राजीव सचान। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अपनी अगली पोस्ट में क्या लिखेंगे, यह वे खुद भी नहीं बता सकते, क्योंकि वे प्रायः अपनी नई पोस्ट में जो कुछ लिखते हैं, वह पिछली पोस्ट के विपरीत होता है। ऐसा किसी एक विषय पर नहीं, हर विषय पर होता है- चाहे वह टैरिफ का मामला हो या फिर ग्रीनलैंड का अथवा ईरान का। भारत के बारे में भी उनके बयान विरोधाभासी रहे हैं। हाल में उन्होंने उस पोस्ट का समर्थन किया, जिसमें भारत को धरती का नरक कहा गया था। दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास को लगा कि ट्रंप कुछ बेतुका बोल गए तो उसने बयान जारी किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति की दृष्टि में भारत एक महान देश है और उसके शीर्ष नेता उनके मित्र हैं।

आम तौर पर जब कोई ऐसी लीपापोती करता है तो उसे कहते हैं- दूसरे की गंदगी साफ करना। अमेरिकी राष्ट्रपति के सहयोगियों को यह काम कुछ ज्यादा ही करना पड़ता है, क्योंकि वे कभी भी कुछ भी कह जाते हैं और कभी-कभी तो घोर असंसदीय और फूहड़ भी। उनके विरोधाभासी, झूठे, अतिरंजित और अपमानजनक बयानों का हिसाब रखना कठिन है, क्योंकि वे हर दिन और करीब-करीब हर मामले में ऐसा ही करते हैं। उन्हें अपने ही बयानों से मुकरने या उनके ठीक विपरीत कहने में कोई शर्म-संकोच नहीं होता। इसके बावजूद खास बात यह है कि वे खुलकर बोलते हैं।

ट्रंप ने पूरी दुनिया को तंग कर रखा है- दुश्मनों से ज्यादा दोस्तों को। इसीलिए अधिकतर देश उनसे सशंकित हैं। यूरोपीय देशों के साथ-साथ जापान, दक्षिण कोरिया जैसे अमेरिका के करीबी देश भी ट्रंप को लेकर आशंका से भरे हुए हैं और भारत के साथ उन्होंने जैसा व्यवहार, बल्कि कहें कि दुर्व्यवहार किया है, उससे वे भारतीयों के मन से उतर चुके हैं। अस्थिर स्वभाव वाले अविश्वसनीय शासनाध्यक्ष के अतिरिक्त अन्य किसी रूप में ट्रंप की व्याख्या करना कठिन है। वे खुद को शांति का राष्ट्रपति बताते हैं और किसी न किसी देश को धमकी भी देते रहते हैं-कभी टैरिफ थोपने की, कभी प्रतिबंध लगाने और कभी-कभी तो हमला करने की भी। वे नोबेल शांति सम्मान पाने के लिए बेचैन थे, लेकिन यह बेचैनी न तो पिछले साल ईरान पर हमला करने में आड़े आई और न ही इस साल वेनेजुएला पर।

पिछले साल उन्होंने ईरान पर इजरायल के हमलों का समापन खुद उस पर हमला करके किया था। फिर उन्होंने इस साल के प्रारंभ में वेनेजुएला पर हमला करके उसके राष्ट्रपति को पत्नी समेत अगवा कर लिया। उन्होंने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर इस साल फऱवरी में फिर से तब हमला बोला, जब उससे बातचीत कर रहे थे। यह युद्ध करीब 40 दिन तक चला, फिर वे इस युद्ध से निकलने की राह तलाशने लगे और इसी के नतीजे में दो सप्ताह के लिए युद्धविराम हुआ। इस युद्धविराम के दौरान ईरान से बातचीत विफल होने के बाद उन्होंने उसे अनिश्चतकालीन के लिए बढ़ा दिया, लेकिन ऐसा करने के पहले उसकी नाकेबंदी का फैसला ले लिया। वह अब तक जारी है।

आज स्थिति यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम तो कायम है, लेकिन होर्मुज समुद्री मार्ग बंद है। इसका मतलब है कि यह युद्धविराम खाड़ी देशों से ऊर्जा आपूर्ति को उसी तरह बाधित किए हुए है, जैसे 40 दिनों के युद्ध के समय था। सच तो यह है कि युद्ध के दौरान तो तेल और गैस से लैस इक्का-दुक्का जहाज होर्मुज से गुजर भी रहे थे, लेकिन अब उनका इस संकरे समुद्री मार्ग से आना-जाना लगभग ठप है। इस युद्ध विराम ने अमेरिका-इजरायल और ईरान की सेनाओं को भले ही चैन की सांस लेने का मौका दिया हो, पर शेष विश्व को इससे कोई राहत नहीं। अब होर्मुज इसलिए बाधित है, क्योंकि ईरान का कहना है कि उसकी अमेरिकी नाकेबंदी युद्धविराम का उल्लंघन है और इसलिए वह किसी भी जहाज को तब तक यहां से नहीं निकलने देगा, जब तक उसकी नाकेबंदी खत्म नहीं हो जाती। अमेरिकी सेना ईरान की नाकेबंदी करने में तो सफल है, पर इतनी सक्षम नहीं है कि वह होर्मुज से जहाजों को सुरक्षित निकाल सके।

निःसंदेह ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका मनमानी करने में तो समर्थ है, लेकिन अब उसकी पहले जैसी धमक-हनक नहीं रही। इसके बाद भी ट्रंप को लगता है कि दुनिया को वही चला रहे हैं। अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान तबाह भले ही हो गया हो, पर उसने ट्रंप की हालत पतली भी कर दी है। वास्तव में इसी का परिणाम है युद्धविराम का विस्तार। ईरान यह समझ गया है कि ट्रंप चाहे जितनी धमकियां दें, लेकिन उनके लिए दोबारा युद्ध छेड़ना आसान नहीं।

ट्रंप ने एक साक्षात्कार में दावा किया था कि ईरान की सैन्य शक्ति पूरी तरह खत्म हो गई है और उसके पास कुछ नहीं बचा है। फिर उन्होंने बताया कि ईरान अभी भी अमेरिकी सेना और सहयोगियों पर हमला करने की क्षमता रखता है। उनका एक दावा यह था कि अमेरिका ने अपने सभी प्रमुख रणनीतिक लक्ष्य हासिल कर लिए हैं, लेकिन फिर उनसे ही यह सुनने को मिला कि अमेरिका अपने लक्ष्यों को पूरा करने के निकट है। एक बार उन्होंने कहा कि अमेरिका का होर्मुज पर पूरा नियंत्रण है, फिर कुछ ही दिन बाद बोले कि एशियाई और यूरोपीय देश आगे आएं और होर्मुज खोलें, क्योंकि अमेरिका को वहां के तेल की उतनी जरूरत नहीं। आखिर ऐसे विचित्र बयान देने वाले पर कोई भरोसा कैसे कर सकता है?

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)