50 साल पहले Box Office पर ब्लॉकबस्टर रही थी फिल्म, देशभक्त की छवि छोड़ 'दस नंबरी' बनकर छाए थे Manoj Kumar
70 के दशक में मनोज कुमार (Manoj Kumar) की 50 साल पुरानी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता से इतिहास रच दिया था। ...और पढ़ें

50 साल पुरानी ब्लॉकबस्टर फिल्म की कहानी। फोटो क्रेडिट- एक्स

समय कम है?
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संजीत नार्वेकर, मुंबई। 17 अप्रैल 1976 को प्रदर्शित हुई उस साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में से एक थी 'दस नंबरी' (Dus Numbri)। निर्देशक मदन मोहला (Madan Mohla) की इस फिल्म ने मनोज कुमार (Manoj Kumar) की देशभक्त छवि से हटकर उन्हें एक धोखेबाज, लेकिन दिल के साफ नायक के रूप में पेश किया था। हालांकि, फिल्म का संदेश अंत में अच्छाई की जीत ही था, लेकिन उनका यह ग्रे-शेड वाला किरदार काफी सराहा गया।
बड़े पर्दे पर बदली अपनी छवि
जब मनोज कुमार 'दस नंबरी' में मुख्य भूमिका निभाने आए, तब तक वे एक स्टार-फिल्ममेकर के तौर पर बहुत बड़ी शोहरत हासिल कर चुके थे। उन्होंने 'शहीद', 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम', 'रोटी कपड़ा और मकान' जैसी जबरदस्त देशभक्ति वाली फिल्में बनाई थीं और उनकी करियर की सबसे बेहतरीन फिल्म 'क्रांति' तो अभी आनी बाकी थी।
उनकी दूसरी रोमांटिक हिट फिल्मों जैसे 'हिमालय की गोद में', 'दो बदन', 'पत्थर के सनम' या उनकी मिस्ट्री थ्रिलर फिल्मों जैसे 'वो कौन थी', 'गुमनाम' और 'अनीता' की तो बात ही अलग है। उन्होंने यह भी साबित कर दिया था कि वे किसी भी बड़े स्टार के सामने अपनी पहचान बनाए रख सकते हैं।
क्या है दस नंबरी फिल्म की कहानी?
बेटा अर्जुन (मनोज कुमार) बड़ा होकर छोटा-मोटा अपराधी बन जाता है (जैसा कि फिल्म के शीर्षक 'दस नंबरी' से जाहिर है)। अपने आपराधिक कारनामों के दौरान उसकी मुलाकात रोजमेरी फर्नांडिस (हेमा मालिनी द्वारा अभिनीत-जो इस भूमिका के लिए एक अप्रत्याशित और स्पष्ट रूप से बेमेल चुनाव लगती हैं) से होती है, जो एक छोटी-मोटी चोर और ताश के खेल में माहिर है और अर्जुन को उससे प्यार हो जाता है।
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फिल्म के कलाकारों ने भरी थी जान
मनोज कुमार की पुरानी और भरोसेमंद कलाकारों की टोली से चुने गए कई अन्य जाने-पहचाने किरदार भी इस फिल्म को जरूरी सहारा देते हैं। इनमें अभि भट्टाचार्य और कामिनी कौशल ईमानदार, लेकिन बदनसीब माता-पिता की भूमिका में हैं। प्रेमनाथ इंस्पेक्टर जयचंद के किरदार में हैं जो अपनी भूमिका से कहीं ज्यादा बड़े और बेहद शोर-शराबे वाले इंसान हैं और भ्रष्टाचार की जीती-जागती मिसाल हैं।
प्राण दोहरी भूमिका में हैं- एक भ्रष्ट हवलदार के तौर पर और दूसरे सीबीआइ अधिकारी के तौर पर, जो नायक की मदद करके अपराधियों को कानून के शिकंजे में लाने में उसकी सहायता करते हैं। इस तरह यह फिल्म धीरे-धीरे अपने जाने-पहचाने और पारंपरिक अंजाम की ओर बढ़ती है।