ए. सूर्यप्रकाश। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के हालिया अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन दौरे के दौरान व्यक्त विचार न केवल संघ के कटु आलोचकों, बल्कि संघ के वृहत्तर संगठनों में सक्रिय परंपरावादियों के लिए भी कुछ अचरज भरे रहे। न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन और अन्य आयोजनों में सरसंघचालक द्वारा बहुलतावाद और विविधता की महत्ता का बखान सुनकर संघ के विरोधी यकीनन अवाक रह गए होंगे।

जब संघ जब अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे कर रहा है, तब कट्टरपंथियों और छद्म-पंथनिरपेक्षतावादियों के विषैले नैरेटिव को लपक कर आगे बढ़ने वाले संघ विरोधियों को यह सुनकर तगड़ा झटका लगा होगा कि भागवत समानता, बंधुत्व और बहुलता को लोकतांत्रिक जीवन का मूल आधार बता रहे हैं। इससे भी अधिक उल्लेखनीय उनका विविधता को हिंदू चिंतन का आत्मा बताना और यह रेखांकित करना रहा कि भारत में एक उदार लोकतंत्र के सभी गुण इसीलिए समाहित हैं, क्योंकि ये मूल्य उसकी सभ्यतागत जड़ों से ही उपजे हैं।

इस दौरान उनका यह बयान बहुत चर्चित रहा कि 'भारत में कोई मुस्लिम नहीं होना चाहिए, ऐसा सोचने वाला सच्चा हिंदू नहीं हो सकता।' ‘सच्चे हिंदू’ की उनकी यह परिभाषा समूचे संघ परिवार के लिए समग्रता से परिपूर्ण सतर्कता संदेश की भांति होनी चाहिए। विशेष रूप से कुछ अनुषंगी संगठनों और अन्य अनेक कट्टरपंथियों के लिए चेतावनी भी, जो अक्सर मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों के साथ उलझकर टकराव बढ़ाते रहते हैं।

यह बयान भाजपा जैसे राजनीतिक संगठन के लिए भी एक परोक्ष संदेश और विवेकसम्मत सलाह कही जा सकती है, क्योंकि केंद्र और कई राज्यों की सत्ता पर काबिज होने के बावजूद उसके कई नेता अन्य मतावलंबियों के विरुद्ध अप्रिय टिप्पणियां करने से बाज नहीं आते। भागवत की टिप्पणी वस्तुत: शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की हिमायत करने वाली है। यदि उनके इस विचार को आत्मसात कर मूर्त रूप दिया गया तो इससे सामाजिक समरसता का भाव बहुत सशक्त होगा।

न्यूयार्क में आयोजित जिस अंतरराष्ट्रीय धार्मिक सम्मेलन में भागवत ने भाग लिया, उसमें एक पांच-सूत्रीय कार्ययोजना एवं प्रस्ताव पर भी सहमति बनी। इस प्रस्ताव में 'घृणा, हिंसा या अमानवीयकरण को जायज ठहराने के लिए पंथ के इस्तेमाल' जैसी अवधारणाओं का पुरजोर विरोध किया गया। यह रुख भारत के संवैधानिक जनादेश के ही अनुकूल है, जो धर्म को संवैधानिक एवं मानवीय मूल्यों से ऊपर रखने तथा अन्य मतावलंबियों के विरुद्ध नफरत या हिंसा को बढ़ावा देने का स्पष्ट विरोध करता है। सार्वभौमिक एकात्मता के प्रसार को प्रोत्साहन से जुड़े इस आयोजन में भागवत का संबोधन इन्हीं बिंदुओं पर केंद्रित भी रहा। इसी आयोजन में कुछ चिरपरिचित आंदोलनजीवियों का जमावड़ा भी रहा।

इन आंदोलनजीवियों में कट्टरपंथी, ईसाई मत प्रचारक, छद्म-सेक्युलर और वामपंथी गुट शामिल थे, जो संघ के विरोध में तथा भारत में तथाकथित मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ गला फाड़कर चिल्ला रहे थे। वे हाथों में पोस्टर और तख्तियां लिए नारे लगा रहे थे। विश्व के इस विशालतम स्वयंसेवी संगठन के विरुद्ध दशकों से गढ़े गए मनगढ़ंत झूठ से प्रेरित उनका यह प्रपंच और विरोध संघ प्रमुख के उन ठोस विचारों के संदर्भ में बिल्कुल खोखला और बेअसर था, जो उन्होंने सभागार में व्यक्त किए थे। इसके अलावा, उनका यह प्रलाप मुख्यतः विश्व के सबसे विशाल एवं जीवंत लोकतंत्र 'भारत' के खिलाफ लक्षित था। उनके इस विषवमन पर किसी को भी हैरानी हो सकती है कि क्या उन्हें हिंदू समाज और आरएसएस के विषय में कोई बुनियादी समझ है भी या नहीं?

मैडिसन स्क्वायर की उस विशाल सभा में संघ प्रमुख का संबोधन न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी के मुंह पर किसी करारे वैचारिक तमाचे से कम नहीं रहा होगा। ममदानी इस आयोजन के मुखर विरोधी बने हुए थे और उन्होंने आरएसएस की विचारधारा को 'विभाजनकारी' बताया था। ममदानी के आलोचकों ने भी उनके तथाकथित पंथनिरपेक्ष पाखंड, दोहरे मापदंड और हिंदू संगठनों के प्रति उनके खुले पूर्वाग्रह की तीखी भर्त्सना की। आलोचकों की दृष्टि में ममदानी ऐसे व्यक्ति के रूप में उभरे हैं, जो हिंदू-विरोधी दुर्भावनाओं के हवा देने में लगे रहते हैं।

कनाडा और ब्रिटेन दौरे पर भी भागवत ने विभिन्न धर्मों और नस्लों के बीच उदारता एवं सद्भाव के मूल्यों की पुरजोर वकालत की। टोरंटो में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की मूल भावना पर आयोजित ‘हिंदू-विश्व बंधु’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि हिंदू धर्म 'विविधता में एकता' का जीवंत उदाहरण है। इसे किसी एक भाषा, एक जीवनशैली या किसी एक पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं किया जा सकता और यही कारण है कि इसके अनुयायियों में बहुलतावादी समाज के प्रति गहरी सहिष्णुता देखने को मिलती है। उन्होंने दुनिया भर के प्रताड़ित समुदायों को खुले दिल से गले लगाने की भारतीयों की सहज प्रवृत्ति का भी उल्लेख किया। यह भी एक वजह रही कि भारत सदियों से समय-समय पर प्रताड़ित समुदायों का सुरक्षित आश्रयस्थल रहा है। ब्रिटेन में उन्होंने वैश्विक तनावों को सुलझाने के लिए एकता, सह-अस्तित्व और 'जियो और जीने दो' के दृष्टिकोण पर जोर दिया। उन्होंने वर्तमान युवा पीढ़ी को ऐसा वर्ग बताया, जो सकारात्मक परिवर्तन का सूत्रधार बनने को तैयार है।

समग्रता में देखें तो भागवत का अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन का यह दौरा विश्व को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूलभूल मूल्यों से परिचित कराने के प्रयास की दृष्टि से एक बड़ी सफलता कहा जा सकता है। यह भारत की घरेलू राजनीति के संदर्भ में भी बेहद अहम रहा, क्योंकि उन्होंने धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध एक सख्त लक्ष्मण रेखा खींची। भागवत सामाजिक समरसता के प्रबल पैरोकार भी बनकर उभरे हैं। अब देखना यही होगा कि क्या संघ परिवार और भाजपा उनकी इन नसीहतों को गंभीरता से लेंगे और आवश्यक सुधारों के लिए अपेक्षित कदम उठाएंगे या नहीं?

(लेखक लोकतांत्रिक विषयों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)