड़ों लोगों की आस्था पर आघात पहुंचाने वाले इस मामले के सामने आने के बाद किसी ने भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेने का साहस नहीं दिखाया। किसी ने भी जांच होने तक ही सही, अपना पद छोड़ने की पेशकश भी नहीं की।

इतने विख्यात और प्रतिष्ठित मंदिर के ट्रस्ट के पदाधिकारियों को नैतिकता का परिचय देने के लिए तत्पर रहना चाहिए था। राम मंदिर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का मंदिर है। इस मंदिर के व्यवस्थापकों को तो उच्च स्तर की मर्यादा दिखानी चाहिए थी। क्या वे तभी अपना पद छोड़ेंगे, जब एसआइटी उनकी भूमिका संदिग्ध करार देगी या फिर वे पुलिस जांच में गुनहगार दिखने लगेंगे? इस मामले में अभी तक कोई एफआइआर दर्ज न होना भी कई सवाल खड़े कर रहा है। जब मामले की तह तक पहुंचने के लिए देर-सबेर यह काम करना ही होगा, तो फिर इसमें देरी का क्या औचित्य? यह ऐसा मामला नहीं कि चढ़ावे के हिसाब-किताब और उसकी देखरेख संबंधी कमियों को ठीक कर देने से कर्तव्य की इतिश्री हो जाएगी। जिन लोगों ने चढ़ावा चोरी का पाप किया है, उन्हें कठोर दंड का भागीदार बनाए और जिनकी लापरवाही से ऐसा हुआ, उन्हें व्यवस्था से बाहर किए बिना भरोसे की बहाली होने वाली नहीं है। भरोसे की बहाली के लिए जो कुछ भी संभव है, किया जाना चाहिए।

आवश्यक हो तो राम मंदिर ट्रस्ट को भंग किया जाए और उसे नए सिरे से गठित किया जाए, क्योंकि मामला करोड़ों रुपये की हेराफेरी का ही नहीं, करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का भी है। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं हो सकती कि जिस मंदिर का प्रबंधन आदर्श तरीके से होना चाहिए था, वहां भी ऐसा नहीं किया जा रहा था। ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा था, इसके लिए जवाबदेही तय करने की सख्त जरूरत है। यह खेद की बात है कि अभी तक इस जरूरत की न्यूनतम पूर्ति भी नहीं हुई। किसी भी मामले और विशेष रूप से लोगों की आस्था और श्रद्धा से जुड़े किसी प्रसंग की जांच सही तरह से केवल होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि ऐसा होते हुए दिखनी भी चाहिए। एसआइटी का गठन इस दिशा में बस एक कदम भर है, लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता, क्योंकि करीब 15 दिन बीत गए और किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस मामले ने एक और नुकसान यह किया है कि इसने मंदिरों को सरकारी कब्जे से मुक्ति की मुहिम को भी धक्का पहुंचाया है।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)