हरेंद्र प्रताप। देश आज पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की 110वीं जयंती मना रहा है। दीनदयाल जी 1952 से लेकर 1967 यानी लगभग 15 वर्ष जनसंघ के महामंत्री रहे। ‘एकात्म मानववाद’ की विचारधारा उनकी ही देन है, जिस पर पहले जनसंघ और आज भाजपा का राजनीतिक सफर जारी है। भाजपा जनसंघ से निकली है। जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर, 1951 को दिल्ली में हुई थी। स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस, कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टी का नाम प्रचलित था। कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टी विचारधारा वाले दल कहे जाते थे, पर उनकी विचारधारा का जन्म भारत में नहीं हुआ।

विदेश से आयातित उनके विचार मानवता को हैव या हैव नाट, बिलीवर या नान-बिलीवर आदि में बांटकर देखते थे, लेकिन जनसंघ की स्थापना मानवता के विभाजन की जगह सनातन विचार सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया तथा एकात्म मानवता के आधार पर हुई। जनसंघ ने 1952 के लोकसभा चुनाव में भाग लिया। पार्टी तब लोकसभा की कुल 489 सीटों में से 15 राज्यों की 94 सीटों पर चुनाव लड़ी, जिसमें उसे बंगाल में दो और राजस्थान में एक सीट मिली तथा मात्र 3.06 प्रतिशत मत मिले। कांग्रेस के बाद कम्युनिस्ट पार्टी 16 सीटें जीतकर दूसरे तथा 12 सीटें जीतकर सोशलिस्ट पार्टी तीसरे स्थान पर थीं। मत प्रतिशत के हिसाब से जनसंघ पांचवें स्थान पर रहा।

जनसंघ भारतभूमि पर विकसित भारतीय विचारधारा वाली पार्टी थी, जो व्यक्ति से बड़ा दल और दल से बड़ा देश की बात करती थी। 1964 में ग्वालियर के एक स्वाध्याय शिविर में एक पांच सदस्यीय समिति बनी, जिसे यह काम दिया गया कि वह निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के विचार को समाहित कर इसे अंतिम रूप दे। समिति में दीनदयाल जी, अटल बिहारी वाजपेयी, दत्तोपंत ठेंगड़ी, बलराज मधोक और सुंदर सिंह भंडारी शामिल थे। अनुमोदित प्रारूप को 1965 में विजयवाड़ा राष्ट्रीय अधिवेशन ने स्वीकार किया। इसमें कहा गया, 'भारत अपने स्वाभाविक स्वरूप एवं प्रतिष्ठा को प्राप्त कर ही अपना निर्माण कर सकेगा। इसी से रूढ़ियां समाप्त होंगी और स्वस्थ, चैतन्यमयी संस्थाएं जन्म लेंगी।

आर्थिक दुर्व्यवस्था एवं सामाजिक अन्याय के पाटों में पिसने वाला जनजीवन संपन्नता और समानता के वातावरण में संतोष की सांस लेगा। वर्तमान दुरावस्था का कारण भारतीयता को स्वीकार न करते हुए विदेशी-विजातीय विचारधाराओं और जीवनमूल्यों को थोपने का प्रयत्न और स्व का तिरस्कार करने की प्रवृत्ति है। लोकतंत्र, समानता, राष्ट्रीय स्वतंत्रता तथा विश्व शांति परस्पर संबद्ध कल्पनाएं हैं। भारतीय संस्कृति एकात्मवादी है। अतः संघर्ष के स्थान पर परस्परावलंबन, पूरकता, अनुकूलता और सहयोग के आधार पर सृष्टि की क्रियाओं का विचार हो। व्यक्ति की भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का विचार हो। हमें इस देश की भूमि के प्रति मातृभाव रखकर चलने वाला समाज बनाना होगा। सभी पंथों और उपासना के प्रति सहिष्णुता एवं समादर भाव विकसित करना होगा। व्यष्टि और समष्टि का प्राकृतिक हित में हस्तक्षेप न हो।'

उक्त प्रारूप में यह भी कहा गया, 'उत्पादन, विनिमय एवं उपभोग के लिए अर्थायाम आवश्यक है। अर्थ का अभाव, धर्म की हानि और अर्थ का घमंड ठीक नहीं। पूंजी के लिए बचत करनी होगी। आधुनिकीकरण के नाम पर पाश्चात्यीकरण ठीक नहीं। वास्तविक किसान भूमि का मालिक हो। समान काम के लिए समान मजदूरी मिले। काम न मिलने की स्थिति में जीवनयापन के लिए बेकारी भत्ता मिले। न्यूनतम जीवन की आवश्यक वस्तुएं कर-मुक्त हों। मूल्यों का स्थिरीकरण हो। खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता हो। प्रत्येक कुटुंब को मकान-यह राज्य का दायित्व हो। आयु तथा अन्य कारणों से असहाय के लिए सामाजिक सुरक्षा तथा निःशुल्क चिकित्सा की व्यवस्था हो।

आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति के रूप में विकसित किया जाए। न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी हो। संपूर्ण व्यवस्था का केंद्र मानव हो। सांप्रदायिक आधार पर विशेष अधिकार नहीं मिले। ईसाई मिशनरियों को विदेशी प्रभाव एवं नियंत्रण से मुक्त किया जाए। न्याय सस्ता और सुलभ हो। प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में हो। आर्थिक योजनाओं का माप सबसे निचले स्तर पर विद्यमान व्यक्ति हो। गरीब, अनपढ़ हमारे नारायण बनें। कोई भूख से न मरे, अतः मुफ्त अनाज, स्वास्थ्य हेतु आयुष्मान योजना तथा सबको अपना पक्का मकान मिले, अतः प्रधानमंत्री आवास योजना चले। विभाजनकारी अनुच्छेद 370 की समाप्ति और वंदे मातरम् का संपूर्ण गायन हो। विदेश नीति के बारे में कहा गया, 'भारत साम्राज्यवाद, विस्तारवाद और उपनिवेशवाद का विरोध करे।'

भारत एक पुरातन राष्ट्र है। यहां पहले से एक सबल, चैतन्ययुक्त, संपन्न राष्ट्र जीवन विद्यमान था। जीवन के चतुर्विध पुरुषार्थ-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की कल्पना से युक्त समग्र एकात्म जीवन दर्शन पर आधारित इस राष्ट्र जीवन में श्रेष्ठतम जीवन मूल्य विकसित हुए, लेकिन कालांतर में आंतरिक शैथिल्य और विदेशी आक्रमणों के कारण इस राष्ट्र जीवन में अवनति आई। यह राजनीति के भारतीयकरण का ही परिणाम है कि भाजपा की अगुआई में आज देश आगे बढ़ रहा है। 1952 के लोकसभा चुनाव में दूसरा और तीसरा स्थान पाने वाली कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पार्टी आज इतिहास बन गई हैं।

(लेखक बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे हैं)