विचार: सेवा और समर्पण के ढाई दशक
भारतीय परंपरा में इसका उत्तर केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में निहित है। सेवा की शुरुआत किसी दूसरे के लिए कुछ करने से होती है, लेकिन उसका अंतिम उद्देश्य व्यक्ति, समाज और व्यापक सामूहिक कल्याण के बीच संबंध को अधिक मजबूत बनाना है।
HighLights
भारतीय 'सेवा' अवधारणा जून 2026 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में शामिल हुई।
नरेंद्र मोदी के 25 वर्ष सार्वजनिक जीवन में 'सेवा' का महत्व।
'जन सेवा से देश सेवा' और 'अंत्योदय' पर भाजपा का अभियान केंद्रित।
डॉ. स्वदेश सिंह। भारतीय चिंतन की एक विशिष्ट अवधारणा है। यह केवल किसी की सहायता करने या परोपकार करने का भाव नहीं है, बल्कि स्वयं से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को स्वीकार करने की जीवन-दृष्टि है। जून 2026 में ‘सेवा’ शब्द का आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में शामिल होना इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भारतीय सभ्यता और चिंतन में सदियों से रचे-बसे इस शब्द को अब वैश्विक शब्दकोश में भी स्थान मिला है। भारतीय संदर्भ में सेवा का अर्थ है- निःस्वार्थ भाव से कार्य करना, दूसरों के प्रति जिम्मेदारी निभाना, विनम्रता रखना और करुणा के साथ समाज के लिए योगदान देना।
भारतीय ‘सेवा’ की अवधारणा को केवल पश्चिमी अर्थों में प्रयुक्त ‘परोपकार’ के समान नहीं समझा जा सकता। परोपकार में जहां किसी दूसरे के लिए कुछ करने का भाव प्रमुख हो सकता है, वहीं भारतीय परंपरा में सेवा व्यक्ति के आत्म-परिवर्तन का भी माध्यम है। व्यक्ति सेवा इसलिए करता है, क्योंकि वह इसे अपना कर्तव्य और जिम्मेदारी मानता है।
सात अक्टूबर, 2001 को नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। सात अक्टूबर 2026 को उनके सार्वजनिक जीवन का यह 25 वर्ष का पड़ाव पूरा होगा। यह केवल एक राजनीतिक यात्रा की अवधि नहीं, बल्कि शासन और सार्वजनिक जीवन को ‘सेवा’ के विचार से जोड़कर देखने का अवसर भी है। नरेन्द्र मोदी ने स्वयं अपनी सार्वजनिक यात्रा को राष्ट्रसेवा के दायित्व, कृतज्ञता और उद्देश्य से जोड़कर व्यक्त किया है। भारतीय जनता पार्टी ने भी उनके इस महत्वपूर्ण पड़ाव को ‘सेवा’ के विचार के माध्यम से रेखांकित किया है। 17 सितंबर 2026 को उनके जन्मदिन के अवसर पर भाजपा ने देशव्यापी ‘सेवा संकल्प अभियान’ की शुरुआत की, जो 17 अक्टूबर तक चलेगा। इस अभियान का मूल संदेश है- जन सेवा से देश सेवा।
यह संदेश केवल एक अभियान का नारा नहीं है। इसके पीछे यह विचार है कि सार्वजनिक जीवन की सार्थकता तभी है जब शासन और राजनीति समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का माध्यम बनें। इस संदर्भ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की ‘अंत्योदय’ की अवधारणा विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाती है। अंत्योदय का मूल भाव है- समाज और अर्थव्यवस्था के सबसे अंतिम व्यक्ति का उत्थान और कल्याण। विकास की वास्तविक कसौटी केवल यह नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हुई या कितनी नई योजनाएं बनीं। प्रश्न यह भी है कि विकास का लाभ उस व्यक्ति तक कितना पहुंचा जो सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे पीछे है। अंत्योदय इसी अंतिम व्यक्ति को विकास के केंद्र में रखता है।
पिछले दशक के दौरान ऐसे कई मापनीय संकेतक सामने आए हैं, जिनके माध्यम से शासन के परिणामों को देखा जा सकता है। नीति आयोग के अनुसार, 2013-14 और 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। विश्व बैंक की पावर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ के अनुसार, प्रतिदिन 2.15 डालर की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली भारतीय आबादी का अनुपात 2011-12 में 16.2 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 2.3 प्रतिशत हो गया।
सामाजिक सुरक्षा : इस बीच सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी विस्तार हुआ है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, भारत में प्रभावी सामाजिक सुरक्षा कवरेज 24 प्रतिशत से बढ़कर 64.3 प्रतिशत हो गया है। लगभग 94 करोड़ नागरिक कम-से-कम एक सामाजिक सुरक्षा उपाय के दायरे में हैं। सेवा को शासन के भीतर एक नैतिक दृष्टिकोण के रूप में समझा जा सकता है। इसका अर्थ है कि सार्वजनिक सत्ता केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है- ऐसी जिम्मेदारी जो विकास के लाभ को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का प्रयास करे।
यही दृष्टि ‘सेवा संकल्प अभियान’ में दिखाई देती है। अभियान के अंतर्गत रक्तदान शिविर, स्वच्छता अभियान, स्वास्थ्य एवं कल्याण संबंधी गतिविधियां, जनसंपर्क, युवाओं की भागीदारी तथा विभिन्न सामुदायिक कार्यक्रमों को शामिल किया गया है। सेवा की अवधारणा किसी एक राजनीतिक कार्यक्रम या किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। 'जन सेवा से देश सेवा' का संदेश किसी एक वर्षगांठ तक सीमित नहीं है। यह उस विचार को सामने रखता है कि व्यक्ति का कल्याण और राष्ट्र की प्रगति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष इस भारतीय प्रश्न को सामने रखते हैं कि सेवा करने का अर्थ क्या है? भारतीय परंपरा में इसका उत्तर केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में निहित है। सेवा की शुरुआत किसी दूसरे के लिए कुछ करने से होती है, लेकिन उसका अंतिम उद्देश्य व्यक्ति, समाज और व्यापक सामूहिक कल्याण के बीच संबंध को अधिक मजबूत बनाना है।
(राष्ट्रीय सचिव, भारतीय जनता पार्टी)








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