विचार: अवैध और अनियोजित निर्माण की बीमारी
देश में अवैध और अनियोजित निर्माण एक गंभीर समस्या है, जिसके कारण दिल्ली में इमारत गिरने और आग लगने जैसी घटनाओं में कई जानें गई हैं।
HighLights
अवैध निर्माण से इमारतें गिरतीं, आग लगती, जान जाती।
सरकारी लापरवाही, भ्रष्टाचार, वोट बैंक समस्या के कारण।
जवाबदेही की कमी, घटिया निर्माण से हादसे बढ़ते।
संजय गुप्त। देश की राजधानी में कुछ दिनों पहले अवैध रूप से बन रही एक इमारत गिरी, जिसमें छह लोगों की मृत्यु हो गई। इसके बाद अवैध तरीके से बनाए और संचालित किए जा रहे एक होटल में आग लगने से 21 लोगों की मौत हो गई। अपने देश में सरकारी तंत्र और अवैध निर्माण करने वालों की मिलीभगत से इस तरह की घटनाओं में जिस तरह जान-माल का नुकसान होता है, उसकी मिसाल मिलना बहुत मुश्किल है।
यह सिलसिला पिछले कई दशकों से चला आ रहा है, पर सुधार की कोई गुंजाइश नहीं दिखती। राजधानी सहित पूरे देश में नगर निकायों के नाकारापन से लोग अवैध तरीके से घर, होटल आदि बनाते रहते हैं। जब मानकों की अनदेखी करके अवैध-अनियोजित निर्माण होते हैं तो उनके गिरने के साथ-साथ अथवा उनमें सुरक्षा मानकों की अवहेलना के कारण आग लगने की घटनाएं होना स्वाभाविक है।
ज्यादातर मामलों में अवैध निर्माण कराने वाले अपनी कोई नैतिक जिम्मेदारी समझते नहीं। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि उन्हें कानून का डर नहीं। अपने देश में नियम-कानूनों की जैसी अनदेखी होती है, वह शायद ही कहीं और देखने को मिलती हो। देश में नियम-कानूनों के साथ अनुशासन और जिम्मेदारी का परिचय देने से भी इन्कार किया जाता है।
औसत लोग एक नागरिक की अपनी जिम्मेदारी समझने को तैयार नहीं होते, वही स्थिति सरकारी तंत्र के लोगों की भी है। नगर निकायों और शहरीकरण की निगरानी एवं नियमन करने वाले अधिकारियों का हाल शायद सबसे बुरा है। वे तमाम लापरवाही और भ्रष्टाचार के बाद भी ऐसी सजा नहीं पाते, जो नजीर बन सके।
नगर निकायों की लापरवाही के चलते अनियोजित निर्माण केवल शहरों के पुराने इलाकों के साथ उन ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं हो रहा है, जो समय के साथ शहरीकरण के दायरे में आ गए। अब तो यह विकास प्राधिकरणों की ओर से बसाए गए नए इलाकों में भी हो रहा है। कहीं लोग घरों को तोड़कर फ्लैट बना रहे हैं तो कहीं दुकानें और अन्य व्यासायिक भवन। ऐसे निर्माण में भवन निर्माण संबंधी मानकों के साथ सुरक्षा उपायों और खासकर आग से बचाव के उपायों की परवाह नहीं की जाती।
जब शहरों के पुराने या फिर ग्रामीण इलाकों में जर्जर भवनों में अतिरिक्त अवैध निर्माण होता है तो उनके गिरने का खतरा अधिक रहता है। आम तौर पर जब यह अवैध निर्माण हो रहा होता है तो उसे रोकने के लिए जिम्मेदार नगर निकायों के अधिकारी-कर्मचारी कोई कदम नहीं उठाते। ज्यादातर मामलों में वे पैसे लेकर अवैध निर्माण होने देते हैं। वे इसकी चिंता नहीं करते कि इससे क्षेत्र विशेष में आबादी का दबाव बढ़ेगा अथवा व्यावसायिक गतिविधियां संचालित होने से भीड़-भाड़ और प्रदूषण के साथ गंदगी बढ़ेगी तथा नागरिक सुविधाओं का अभाव बढ़ेगा।
कहने को तो शहरीकरण को लेकर हर तरह के नियम-कानून बने हुए हैं, लेकिन उनका उल्लंघन ही अधिक होता है। इस उल्लंघन का एक बड़ा कारण नगर निकायों के जनप्रतिनिधियों के साथ अन्य नेताओं की ओर से केवल अपने वोट बैंक को प्राथमिकता देना है। कई बार तो वे खुद ही अवैध निर्माण में सहयोग करते हैं और इसकी भी कोशिश करते हैं कि अवैध रूप से बसाई गईं बस्तियों का नियमितीकरण कर दिया जाए। सरकारें भी वोट बैंक के लोभ में ऐसा कर देती हैं। जब ऐसा होता है तो ऐसी बस्तियों में और अधिक अवैध निर्माण एवं अतिक्रमण होने लगता है।
आज कोई भी राजनीतिक दल अवैध-अनियोजित निर्माण को रोकने के लिए गंभीर नहीं। इसी कारण शहरों की सूरत बिगड़ती जा रही है और उनमें नागरिक सुविधाओं का अभाव बढ़ रहा है। चूंकि रिहायशी अथवा व्यावसायिक इमारतों में अवैध निर्माण के बाद भी सरकारी एजेंसियां कोई ठोस कार्रवाई नहीं करतीं, इसलिए उनके गिरने या उनमें आग लगने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। दिल्ली में ही पिछले कुछ माह में घरों, होटलों और कारखानों में आग लगने के कारण मरने और घायल होने वालों की संख्या बढ़ी है।
एक आंकड़े के अनुसार बीते पांच माह में दिल्ली में आग लगने की अलग-अलग घटनाओं में करीब 45 लोगों की जान गई है। अनेक घटनाओं में यह भी सामने आया कि कोई भवन गिरने या आग लगने पर बचाव कर्मियों को अतिक्रमण के चलते घटनास्थल पर पहुंचने में देरी हुई। इस देरी के चलते कई ऐसे लोगों की जान गई, जिन्हें बचाया जा सकता था। अवैध निर्माण की तरह से गलियों से लेकर मुख्य सड़कों तक में अतिक्रमण भी अपने देश की एक बड़ी समस्या है।
पिछले कुछ समय से देशवासियों को यह सपना दिखाई जा रहा है कि अगले लगभग 25 वर्षों यानी 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य पूरा कर लिया जाएगा, लेकिन विकसित राष्ट्र सिर्फ आर्थिक मजबूती से नहीं बनता और न ही कुछ क्षेत्रों में विकसित राष्ट्रों के पैमानों के हिसाब से प्रगति करने से। भारत विकसित राष्ट्र तब बनेगा, जब सरकारी एजेंसियां और देश के नागरिक नियम-कानूनों का पालन करेंगे। दुर्भाग्य से अपने देश में हर काम के लिए शार्ट कट खोज लिए गए हैं।
एक समस्या यह भी है कि देश में किसी भी तरीके का जो सार्वजनिक निर्माण हो रहा है, उसकी गुणवत्ता बहुत खराब होती जा रही है। चूंकि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता, इसलिए इंजीनियरों और ठेकेदारों को गुणवत्तापरक काम करने की आदत ही नहीं रह गई। जब भी घटिया निर्माण या फिर सुरक्षा उपायों की अनदेखी के कारण जान-माल की हानि होती है, तब मरने वालों के परिवार वालों को मुआवजा देने की घोषणा कर जांच बैठा दी जाती है।
फिर सालों तक मुकदमे चलते रहते हैं और जो लोग हादसों के लिए जिम्मेदार होते हैं, वे यदि गिरफ्तार भी होते हैं तो जमानत पर बाहर आ जाते हैं। इसी कारण सब कुछ पहले की तरह होता रहता है और कहीं कोई बुनियादी सुधार नहीं हो रहा है। ज्यादातर मामलों में लोग हादसों को भूल जाते हैं और जांच रपटें धूल फांकती रहती हैं। बार-बार एक जैसे कारणों से हादसे होना सरकारी तंत्र की नाकामी और उसकी कमजोर इच्छाशक्ति का ही परिचायक है। इस कमजोरी के कारण ही प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार व्याप्त है, जो समस्याएं बढ़ा रहा है।





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