Daadi Ki Shaadi Review: आइडिया दिलचस्प, लेकिन भाषण ज्यादा; इमोशनल मैसेज देने आई कहानी कहां पड़ी फीकी?
फिल्म 'दादी की शादी' का आइडिया दिलचस्प है, लेकिन कमजोर लेखन और उपदेशात्मक पटकथा के कारण यह अपनी लय खो देती है। नीतू कपूर के बेहतरीन अभिनय के बावजूद, क ...और पढ़ें

दादी की शादी फिल्म का रिव्यू। फोटो क्रेडिट- जागरण ग्राफिक्स

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। फिल्म में एक संवाद है कि अच्छे पैरेंट्स बनने के लिए अच्छी संतान बनना बहुत जरूरी है। यानी इंसान जिस तरह अपने माता-पिता के साथ व्यवहार करता है, वही संस्कार और समझ आगे चलकर उसके अपने बच्चों की परवरिश में दिखाई देते हैं।
पारिवारिक कॉमेडी ड्रामा ‘दादी की शादी’ (Daadi Ki Shaadi) के जरिए पारिवारिक रिश्तों, बुजुर्गों के अकेलेपन और व्यस्त जिंदगी में टूटते संवादों को फिल्म में हल्के-फुल्के अंदाज में कहने की कोशिश हुई है।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी यूं है कि दिल्ली में संयुक्त परिवार में रह रहे टोनी कालरा (कपिल शर्मा) के दादाजी (योग राज सिंह कालरा) उसकी शादी को लेकर परेशान है। तीन साल में 300 लड़कियों को देखने के बावजूद कहीं बात नहीं बनी है। कनु आहूजा (सादिया खतीब) का रिश्ता टोनी के लिए आता है। दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते होते थे, लेकिन कनु उससे अनजान होती है। कनु की शर्त है कि शादी से पहले दूल्हे और उसके परिवार को समझना चाहती है और शादी दो साल बाद करेगी।
दरअसल, कनु का इरादा शादी करने का नहीं है। वह अपना करियर बनाना चाहती है और विदेश में बसना चाहती है। सगाई के दिन खबर आती है कि कनु की दादी विमला आहूजा (नीतू कपूर) शादी करने वाली है। शिमला में आलीशान घर में रह रही विमला पारंपरिक दादी से अलग फिट और स्टाइलिश है।
उसके दोनों बेटे जीवन (दीपक दत्ता) और नाग (जितेंद्र हुड्डा) और बेटी सुनैना (रिद्धिमा कपूर साहनी) अपनी-अपनी जिंदगी और परिवारों में इतने व्यस्त हैं कि उनके पास मां के लिए समय ही नहीं है, लेकिन विमला की दूसरी शादी की खबर सुनकर सभी को मजबूरन उनके पास आना पड़ता है।
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नाटकीय मोड़ों के बीच विमला बताती है कि वह कर्नल थरन देवराजन (आर सरथ कुमार ) साथ शादी कर रही हैं। पूरा परिवार शादी तुड़वाने की कोशिशों में लग जाता है।
कमजोर पड़ गया स्क्रीनप्ले
फिल्म की शुरुआत दिलचस्प और मनोरंजक लगती है। शीर्षक से लगता है कि यह बुजुर्ग प्रेम कहानी और पारिवारिक हास्य का खूबसूरत मेल होगी, लेकिन धीरे धीरे अपनी लय खो देती है। कमजोर लेखन की वजह से अहम मुद्दे को समुचित तरीके से प्रस्तुत नहीं कर पाती है।
आशीष आर. मोहन, बंटी राठौर और साहिल एस. शर्मा द्वारा लिखी गई पटकथा कई जगह बेहद उपदेशात्मक हो जाती है। फिल्म की दिक्कत यह भी है कि यह इमोशनल क्षणों में कहीं भी दिल को छूती नहीं है। मसलन जब मां के खर्चों को दोनों बेटे और बेटी गिनाना शुरू करते हैं तो प्रसंग कहीं भी झकझोरता नहीं है। मां का जुए में 17 करोड़ रुपये हार जाने का प्रसंग भी विश्वसनीय नहीं बन पाया है।
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फिल्म छोड़ जाती है कई सवाल
जीवन अपनी मां और भाई को बेटी की सगाई में क्यों नहीं बुलाता है, यह खटकता है। दादी बेहद फिट, स्टाइलिश और आत्मविश्वासी है, इसके बावजूद अपने बच्चों के पास रहने क्यों नहीं जाती, यह समझ से परे है। सुनैना अपने पति से अलग क्यों हुई? उसकी वजह भी स्पष्ट नहीं है। सात साल बाद पूरा परिवार एकत्र हुआ है, इसकी कोशिश विमला ने पहले क्यों नहीं की ? जैसे सवाल अनसुलझा है।
सिनेमैटोग्राफी रही दमदार
तकनीकी पक्ष की बात करें तो फिल्म की सिनेमैटोग्राफी नयनाभिरामी (मनमोहक) है। सिनेमेटोग्राफर मार्क नटकिंस और सुरेश बीसावेनी ने शिमला की खूबसूरती को आकर्षक तरीके से कैमरे में कैद किया हैं। एडिटर प्रोतिम खाउंड (Protim Khaound) चुस्त एडीटिंग से फिल्म की अवधि को थोड़ा कम कर सकते थे।
नीतू कपूर ने किया बेहतरीन काम
फिल्म में हल्के फुल्के हंसी के पल कपिल शर्मा और दीपक दत्ता की वजह से आते हैं। दोनों की कामिक टाइमिंग बांधे रखती है। नीतू कपूर फिल्म की आत्मा हैं। दादी विमला के किरदार में वह बेहद आकर्षक और सहज दिखती हैं। उनका स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को मजबूती देता है। फिल्म द डिप्लोमैट में गंभीर भूमिका के बाद सादिया खतीब को यहां पर कामेडी करने का अवसर मिला है। अपनी भूमिका के अनुरुप वह मासूम और सुंदर लगी हैं। कर्नल की भूमिका में आर. सरथकुमार सहज नजर आते हैं।
फिल्म देखनी चाहिए या नहीं?
नीतू कपूर की रियल बेटी रिद्धिमा कपूर ने इस फिल्म से अभिनय में कदम रखा है। वह अपनी भूमिका में स्टाइलिश ज्यादा लगी हैं। सहयोगी भूमिका में जितेंद्र हुड्डा, तेजस्विनी कोल्हापुरे अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करते हैं। उन्हें कहीं-कहीं चुटकीले संवाद भी मिले हैं।
कुल मिलाकर दादी की शादी को बनाने के पीछे इरादा नेक है, लेकिन ढीली पटकथा, जरूरत से ज्यादा नाटकीयता और बार-बार दिए गए संदेश फिल्म के प्रभाव को कमजोर कर देते हैं।
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