शिवकांत शर्मा। वेनेजुएला पर हमला करके उसके राष्ट्रपति मादुरो को पत्नी समेत अगवा करा लेने के बाद से राष्ट्रपति ट्रंप ने डेनमार्क के स्वायत्त द्वीप ग्रीनलैंड को छीनने की मुहिम तेज कर रखी है। ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है जो कनाडा और यूरोप के बीच उत्तरी अटलांटिक महासागर में फैला है। उत्तरी ध्रुव से सटा होने के कारण तटवर्ती पट्टियों को छोड़कर इसका 80 प्रतिशत से अधिक भूभाग बर्फ की एक से तीन किमी मोटी परत से ढका रहता है। दक्षिणी ध्रुव के बाद सबसे अधिक बर्फ ग्रीनलैंड की इस परत में ही जमा है जो जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से पिघल कर किनारों की तरफ खिसक रही है।

ग्रीनलैंड के साथ-साथ उत्तरी ध्रुव सागर की बर्फ भी तेजी से पिघल रही है जिसकी वजह से समुद्री यातायात के नए जलमार्ग खुल रहे हैं जो रूस, चीन और जापान से उत्तरी अमेरिका और यूरोप की दूरी को बहुत कम कर देते हैं। उत्तरी ध्रुव सागर से ग्रीनलैंड सागर होते हुए उत्तरी अटलांटिक महासागर में खुलने वाले इन मार्गों का प्रयोग करने के लिए रूस और चीन अपने विशेष युद्धपोतों और पनडुब्बियों का विकास कर रहे हैं ताकि वहां अपना वर्चस्व कायम कर सकें। इस जलमार्ग पर स्थित होने के कारण ग्रीनलैंड का भूराजनीतिक और सामरिक महत्व हमेशा से रहा है।

दूसरे महायुद्ध में उसने हिटलर के युद्धपोतों और पनडुब्बियों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। युद्ध के बाद राष्ट्रपति ट्रूमैन ने इसे 10 करोड़ डॉलर के सोने से खरीदने का प्रयास किया, पर बात नहीं बनी। उसके बाद 1951 में डेनमार्क ने अमेरिका को ग्रीनलैंड की रक्षा में विशेष भूमिका देते हुए सैनिक अड्डे बनाने का अधिकार दे दिया था। इसके अलावा ग्रीनलैंड में तेल, गैस और उन दुर्लभ खनिजों के भंडार भी हैं जो इलेक्ट्रॉनिक और रक्षा उपकरणों और स्वच्छ ऊर्जा की बैटरियों के लिए आवश्यक होते हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि उत्तरी ध्रुव और उत्तरी अटलांटिक महासागर में रूस और चीन के बढ़ते खतरे को देखते हुए ग्रीनलैंड पर अमेरिका का स्वामित्व होना आवश्यक है। इसके बिना न ग्रीनलैंड अपनी रक्षा कर पाएगा और न वे उसकी रक्षा कर सकेंगे। इसलिए सीधे या टेढ़े रास्ते से वे उसे लेकर रहेंगे। उन्होंने भी ग्रीनलैंड को खरीदने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने कहा उनका देश बिकाऊ नहीं है। डेनमार्क अमेरिका का दो सौ साल पुराना दोस्त है और स्थापना के समय से ही नाटो का सदस्य रहा है।

उसने कोई 300 वर्ष पहले ग्रीनलैंड को अपना उपनिवेश बनाया था, परंतु 1979 के बाद से ग्रीनलैंड पूरी तरह स्वायत्त है। केवल विदेश नीति और रक्षा डेनमार्क संभालता है, क्योंकि ग्रीनलैंड के पास अपनी सेना नहीं है। उसके सभी 56 हजार इन्युइट आदिवासियों को डेनिश नागरिकता प्राप्त है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नील्सन का कहना है कि यदि उन्हें अमेरिका और डेनमार्क में से एक को चुनना पड़ा तो वे डेनमार्क में रहना पसंद करेंगे।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर या कोई भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था किसी भी महाशक्ति को किसी दूसरे देश की संप्रभुता जबरन छीनने का अधिकार नहीं देती, लेकिन हाल के एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, ‘उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून की जरूरत नहीं है।’ सवाल यह है कि यदि ट्रंप सहयोग करने और सुविधाएं देने के लिए तैयार एक संप्रभु मित्र देश को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जबरन हथियाना आवश्यक और वैध मानते हैं तो उनमें और पुतिन में क्या फर्क है? बल्कि पुतिन तो उनकी तुलना में नेक काम कर रहे हैं, क्योंकि उनके शब्दों में, उनकी सैनिक कार्रवाई तो ‘यूक्रेन से नात्सीवादी ताकतों का सफाया कर नाटो की बढ़त को रोकने के लिए है।’

ट्रंप की दलील के आधार पर चीन का ताइवान पर कब्जा कर लेना तो और भी जायज माना जाएगा, क्योंकि शी चिनफिंग तो अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए टूट कर अलग हुए देश और समाज के हिस्से को जोड़ने का कार्य करेंगे। दूसरे महायुद्ध के बाद एक नियमबद्ध व्यवस्था की स्थापना करके राष्ट्रीय संप्रभुता, लोकतंत्र और मुक्त व्यापार की हिमायत करते आ रहे देश के राष्ट्रपति का अंतरराष्ट्रीय कानून का इस तरह मखौल उड़ाना विश्व व्यवस्था के लिए गंभीर संकट का संकेत है। इस स्थिति के लिए काफी हद तक यूरोपीय संघ और अमेरिका से इतर नाटो के देश खुद जिम्मेदार हैं।

ट्रंप और उनकी सरकार के आपत्तिजनक बयानों का एक सुर में कड़ा विरोध करने और ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए नाटो सेनाओं को तैनात करने के बजाय वे उसी तरह की जी हुजूरी में लगे हुए हैं, जैसी ट्रंप के मनमाने टैरिफों के एलान पर की थी। यूक्रेन पर रूसी हमले की कड़ी निंदा से बचने के लिए भारत और चीन जैसी दक्षिणी गोलार्ध की प्रमुख शक्तियों की निंदा करने वाले यूरोपीय देशों ने वेनेजुएला पर ट्रंप के हमले पर जैसी बगलें झांकीं, उससे भी उनकी खासी फजीहत हो रही है।

अब जब ग्रीनलैंड और डेनमार्क की संप्रभुता को लेकर पानी सिर से ऊपर जा चुका है तब भी डेनमार्क के साथ केवल ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे चंद देशों ने ही अपनी टुकड़ियां ग्रीनलैंड भेजी हैं। इन मुट्ठी भर देशों की हिम्मत तोड़ना ट्रंप के लिए बाएं हाथ का खेल है। उन्होंने दबाव बढ़ाने के लिए यूरोप के आठ देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का एलान कर दिया है और उसे 25 प्रतिशत तक बढ़ाने की धमकी दी है। इस पर नाटो और यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया नाराजगी भरी है, लेकिन यह पता नहीं कि ट्रंप से टक्कर लेने के मामले में वे कितने पानी में हैं।

नाटो की एक समस्या यह है कि एक पर हमला सभी पर हमले का सिद्धांत नाटो के ही किसी सदस्य पर दूसरे सदस्य के हमले की स्थिति में स्पष्ट नहीं है। मिसाल के तौर पर 1974 में साइप्रस द्वीप पर फैली हिंसा में जब नाटो सदस्य तुर्किये ने दूसरे नाटो सदस्य ग्रीस पर हमला बोल दिया था तब नाटो के समक्ष धर्मसंकट खड़ा हो गया था कि किसका पक्ष ले। अंत में अमेरिका ने बीच-बचाव कर सुलह कराई थी। ट्रंप के ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लेने से और भी गंभीर संकट खड़ा हो सकता है, जिसके लिए नाटो अभी तैयार नजर नहीं आता।

(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)