विचार: कसी जाए मंत्रियों के चयन की कसौटी
एक सक्षम सरकार को अपने मंत्रियों और उनके मंत्रालयों के कामकाज की समीक्षा सतत करनी चाहिए, न कि साल-दो साल के अंतराल पर।
HighLights
केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल-विस्तार की चर्चा तेज।
मंत्रियों के चयन में योग्यता को प्राथमिकता देने पर जोर।
आगामी विधानसभा चुनाव और प्रदर्शन समीक्षा प्रमुख कारण।
राजीव सचान। इन दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल-विस्तार की चर्चा जोरों पर है। माना जाता है कि अगले कुछ दिनों में मोदी सरकार अपने इस तीसरे कार्यकाल में पहली बार मंत्रिमंडल में विस्तार के साथ फेरबदल भी कर सकती है। इसका एक कारण तो यह है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल के दो सदस्य पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा क्रमशः उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष बन गए हैं। दूसरा कारण दो मंत्रियों रवनीत सिंह बिट्टू और जार्ज कुरियन का राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त होना है। इनमें कुरियन ने तो त्यागपत्र दे दिया है और वह मंजूर भी हो गया है। रवनीत सिंह बिट्टू ने अभी त्यागपत्र नहीं दिया, लेकिन यह कहा है कि अब वे अपना ध्यान पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों पर केंद्रित करेंगे।
मोदी मंत्रिमंडल में विस्तार-फेरबदल का एक संभावित आधार आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों का भाजपा में शामिल होना, शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के छह लोकसभा सदस्यों का एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना में शामिल होकर सत्तापक्ष का संख्याबल बढ़ाना भी है। भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का संख्याबल इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सदस्य ममता बनर्जी से बगावत करके एक गुमनाम से दल नेशनल सिटिजंस पार्टी आफ इंडिया में शामिल होकर इस गठबंधन का हिस्सा बन गए हैं। इसी के साथ यह पार्टी राजग का सबसे बड़ा घटक बन गई है। उसने संख्याबल के मामले में तेलुगु देसम पार्टी, शिवसेना (शिंदे) और जनता दल-यू को भी पीछे छोड़ दिया है।
मोदी मंत्रिमंडल में विस्तार-फेरबदल का एक अन्य कारण यह गिनाया जा रहा है कि अगले वर्ष सात राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं और केंद्रीय मंत्रिमंडल में इन राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है। इस सबके अतिरिक्त केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल-विस्तार की चर्चा इसलिए भी हो रही है कि मंत्रियों के लगभग दो वर्ष के कामकाज की समीक्षा संभावित थी। इस समीक्षा के तहत मंत्री पदोन्नत या पदावनत हो सकते हैं। पता नहीं ऐसा होगा या नहीं, लेकिन आसार इसलिए अधिक हैं, क्योंकि भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन नवीन को भी अपनी टीम गठित करनी है और इसके तहत कुछ नेता संगठन से सरकार में और कुछ सरकार से संगठन में जा सकते हैं। चूंकि मोदी सरकार के पहले और दूसरे कार्यकाल में भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार होता रहा है, इसलिए इस बार भी ऐसा होना संभावित माना जा रहा है। अतीत में जब भी ऐसा हुआ है, तब कुछ केंद्रीय मंत्रियों की अप्रत्याशित रूप से छुट्टी हुई है और कुछ ऐसे चकित करने वाले चेहरे मोदी सरकार का हिस्सा बने, जिनके बारे में शायद ही किसी ने अनुमान लगाया हो।
यह मोदी सरकार की विशेषता है कि वह अपने फैसलों से चौंकाती है और ऐसे फैसले केवल मंत्रियों के चयन के मामले में ही नहीं होते रहे। मुख्यमंत्रियों के चयन के मामले में भी यह देखने को मिलता रहा है। आखिर किसने सोचा था कि राजस्थान में पहली बार विधायक बने भजनलाल शर्मा मुख्यमंत्री बना दिए जाएंगे? ऐसा ही दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के मामले में भी हुआ। मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों के अतिरिक्त राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष समेत अन्य अनेक पदों पर ऐसे लोग आए, जिनके बारे में किसी को भान नहीं था। आम लोगों और यहां तक कि राजनीतिक पंडितों के अनुमान से परे जाकर अप्रत्याशित फैसले लेना मोदी सरकार की एक खासियत अवश्य है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उसका हर चौंकाने वाला फैसला सटीक यानी मास्टर स्ट्रोक ही होता हो।
यह सही है कि कोई भी सरकार हो, उसके प्रमुख को अपने मंत्रियों का चयन करते समय सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों का ध्यान रखना ही पड़ता है, लेकिन ऐसा करते समय भी योग्यता को प्रथम वरीयता दी जानी चाहिए, क्योंकि कोई सरकार अपने मंत्रियों के कामकाज के आधार पर ही जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में समर्थ हो सकती है। लगभग प्रत्येक सरकार के मंत्रिमंडल में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो केवल सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों में संतुलन बैठाने का काम करते हैं, लेकिन जब ऐसा करते समय योग्यता और दक्षता को सर्वोच्च वरीयता नहीं दी जाती, तो इसके दुष्परिणाम संबंधित सरकार के साथ जनता को भी भोगने पड़ते हैं। किसी के लिए भी यह कहना कठिन होगा कि मोदी सरकार के सभी मंत्री कसौटी पर खरे साबित उतरे हैं।
एक सक्षम सरकार को अपने मंत्रियों और उनके मंत्रालयों के कामकाज की समीक्षा सतत करनी चाहिए, न कि साल-दो साल के अंतराल पर। इसी तरह इसका कोई औचित्य नहीं कि मंत्रियों को विधानसभा चुनावों का प्रभारी बना दिया जाए। यदि वे संगठन के लिए उपयुक्त हैं तो फिर उन्हें संगठन में स्थान दिया जाना चाहिए, न कि मंत्रिमंडल में। पिछले कुछ समय से यह एक चलन सा बन गया है कि जब भी कहीं विधानसभा चुनाव होते हैं तो महत्वपूर्ण केंद्रीय मंत्रियों को भी चुनाव प्रभारी या सह-प्रभारी बना दिया जाता है। हाल के विधानसभा चुनावों में भी यह देखने को मिला। क्या केंद्रीय मंत्रियों के पास इतना कम काम होता है कि वे अपने मंत्रालय का प्रभार छोड़कर पार्टी को विधानसभा चुनाव जिताने में लग जाएं?
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)





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