विचार: नागरिकता का प्रमाण पत्र
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं, बल्कि केवल यात्रा का दस्तावेज है, जिससे नागरिकता साबित करने वाले एक विशिष्ट पहचान पत्र की आवश्यकता पर बहस छिड़ गई है।
HighLights
पासपोर्ट केवल यात्रा का दस्तावेज, नागरिकता का प्रमाण नहीं।
आधार, ड्राइविंग लाइसेंस भी नागरिकता का प्रमाण नहीं।
नागरिकता सिद्ध करने के लिए विशिष्ट पहचान पत्र की आवश्यकता।
संजय गुप्त। पिछले दिनों विदेश मंत्रालय ने जब यह कहा कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, बल्कि मात्र यात्रा का दस्तावेज है तो एक बहस चल पड़ी। अनेक लोग संशय में आकर सवाल करने लगे कि यदि पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा तो फिर विदेश में कोई भारतीय नागरिक किस तरह अपनी नागरिकता प्रमाणित कर सकता है?
ध्यान रहे कि यह प्रबल धारणा रही है कि पासपोर्ट नागरिकता का एक भरोसेमंद प्रमाण होता है। इसका कारण यह है कि पासपोर्ट गहन छानबीन के बाद ही प्रदान किया जाता है और पासपोर्ट विभाग की ओर से यह सुनिश्चित किया जाता है कि किसी अन्य देश का नागरिक भारत का पासपोर्ट हासिल न कर सके। यदि कोई गलत जानकारी देकर पासपोर्ट हासिल कर लेता है तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई भी होती है।
समस्या केवल यह नहीं है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। समस्या यह है कि आधार, ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता पहचान पत्र और ऐसे ही अन्य कई दस्तावेजों को भी नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाता। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर के दौरान चुनाव आयोग ने भी ऐसा ही कहा और सुप्रीम कोर्ट ने भी।
पासपोर्ट के मामले में विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के बाद यह साफ हुआ कि पासपोर्ट अधिनियम भी यही कहता है कि यह महज यात्रा की अनुमति देने वाला एक दस्तावेज है, न कि नागरिकता का प्रमाण पत्र। संसद से 1967 में पारित पासपोर्ट अधिनियम के अनुसार केंद्र सरकार जनहित में या विशेष परिस्थितियों में उन व्यक्तियों को भी पासपोर्ट जारी कर सकती है, जो भारत के नागरिक नहीं हैं।
इस अधिनियम की धाराओं के आधार पर बंबई उच्च न्यायालय ने एक मामले में यह निर्णय भी दिया था कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है। स्पष्ट है कि पासपोर्ट मामले में विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के बाद मामले के राजनीतिकरण करने का कोई औचित्य नहीं। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि पासपोर्ट अधिनियम तो कांग्रेस की सरकार के समय में पारित हुआ था। यदि पासपोर्ट वास्तव में नागरिकता का प्रमाण पत्र होता तो उक्त अधिनियम में ऐसा दर्ज किया जाता।
नागरिकता का निर्धारण सिटिजनशिप एक्ट, 1955 के तहत होता है। इस अधिनियम के अनुसार नागरिकता का निर्धारण कुछ प्रमुख आधारों पर होता है, जैसे जन्म और वंश। भारत में जन्मा वह व्यक्ति भारतीय नागरिक है, जिसके माता-पिता भी भारत में जन्मे हों। इसी तरह भारत के बाहर जन्मा व्यक्ति भी भारतीय नागरिक हो सकता है, यदि उसके जन्म के समय उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक रहा हो।
भारतीय मूल के ऐसे व्यक्ति, जो भारत में सात साल तक रह चुके हों या भारतीय नागरिकों से विवाहित हों, वे भी भारत की नागरिकता प्राप्त करने के अधिकारी हो सकते हैं। ऐसा विदेशी नागरिक, जो 12 वर्ष से भारत में रह रहा हो, उसे भी भारत की नागरिकता प्रदान की जा सकती है। इसके अलावा यदि कोई नया क्षेत्र भारत का हिस्सा बनता है, तो उस क्षेत्र के लोगों को भारत सरकार द्वारा नागरिकता प्रदान की जाती है।
विडंबना यह है कि सिटिजनशिप एक्ट में नागरिकता का निर्धारण करने वाले नियम तो स्पष्ट किए गए हैं, लेकिन इस एक्ट के तहत भारतीय नागरिकों को कोई विशिष्ट पहचान पत्र नहीं दिया जाता, जैसा कि कई देशों में किया जाता है। अपने देश में ऐसा इसके बाद भी नहीं किया जाता कि यह एक्ट इसकी सिफारिश करता है कि भारत सरकार प्रत्येक नागरिक का अनिवार्य पंजीकरण कर सकती है, उसे राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी कर सकती है और अपने नागरिकों का रजिस्टर यानी एनआरसी तैयार कर सकती है।
भारत में बहुत कम ऐसे लोग हैं, जिनके पास उनके माता-पिता के जन्म प्रमाण पत्र होंगे। तमाम लोग तो ऐसे हैं, जिनका खुद का भी जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। इसी कारण अगर किसी कारण नौकरशाही किसी की नागरिकता पर सवाल उठा दे तो उसके लिए यह प्रमाणित करना कठिन हो जाता है कि वह भारत का नागरिक है।
अब जब विदेश मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है तब फिर बेहतर होगा कि सरकार यह स्पष्ट करे कि भारतीय नागरिकों की नागरिकता को प्रमाणित करने वाले किसी तरह के पहचान पत्र जारी करने की उसकी कोई योजना है या नहीं? एक समय जब लालकृष्ण आडवाणी गृह मंत्री थे तो उन्होंने नागरिकता प्रमाण पत्र के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी तैयार करने की पहल की थी, लेकिन वह आगे नहीं बढ़ सकी।
इसके बाद मनमोहन सिंह सरकार के समय गृह मंत्री के रूप में चिदंबरम ने आधार को एनआरसी से जोड़ने की कोशिश की, लेकिन यह कोशिश भी कामयाब नहीं हो सकी और इस तरह आधार पहचान पत्र के रूप में ही मान्य होकर रह गया। इसके बाद मोदी सरकार ने जब नागरिकता कानून में संशोधन किया तो उसकी ओर से यह कहा गया कि इसके बाद एनआरसी तैयार किया जाएगा, मगर नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के खिलाफ विपक्षी दलों की ओर से एक अभियान छेड़ दिया गया।
इसका नतीजा यह हुआ कि इस कानून को लागू करने में तो देरी हुई ही, एनआरसी की प्रक्रिया भी ठंडे बस्ते में चली गई। एनआरसी की आवश्यकता इसलिए जताई गई थी, ताकि घुसपैठियों की पहचान की जा सके।
एनआरसी के बाद एसआईआर के जरिये घुसपैठियों की पहचान के जतन किए गए, लेकिन सब जानते हैं कि एसआईआर घुसपैठियों की पहचान करने की ठोस प्रक्रिया नहीं। चुनाव आयोग केवल यही सुनिश्चित करता है कि मतदाता पहचान पत्र भारतीय नागरिक को ही मिले। वह ऐसे किसी व्यक्ति को मतदाता पहचान पत्र जारी करने से इन्कार कर सकता है, जिसकी नागरिकता के बारे में उसे संदेह हो, लेकिन वह भारत का नागरिक है या नहीं, यह सिद्ध करना उसका काम नहीं।
यह काम तो गृह मंत्रालय का है। इन स्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार नागरिकता साबित करने वाले किसी दस्तावेज को जारी करने की व्यवस्था करे। ऐसे किसी दस्तावेज को लेकर पक्ष-विपक्ष के बीच सहमति बननी चाहिए। भारत जैसे देश में जहां तरह-तरह के दस्तावेज छल-छद्म से बन जाते हैं, वहां कोई एक ऐसा प्रमाण पत्र होना चाहिए, जो नागरिकता का दस्तावेज हो।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)





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