विचार: सरकारी तंत्र में भटकती जवाबदेही
यदि भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना है, सुशासन को सचमुच स्थापित करना है और भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनाना है तो शासन तंत्र का जवाबदेह होना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है।
HighLights
सीबीएसई और नीट मामलों में अधिकारियों पर अपर्याप्त कार्रवाई।
दिल्ली होटल अग्निकांड में जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं।
सरकारी तंत्र में जवाबदेही की कमी गंभीर चिंता का विषय।
राजीव सचान। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा के मूल्यांकन में गड़बड़ी के बाद जब केंद्र सरकार ने इस संस्था के चेयरमैन राहुल सिंह को उनके पद से हटाया तो ऐसा लगा कि अंततः उसने अपनी किरकिरी कराने वाले इस मामले में जवाबदेही तय करना आवश्यक समझा, लेकिन जल्द ही खबर आई कि उन्हें कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव बना दिया गया। आखिर यह कैसी कार्रवाई और जवाबदेही? इस तबादले से उनकी सेहत पर क्यों असर पड़ने वाला? उनके साथ सीबीएसई के सचिव पद से हटाए गए हिमांशु गुप्ता को उनके मूल कैडर भेज दिया गया।
संभवतः कुछ समय तक केंद्र में उन्हें प्रतिनियुक्ति न मिले, लेकिन इसे भी किसी तरह की कठोर कार्रवाई कहना कठिन है। सीबीएसई मामले में तो फिर भी दो अधिकारियों का तबादला किया गया। इससे अधिक गंभीर नीट प्रश्नपत्र लीक प्रकरण में तो कुछ भी नहीं किया गया। इस परीक्षा को आयोजित कराने वाली संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए के किसी अधिकारी का न तो स्थानांतरण हुआ और न ही निलंबन। यह तब है, जब सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा था कि इस मामले में जवाबदेही तय किए बिना इस तरह की घटनाओं को रोका नहीं जा सकता।
नीट पेपरलीक मामले में सरकार और विशेष रूप से शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान विपक्ष के निशाने पर हैं। कांग्रेस के अलावा बीते दिनों काकरोच जनता पार्टी ने भी दिल्ली में प्रदर्शन कर उनका इस्तीफा मांगा। यह ठीक है कि यह प्रदर्शन फीका रहा और वह कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाया, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि नीट पेपरलीक मामला गंभीर नहीं और सरकार की जवाबदेही की जरूरत खत्म हो जाती है। चूंकि मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में किसी गड़बड़ी या गलती के लिए किसी मंत्री का त्यागपत्र नहीं लिया गया, इसलिए शिक्षा मंत्री के भी इस्तीफे के कोई आसार नहीं। कहना कठिन है कि मोदी सरकार अपने इस तीसरे कार्यकाल में मंत्रिमंडल में कोई फेरबदल करेगी या नहीं और जब ऐसा होगा तो कसौटी पर खरा न उतर पाने या सरकार की किरकिरी कराने वाले मंत्रियों की छुट्टी होगी या नहीं, लेकिन नीट पेपरलीक बहुत ही गंभीर मामला है।
दोबारा परीक्षा देने के तनाव में कई छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। आखिर कोई इसकी जिम्मेदारी लेगा या नहीं? यह सही है कि किसी बड़ी गलती-गड़बड़ी या घटना-दुर्घटना के कारण यदि किसी अधिकारी को बर्खास्त किया जाता है अथवा किसी मंत्री का इस्तीफा लिया जाता है तो उससे समस्या का समाधान नहीं हो जाता, लेकिन जब ऐसा होता है तो जन भावनाओं को संतुष्टि मिलती है और लोगों का रोष एवं आक्रोश कम होता है। जब ऐसा कुछ नहीं होता तो सवाल उठता है कि आखिर जवाबदेही और नैतिक जिम्मेदारी नाम की कोई चीज होती है या नहीं?
बात केवल परीक्षाओं में गड़बड़ी और उसके चलते लाखों छात्रों के परेशान होने और उनमें से कुछ के आत्महत्या करने की ही नहीं है। अन्य अनेक मामलों में भी सरकारी तंत्र की जवाबदेही बड़ी मुश्किल से तय होती है। इसका ताजा उदाहरण है दिल्ली में अवैध तरीके से बने और अग्निशमन विभाग के अनापत्ति प्रमाण पत्र के बिना चल रहे होटल में आग लगने से 22 लोगों की मौत की। इनमें से कई विदेशी थे, जो अपने परिवार वालों के उपचार के लिए दिल्ली आए थे। 22 लोगों की मौत के बाद होटल के मालिक और रसोइए को तो गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन नगर निगम, अग्निशमन विभाग आदि के किसी कर्मचारी-अधिकारी का निलंबन तक नहीं किया गया, जबकि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की बर्खास्तगी और गिरफ्तारी होनी चाहिए थी। आखिर दोषी केवल होटल मालिक नहीं, जिसने छह की जगह 25 कमरे बना लिए। दोषी तो वे सब भी हैं, जिन्होंने अवैध निर्माण होने दिया। किसी इमारत में अवैध रूप से छह से 25 कमरे बना लेना कोई ऐसा काम नहीं कि उसे कोई देख न पाए। साफ है कि भ्रष्टाचार के चलते यह अवैध होटल बना और चला। क्या यह निराशाजनक नहीं कि दिल्ली में सरकार बदल गई, लेकिन उसके तहत काम करने वाली सरकारी एजेंसियों का कार्य-व्यवहार नहीं बदला?
हम इस पर गर्व करते हैं और करना भी चाहिए कि भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन बड़ा ही है, बेहतर नहीं और इसका एक प्रमुख कारण है सरकारी तंत्र में जवाबदेही का अभाव। इस अभाव के चलते जिस तरह बार-बार एक जैसे कारणों से परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होते रहते हैं, वैसे ही अवैध निर्माण होते रहते हैं अथवा नई बनी सड़कें दोयम दर्जे के निर्माण के कारण ध्वस्त हो जाती हैं। इसी तरह करीब-करीब सभी शहरों में एक जैसे कारणों से हादसे होते रहते हैं, जिनमें लोग मरते भी हैं। कभी यह सामने आता है कि किसी जर्जर इमारत को दो से चार मंजिल का बना दिया गया और कभी यह कि आग की चपेट में आया कोई होटल या रेस्त्रां अवैध तरीके से संचालित हो रहा था और उसमें आग से बचाव के उपाय भी नहीं थे। यहां तक कि अग्निशमन विभाग का अनापत्ति प्रमाण पत्र भी नहीं था। यदि भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना है, सुशासन को सचमुच स्थापित करना है और भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनाना है तो शासन तंत्र का जवाबदेह होना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)





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