राजीव सचान। जब भी जगंलराज का उल्लेख होता है तो उस दौर के बिहार का स्मरण हो आता है, जब लालू यादव मुख्यमंत्री हुआ करते थे। उनके मुख्यमंत्री रहते समय बिहार अराजकता को लेकर इस कदर बदनाम हुआ कि राष्ट्रीय जनता दल को उसके दुष्परिणाम आज तक भोगने पड़ रहे हैं। चुनावों के समय राजद के विरोधी दल लोगों को लालू के जंगलराज के भयावह दिनों की याद दिलाते हैं और इतने से ही उनका काम आसान हो जाता है।

इसका कारण यह है कि बिहार के लोग यह भूल नहीं सके हैं कि लालू यादव के शासनकाल में किस तरह अपहरण और फिरौती ने उद्योग का रूप ले लिया था और राज्य के अनेक शहरों में भी सांझ ढलते ही कैसा सन्नाटा छा जाता था। बिहार के लोग यह भी नहीं भूले हैं कि शहाबुद्दीन सरीखे माफिया का कैसा आतंक था और उनके जैसे बाहुबलियों को किस प्रकार लालू का संरक्षण प्राप्त था। जैसे यह पता नहीं कि बिहार राजद के जंगलराज की यादों से कब मुक्त होगा, वैसे ही यह कहना भी कठिन है कि पश्चिम बंगाल ममता बनर्जी के कुशासन की पराकाष्ठा को कब तक भूल सकेगा? यह कुशासन एक किस्म का जंगलराज ही था और कुछ मायनों में तो बिहार से भी बदतर था।

लालू यादव का शासन इसलिए जंगलराज के रूप में कुख्यात हुआ, क्योंकि अगस्त 1997 में किसी मामले को लेकर पटना उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी कर दी थी, 'बिहार में कोई सरकार नहीं है, यह जंगलराज से भी खराब है।" ऐसी कोई टिप्पणी कलकत्ता उच्च न्यायालय ने ममता शासन को लेकर तो नहीं की, पर हिंसा और भ्रष्टाचार के कई मामलों को लेकर उसने उसे न जाने कितनी बार फटकार लगाई, वह चाहे 2021 की चुनाव बाद की हिंसा रही हो या आरजी कर अस्पताल कांड या फिर शिक्षक भर्ती घोटाला। अभी हाल में ममता सरकार को सीमा पर बाड़ लगाने के लिए बीएसएफ को जमीन न देने के लिए फटकार लगी। ममता सरकार को कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट से भी कई बार फटकार लगी।

बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद हिंसा के चलते जो लोग अपना घर-बार छोड़ने के लिए असम में शरण लेने को मजबूर हुए थे, उनमें से कुछ तो महीनों तक अपने घरों को लौट नहीं सके थे। यह हिंसा इतनी खुली और भीषण थी कि यदि नेहरू और इंदिरा का जमाना होता तो शायद ममता के शपथग्रहण के पहले ही राष्ट्रपति शासन लग जाता। न्यायपालिका के आदेश पर इस भीषण हिंसा की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने की थी, क्योंकि जब यह हिंसा हो रही थी तो पुलिस मूकदर्शक बनी हुई थी। इस आयोग ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि बंगाल में कानून का शासन नहीं, बल्कि शासकों का कानून लागू है। अराजकता के मामले में संदेशखाली की हिंसा को भी नहीं भूला जा सकता। चूंकि इस हिंसा के लिए जिम्मेदार नेता को टीएमसी का संरक्षण प्राप्त था, इसलिए उसे बहुत दिनों बाद गिरफ्तार किया जा सका।

अराजकता को बयान करने वाली मुर्शिदाबाद की घटना को भी नहीं भूला जा सकता। वक्फ कानून के कथित विरोध के नाम पर मुर्शिदाबाद में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा का जमकर नंगा नाच किया गया। तब उपद्रवी तत्वों के आतंक से डरे हुए लोगों ने असम और झारखंड जाकर अपनी जान बचाई थी। ममता के शासन के समय टीएमसी के बाहुबली नेताओं-कार्यकर्ताओं और उनके द्वारा संरक्षित गुंडों का दुस्साहस इतना अधिक बढ़ा हुआ था कि वे पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों को भी निशाना बनाने में संकोच नहीं करते थे। वे हर किसी से अवैध वसूली, उगाही करते थे।

बंगाल में यह कट मनी यानी कमीशनखोरी और तोलाबाजी यानी अवैध वसूली के रूप में कुख्यात थी। बंगाल से गुजरने वाला कोई मालवाहक वाहन अवैध वसूली से बच नहीं पाता था। इसी तरह दो-चार सौ रुपये रोज कमाने वाले फुटपाथ दुकानदार भी हफ्ता वसूली के शिकार थे। लोग टीएमसी नेताओं को पैसे दिए बिना न तो जमीन खरीद सकते थे और न ही घर बनवाने के लिए सामग्री। इस सबसे ममता अनजान नहीं थीं और इसका प्रमाण यह है कि 2019 में उन्होंने कहा था कि उन्हें अपनी पार्टी में चोर नहीं चाहिए और जिन्होंने भी कट मनी वसूली है, उसे वे वापस करें। जाहिर है किसी ने ऐसा नहीं किया। उलटे बाद में यह सुनने को मिला कि ममता ने जो कहा, उसका गलत मतलब निकाला गया।

ममता के 15 वर्षों के शासन में ऐसी न जाने कितनी घटनाएं घटीं, जिनसे राज्य सरकार की बदनामी हुई, लेकिन इस सबके बाद भी उनके कुशासन को कभी जंगलराज की संज्ञा नहीं मिली। इसका कारण यह रहा कि दिल्ली और कोलकाता के मीडिया का एक हिस्सा उन्हें सदैव फाइटर की संज्ञा देता रहा और बड़ी सेक्युलर नेता के तौर पर रेखांकित करता रहा।

चूंकि ममता सेक्युलर नेता मानी जाती थीं, इसलिए लिबरल किस्म के लोगों ने यह देखने की चेष्टा ही नहीं की कि वे किस तरह अल्पसंख्यकों और यहां तक कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के तुष्टीकरण में लिप्त हैं और उन्होंने अपने कैडर को किस प्रकार मनमानी करने की छूट दे रखी है। बंगाल में चुनाव नतीजों के बाद उत्साहित, भावुक और ममता के शासनकाल में प्रताड़ित अथवा पलायन करने को मजबूर हुए लोगों की जैसी खबरें, फोटो, वीडियो आ रहे हैं, वे चीख-चीख कर यही कह रहे हैं कि ममता का शासन निरंकुशता का खौफनाक पर्याय बनकर रह गया था।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)