विचार: तृणमूल के पराभव में सबके लिए सबक
स्पष्ट है कि जनता तृणमूल की सत्ता से विदाई की प्रतीक्षा कर रही थी कि समय आने पर वह उनको सबक सिखाएगी।
HighLights
बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को अप्रत्याशित हार मिली।
ममता बनर्जी की पार्टी अब अस्तित्व बचाने को जूझ रही।
क्षेत्रीय दलों को परिवारवाद, नेतृत्व पर पुनर्विचार करना होगा।
राहुल वर्मा। करीब दो महीने पहले तक ममता बनर्जी अजेय नजर आ रही थीं। बंगाल केंद्रित उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस अन्य राज्यों में विस्तार की योजनाओं में जुटी थी। कुछ राजनीतिक पंडितों को उनमें संभावनाएं दिख रही थीं कि विपक्षी नेताओं में केवल वही हैं, जो नरेन्द्र मोदी को चुनौती देकर भाजपा को केंद्र की सत्ता से बेदखल करने में सक्षम हैं। हालांकि इन दो महीनों में ही यह परिदृश्य नाटकीय रूप से बदल गया है। बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को ऐसी हार का सामना करना पड़ा, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। चुनावी मुकाबले में अक्सर कांटे की टक्कर वाली बात कही जाती है, लेकिन बंगाल के नतीजे यही रेखांकित करने वाले रहे कि यह राजनीतिक लड़ाई कितनी एकतरफा थी।
चुनावी पराजय तो ममता बनर्जी के लिए एक तात्कालिक मायूसी रही, लेकिन नतीजों के बाद उन्हें एक के बाद एक ऐसे झटके लगे कि अब वे अपनी बनाई पार्टी को ही बचाने के संघर्ष से जूझ रही हैं। असम से लेकर गोवा तक विस्तार की कवायद में लगी पार्टी को बंगाल में ही बचाना भारी पड़ता दिख रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को चुनौती देना तो छोड़िए, उन्हें अपनी बची-खुची पार्टी के कांग्रेस में विलय की नसीहतें दी जा रही हैं। पूरे राजनीतिक जीवन में आक्रामक तेवरों की राजनीति से पहचान बनाने वाली ममता बनर्जी अभी असहाय दिख रही हैं। उनकी इस स्थिति में तमाम अन्य दलों विशेषकर क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए बहुत सबक छिपे हुए हैं।
देश की वर्तमान राजनीतिक स्थितियों की चर्चा करें तो भाजपा अभी सबसे मजबूत दल है। देश के जिन हिस्सों के बारे में कहा जाता था कि वहां कभी कमल नहीं खिल सकता, वहां भी भाजपा के पूर्ण बहुमत की सरकार है। इसके उलट अगर क्षेत्रीय दलों की बात करें तो वे अपनी ही समस्याओं से त्रस्त हैं। ऐसे अधिकांश दल मुख्य रूप से क्षेत्रीय अस्मिता, उपराष्ट्रवाद और एक करिश्माई नेतृत्व के बूते ही पनपते रहे हैं। क्षेत्रीय अस्मिताओं के मुद्दे एक सीमा तक ही प्रभावी या उपयोगी हो सकते हैं। कुछ क्षेत्रीय दलों के संस्थापक या तो अब इस दुनिया में नहीं रहे और कुछ वृद्वावस्था से जुड़ी समस्याओं से भी जूझ रहे हैं। इस कारण इन दलों में अक्सर राजनीतिक उत्तराधिकार और विरासत को लेकर तकरार से जुड़े समाचार भी रह-रहकर सामने आते रहते हैं। रही सही-कसर लंबे समय से सत्ता से दूरी पूरी कर देती है, जहां कार्यकर्ताओं और समर्थकों का इनसे मोहभंग हो जाता है। तृणमूल से पहले महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी इन्हीं स्थितियों से दो-चार हो चुकी हैं।
इन तमाम कसौटियों पर तृणमूल का मामला एक कदम और आगे दिखता है। ममता बनर्जी की अपनी राजनीति का ब्रांड तो सादगी पर आधारित रहा, लेकिन वे इसे अपनी पार्टी में कायम नहीं रख पाईं। वामपंथी शासन वाले बंगाल में पहले कांग्रेस और फिर अपनी पार्टी बनाकर सत्ता के लिए संघर्ष कर रहीं ममता को नंदीग्राम-सिंगुर आंदोलन ने सरकार बनाने की चाबी सौंपी। अब या तो इसे इस आंदोलन की ऊर्जा कहें या बंगाल की राजनीति का चरित्र कि उनकी पार्टी का पूरे राज्य पर वर्चस्व स्थापित हो गया। ममता बनर्जी ने अपने स्तर पर तो सबको साथ लेकर चलने का भाव दिखाया, लेकिन उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी धीरे-धीरे सरकार और संगठन में हावी होते गए। कई वरिष्ठ नेता इसे लेकर असहज तो रहते, लेकिन कहते कुछ नहीं थे। स्थानीय नेताओं को आलाकमान से मिली छूट ने भी तृणमूल का बेड़ा गर्क किया, क्योंकि दबंग प्रवृत्ति के इन नेताओं ने अपने क्षेत्रों को अपनी जागीर समझकर उसे उगाही का जरिया बना लिया था। आम जन के लगभग हर मामले में उनके दखल से जनता के मन में असंतोष एवं आक्रोश पनपने लगा, जिसकी अभिव्यक्ति इस समय राज्य के विभिन्न हिस्सों में देखने को भी मिल रही है।
स्पष्ट है कि जनता तृणमूल की सत्ता से विदाई की प्रतीक्षा कर रही थी कि समय आने पर वह उनको सबक सिखाएगी। यह इससे और स्पष्ट होता है कि हार तो अन्य राजनीतिक दलों के हिस्से में भी आती है, लेकिन हारने के बाद पार्टी के नेताओं को ऐसे विरोध का सामना नहीं करना पड़ता, जैसा तृणमूल के नेताओं को करना पड़ रहा है। यही कारण है कि राज्य से लेकर केंद्रीय स्तर के नेता तृणमूल या उसके शीर्ष नेतृत्व से अपना पीछा छुड़ाने को प्राथमिकता देते दिख रहे हैं। पार्टी के विधायकों से लेकर सांसद तक विभाजित हो गए हैं। अन्य दलों से तुलना करें तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर हैं, लेकिन वहां कभी ऐसी भगदड़ देखने को नहीं मिली। बंगाल के पड़ोसी ओडिशा में तो नवीन पटनायक की बीजद बहुत लंबे समय तक सत्ता में रही, लेकिन सत्ता से बेदखल होने के बाद भी राज्य में पार्टी के नेताओं को न तो ऐसे विरोध का सामना करना पड़ा और न ही वहां नेताओं में ऐसी भगदड़ देखी गई। हालिया चुनाव के बाद तमिलनाडु में द्रमुक और अन्नाद्रमुक के धड़ों के बीच भी कुछ खटपट हुई, लेकिन कुछ ही समय में सब कुछ शांत भी हो गया।
इन परिस्थितियों का सार यही है कि राजनीतिक दलों विशेषकर क्षेत्रीय दलों को समय के साथ अपना रवैया सुधारना होगा। अब परिवार केंद्रित राजनीति की समीक्षा करनी होगी, क्योंकि जनता से लेकर कार्यकर्ताओं की कसौटी पर इसे निरंतर कसा जाएगा। करिश्माई नेताओं के भरोसे रहने वाली पार्टियों को समय के साथ उनके विकल्प भी तैयार करने होंगे। पार्टियों को केवल सत्ता के गोंद से नेताओं को चिपकाए रखने के बजाय वैचारिक घुट्टी पिलाने को भी प्राथमिकता देनी होगी। तृणमूल के पराभव में इसी पहलू की सबसे अहम भूमिका रही। वैसे तो ये समस्या क्षेत्रीय दलों तक ही सीमित नहीं है, क्योंकि कांग्रेस भी इन पहलुओं को लेकर कहीं ज्यादा परेशान है। वहीं, सत्तारूढ़ भाजपा को भी समझना होगा कि सत्ता का संकेंद्रण और कुछ चेहरों पर अतिशय निर्भरता दूरगामी भविष्य के लिए बहुत सकारात्मक नहीं होगी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं सेंटर फार पालिसी रिसर्च में फेलो हैं)





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