60 साल पुरानी ये कल्ट फिल्म मिस्ट्री थ्रिलर में है सबकी बाप, Sunil Dutt बॉक्स ऑफिस पर लेकर आए थे तूफान
सुनील दत्त की 60 साल पुरानी सस्पेंस थ्रिलर बार-बार देखने पर भी दर्शकों को बांधे रखती है। इसका गीत, संगीत व फिल्मांकन अपने आप में लाजवाब था। ...और पढ़ें

सस्पेंस थ्रिलर की कहानी आज भी नहीं करती बोर। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
राहुल रवेल, मुंबई। राज खोसला साहब को सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों को खूबसूरती से फिल्माने में महारत हासिल थी। वे अल्फ्रेड हिचकाक के प्रशंसक थे, पर खुद खोसला साहब की सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों में एक नया ही स्टाइल दिखता है। सामान्यत: अल्फ्रेड हिचकाक की फिल्मों में आरंभिक दो-तीन दृश्यों में ही मर्डर सामने आता है, फिर शुरू होती है हत्यारे तक पहुंचने की गुत्थी सुलझाने की कोशिश।
हर दृश्य सस्पेंस पैदा करता है कि कहीं खूनी सामने मौजूद पात्र तो नहीं है। ये उनकी फिल्मों की खासियत थी, अब आप राज खोसला साहब की सस्पेंस फिल्मों को देखिए। 'मेरा साया' फिल्म में कोई मर्डर नहीं होता। हालांकि, पहले ही दृश्य में सुनील दत्त जी (Sunil Dutt) के पात्र राकेश की पत्नी गीता बनीं साधना को उनकी ही बाहों में दम तोड़ते देखा जाता है। गम का माहौल है।
फिल्म की कहानी
फिर कुछ ही दृश्यों में एक नई पहेली खड़ी हो जाती है। साधना की हमशक्ल डकैत को पुलिस सामने लेकर आती है, पर उसका दावा है कि वह राकेश की पत्नी है। इस दावे का सच सामने लाने की गुत्थी सुलझाने की कोशिश में मामला अदालत पहुंचता है। हर दृश्य से सस्पेंस बढ़ता है। एक ओर सुनील दत्त हैं जो जब गवाह के रूप में विटनेस बॉक्स में आते हैं तो उनका अंदाज अलग दिखता है, पर जब काला कोट पहनकर अदालत में जिरह करते हैं तो लगता है मानो अलग इंसान सामने है।
वहीं साधना को देखिए, सामान्यत: ऐसी परिस्थिति में महिला बेबस महसूस करती है, पर साधना एक सशक्त स्त्री के तौर पर सामने आती हैं। जब वो ये कहती हैं कि मुझे अपने पति से अकेले में कुछ बात करनी है। जज उनकी बात को मान लेते हैं और दोनों को अकेले में बात करने के लिए कुछ समय दिया जाता है। एकांत में वार्तालाप के उस दृश्य में कोई संवाद नहीं हैं। बस दोनों के चेहरे पर एक्सप्रेशन दिखते हैं।
खबरें और भी
फिल्म का क्लाइमैक्स करता है शॉक
जब सुनील दत्त कमरे से निकलते हैं तो उनके मुंह से एक शब्द निकलता है इंपॉसिबल। बिना संवादों के ही बहुत कुछ कह जाने वाला ये क्लाइमेक्स जबरदस्त था। राज खोसला साहब की फिल्मों की जान होता था संगीत। यह शायद इस वजह से भी था कि वह संगीत जगत में करियर बनाने के इरादे से मुंबई आए थे, पर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था। गुरु दत्त और देव आनंद के साथ जुड़कर बतौर निर्देशक उन्हें फिल्म 'सीआईडी' से पहचान मिली। हालांकि, संगीत से लगाव कम नहीं हुआ। उनकी फिल्म में संगीत भी कहानी की लय में चलता था।
फिल्म का संगीत हुआ अमर
'मेरा साया' फिल्म के साथ भी ऐसा ही है। फिल्म की कहानी में सस्पेंस है, पर पति-पत्नी के बीच फ्लैशबैक में दिखता रोमांस और मदन मोहन का मधुर संगीत फिल्म की जान है। रजा मेहदी अली खान साहब द्वारा लिखे 'झुमका गिरा रे' गाने में साधना के सिर्फ डांस स्टेप्स ही नहीं, बल्कि चेहरे के भाव भी उसे खास बनाते हैं।
इसमें डांस कोरियोग्राफी से इतर निर्देशक का ही नजरिया झलकता है। आजकल तो बैकग्राउंड डांसर्स की भीड़ रहती है। पापा (एच.एस. रवेल) की फिल्म 'मेरे महबूब' के दौरान साधना से मेरी मुलाकात हुई थी। उनका अभिनय, स्टाइल और एलीगेंस कमाल का था।
यह भी पढ़ें- 65 सालों से प्यार की परिभाषा बयां कर रहा Asha Parekh का ये सॉन्ग, कल्ट गाना इंस्टाग्राम पर बना रील्स का अड्डा
कमाल का था राज खोसला का निर्देशन
राज खोसला साहब जैसे फिल्मकार विरले ही हैं। उनकी फिल्ममेकिंग की खूबी थी कि कैमरे और लाइटिंग उपकरणों को एक जगह प्लेस करते थे, उसके सामने की चीजें बदलती रहती थीं जैसे पर्दे या फर्नीचर बदल दिया। कैमरे का एंगल ऊपर-नीचे होता था, पर उसकी पोजिशनिंग वही रहती थी।
फिल्म 'बॉबी' के दौरान जब मैं राज कपूर को असिस्ट कर रहा था तो उन्हें भी ऐसे ही फिल्मांकन करते देखा था। वो भी कैमरे को एक जगह सेट करते थे और उसके सामने की चीजें बदलते रहते थे। फिल्मांकन का ये तरीका अपनाने पर समय की काफी बचत होती थी। जो शूटिंग कई दिन का समय लेती थी, उसे वे महज कुछ ही घंटों में पूरा कर लेते थे। फिल्म की बारीकियों पर ध्यान से लेकर हर चीज को योजनाबद्ध तरीके से करने का यह जुनून ही इन मास्टर्स को खास बनाता है।