विचार: सवालों के घेरे में शिक्षा और परीक्षा
नीट-यूजी पेपर लीक के कारण परीक्षा रद्द होने से 22 लाख से अधिक छात्रों को निराशा हुई, जिससे एनटीए की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे।
HighLights
नीट-यूजी पेपर लीक से 22 लाख छात्र हुए निराश।
एनटीए की लापरवाही, कोचिंग माफिया का बढ़ता दखल।
परीक्षा सुधार हेतु राधाकृष्णन समिति की सिफारिशें लागू हों।
संजय गुप्त। पिछले दिनों मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की परीक्षा नीट-यूजी का पेपर लीक होने की सूचना मिलते ही सरकार ने उसे रद कर दोबारा कराने का फैसला किया। इससे 22 लाख से अधिक उन छात्रों का घोर निराश होना स्वाभाविक है, जो यह परीक्षा दे चुके थे। उन्हें उसी परीक्षा की दोबारा तैयारी करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसे वे दे चुके थे। छात्र प्रतियोगी परीक्षा देने के बाद तनाव मुक्त होकर परिणाम की प्रतीक्षा करते हैं। इस बार उनकी प्रतीक्षा लंबी तो हो ही गई, उन्हें दोबारा परीक्षा की तैयारी भी करनी पड़ी।
किसी भी छात्र के लिए उसी परीक्षा को उसी उत्साह से देना कठिन होता है, जिसे वे दे चुके होते हैं। नीट पेपर लीक मामले से परीक्षा आयोजित कराने वाली संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए को इसलिए कठोर निंदा का सामना करना पड़ा, क्योंकि उसकी सजगता में कमी के कारण ही नीट के पेपर लीक हुए। इसके बाद भी यह अच्छा हुआ कि पूरी परीक्षा रद करने का बड़ा फैसला लिया गया, ताकि छात्रों के हितों से खिलवाड़ न होने पाए। यदि इस पेपर लीक मामले का भंडाफोड़ नहीं होता या फिर उसकी अनदेखी की जाती तो लाखों छात्रों के साथ अन्याय हो गया होता।
इस मामले में पेपर तैयार करने वाले शिक्षकों के साथ कुछ कोचिंग केंद्र वाले भी कठघरे में हैं। नीट पेपर लीक की जांच कर रही सीबीआई ने यह पाया कि इस परीक्षा के पेपर कुछ कोचिंग चलाने वालों तक पहुंच गए और फिर उन्होंने देश के कई हिस्सों में उन्हें पहुंचाया और पैसे कमाए। ऐसा लगता है कि कोचिंग माफिया शिक्षा और परीक्षा, दोनों पर हावी हो गया है। ध्यान रहे इसके पहले भी कोचिंग माफिया कई प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक करा चुका है।
बीते दिनों नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति ने शिक्षा सचिव, एनटीए प्रमुख और उसके महानिदेशक सहित शिक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों को तलब किया। इस दौरान नीट रद होने के प्रकरण को राजनीतिक रंग देने की भी कोशिश की गई। इससे बात बनने वाली नहीं है। संसदीय समिति को तो यह देखना चाहिए कि भविष्य में ऐसी व्यवस्था बने, जिससे एनटीए की किसी भी परीक्षा में सेंध न लगने पाए। वैसे तो शिक्षा मंत्रालय ने एनटीए की व्यवस्था सुधारने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन उनकी गति धीमी रही।
2024 में नीट में गड़बड़ी सामने आने के बाद एनटीए के कामकाज में सुधार के लिए जिस राधाकृष्णन समिति का गठन किया गया था, उसके सभी सुझावों पर अभी तक अमल नहीं किया जा सका है। अब उन्हें लागू करने की पहल हो रही है। अच्छा हो कि परीक्षाएं आयोजित कराने वाले अन्य संस्थान भी इस समिति की सिफारिशों पर गौर करें, क्योंकि अपने देश में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने का रिकार्ड बहुत ही शर्मनाक हो गया है। आखिर विकसित देशों में परीक्षाओं के पेपर लीक क्यों नहीं होते? क्या कारण है कि यह बीमारी भारत में ही जड़ें जमाए हुए दिखती है? हम परीक्षाओं के आयोजन में उन तौर-तरीकों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते, जो विकसित देशों ने अपना रखे हैं?
एनटीए में सुधार को लेकर गठित राधाकृष्णन समिति ने यह सिफारिश की थी कि गड़बड़ियों से बचने के लिए प्रश्न पत्रों को फिजिकल रूप से केंद्रों तक ले जाने की प्रक्रिया को खत्म किया जाए। इसके बजाय कंप्यूटर आधारित परीक्षा कराई जाए और प्रश्न पत्र डिजिटल रूप से परीक्षा शुरू होने के ठीक पहले परीक्षा केंद्रों पर भेजे जाएं। इस समिति ने नीट को दो चरणों में आयोजित करने का सुझाव दिया था। पहला चरण स्क्रीनिंग टेस्ट का और दूसरा चरण मुख्य परीक्षा का। इस समिति ने यह पाया था कि एनटीए आउटसोर्सिंग और संविदा कर्मचारियों पर अधिक निर्भर है। इसे देखते हुए उसने सिफारिश की थी कि एनटीए में स्थायी विशेषज्ञों की भर्ती की जाए। इन सिफारिशों के अनुरूप परीक्षा कराने से पेपर लीक कराने वालों और खासकर कोचिंग माफिया को परीक्षा में सेंध लगाने का अवसर नहीं मिलेगा।
आज के एआई के युग में ऐसी व्यवस्था आसानी से बनाई जा सकती है कि हर विद्यार्थी को अलग प्रश्न पत्र मिले और डमी अभ्यर्थी परीक्षा में न बैठने पाएं। चूंकि आज भारत में लाखों परिवार अपने बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर बनाना चाहते हैं, इसलिए इनकी परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है। इसका लाभ कोचिंग केंद्र उठा रहे हैं। आज हर शहर और कस्बे में कोचिंग केंद्र खुल गए हैं। वे आठवीं के बाद ही छात्रों को कोचिंग में दाखिला लेने के लिए आकर्षित करने लगे हैं। हर स्तर पर बढ़ती कोचिंग संस्कृति शिक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल है।
आखिर क्या कारण है कि पहले किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के लिए छात्रों को कोचिंग की जरूरत नहीं पड़ती थी, लेकिन आज स्कूली स्तर की परीक्षाओं में भी उनकी सेवाएं लेना आवश्यक सा हो गया है? आज भारत में कोचिंग केंद्रों का एक बड़ा जाल फैल गया है और इसकी काट न तो शिक्षा संस्थान कर पा रहे हैं, न सरकार और न ही समाज। यह ठीक है कि कमजोर विद्यार्थियों को टयूशन या कोचिंग मिलनी चाहिए, पर ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि हर छात्र को ट्यूशन और कोचिंग का सहारा लेना पड़े। यह चिंताजनक है कि कोचिंग संस्कृति पर लगाम लगने के बजाय वह फलती-फूलती जा रही है। इससे तो स्कूलों और कालेजों की महत्ता ही खतरे में पड़ती जा रही है।
नई शिक्षा नीति में कोचिंग संस्कृति पर लगाम लगाने के कई उपाय किए गए हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि इसमें समय लगेगा, क्योंकि इस नीति पर पूरी तरह अमल होना शेष है। अभी भी कई शिक्षण संस्थान नई शिक्षा नीति को लागू करने में पीछे चल रहे हैं। कुछ राज्य सरकारों ने भी इस नीति को लेकर ढुलमुल रवैया अपना रखा है। बेहतर होगा कि इंटरमीडिएट स्कूल, जिनके छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग की परीक्षा देते हैं, वे नई शिक्षा नीति की मूल भावना को समझते हुए अपने शिक्षा ढांचे में व्यापक बदलाव लाएं, जिससे आने वाले वर्षों में जो डाक्टर और इंजीनियर तैयार हों, उनकी गुणवत्ता अच्छी हो। गुणवत्ता का ध्यान मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों को भी रखना होगा। तभी भारत अपने समक्ष उपस्थित चुनौतियों का सामना कर सकेगा।
[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]





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