Pati Patni Aur Woh Do Review: गड़बड़ घोटाला है आयुष्मान की फिल्म, घिसी-पिटी कहानी में कॉमेडी कारगर; कहां चूकी?
Pati Patni aur Woh Do Movie Review: आयुष्मान खुराना की फिल्म 'पति पत्नी और वो दो' को सिनेमाघरों में देखने से पहले इसका रिव्यू पढ़ें। ...और पढ़ें

पति पत्नी और वो दो मूवी रिव्यू। फोटो क्रेडिट- इंस्टाग्राम

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स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई। हिंदी सिनेमा को लेखक और निर्देशक मुदस्सर अजीज (Mudassar Aziz) ने हैप्पी भाग जाएगी, हैप्पी फिर भाग जाएगी और खेल खेल जैसे कई शानदार कॉमेडी फिल्में दी है, लेकिन शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज उनकी फिल्म पति पत्नी और वो दो (Pati Patni Aur Woh Do) में ताजगी का अभाव नजर आता है।
यह फिल्म शादीशुदा आदमी की जिंदगी में शक और पुराने दोस्त की मौजूदगी से गलतफहमी जैसे घिसे-पिटे फॉर्मूलों को लेकर गढ़ी गई है। कागजों पर कहानी भले ही मजेदार लगी हो लेकिन पर्दे पर दिलचस्प नहीं बन पाई है।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी प्रयागराज में सेट है। वन विभाग में क्षेत्रीय वन अधिकारी प्रजापति (आयुष्मान खुराना) की पत्नी अपर्णा (वामिका गुब्बी) स्थानीय चैनल में रिपोर्टर है। प्रजापति के साथ अपर्णा की दोस्त नीलोफर (रकुल प्रीत सिंह) भी वन विभाग में कार्यरत है और उस पर नजर रखती है। अपर्णा विधायक गजराज तिवारी (तिग्मांशु धूलिया) के बेटे सनी (विशाल वशिष्ठ) का रिश्ता एक लड़की के साथ होने की खबर ब्रेक करती है।
गजराज कट्टर जातिवादी है। यह लड़की प्रजापति की दोस्त चंचल (सारा अली खान) होती है। सनी और चंचल के बीच जाति बाधा बनती है। गजराज ने लड़की का पता लगाने पर अपर्णा को उसका चैनल लांच करवाने का वादा किया है। चंचल के पीछे गजराज के आदमी लगे हैं। उन्हें भटकाने के लिए वह प्रजापति के साथ घूमती फिरती है। इस चक्कर में प्रजापति की शादीशुदा जिंदगी में उथल-पुथल मच जाती है।
गलतफहमियों का जाल इतना उलझता है कि अपर्णा को लगता है कि प्रजापति का नीलोफर के साथ अफेयर है। नीलोफर को लगता है कि उसका चंचल के साथ संबंध है। अब रिश्तों के इस गड़बड़ झाले में प्रजापति कैसे निकलेगा कहानी इस संबंध में हैं।
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कहां चूक गई फिल्म?
पारिवारिक कॉमेडी फिल्म के तौर पर प्रचारित यह फिल्म पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक की फिल्मों की याद दिलाती है जिसमें शक के चलते परिस्थितियां इतनी गड़बड़ होती है कि आप हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते हैं। यहां पर भी मुद्दसर ने यही करने का प्रयास किया है लेकिन इसमें कोई नयापन नहीं है।
कोई घटनाक्रम या प्रसंग रोचक नहीं है। चाहे वो होटल में कुछ घंटे के लिए कमरे किराए पर लेना हो या फिर पार्क में बैठकर इश्क लगाना। कुछ दृश्य जबरन खींचे हुए लगते हैं। गजराज का जातिवाद के चलते चंचल का विरोध करने का प्रसंग बहुत कमजोर है।
पुलिस का एंगल भी कहानी को रोचक नहीं बना पाता। इस फिल्म में पत्नी के साथ शक के लिए दो लड़कियों के साथ लड़कों के गले मिलने को उनके बीच रिश्ता मान लेने जैसे पुराने घिसे-पिटे पैंतरे हैं। हालांकि इस सिचुएशनल कॉमेडी में बीच-बीच में वनलाइनर कहीं-कहीं राहत दे जाते हैं। फिल्म प्रयागराज और बनारस के बीच आती जाती है, लेकिन वहां का फील नहीं देती।
कलाकारों की परफॉर्मेंस
कलाकरों में आयुष्मान खुराना अपने चिर परिचित अंदाज में हैं। वह कमजोर पटकथा को अपने अभिनय से संभालने का प्रयास करते दिखते हैं। अपर्णा की जलन, गुस्से और गलतफहमी को वामिका गब्बी ने समुचित तरीके से जीया है। रकुलप्रीत सिंह की कॉमिक टाइमिंग अच्छी है।
सारा अली खान कई जगह ओवरएक्टिंग करती लगती हैं। बुआ की भूमिका में आयशा रजा जरूर जब-जब पर्दे पर आती हैं हंसी के पल लेकर आती हैं। कॉमेडी के महारथी अभिनेता विजयराज पुलिस अधिकारी धर्मवीर सिंह की भूमिका में कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं। तिग्मांशु धुलिया अपनी भूमिका में सामान्य लगे हैं।
कैसा है फिल्म का संगीत?
इंदीवर, कुमार, कुणाल वर्मा, बादशाह, नीलकमल, फतेह अब्दुल्ला और अरसलान निजामी जैसे गीतकारों और तमाम संगीतकारों की मौजूदगी भी संगीत को प्रभावशाली नहीं बना पाती है। हालांकि फिल्म ‘तेरे नाम’ का गाना 'क्यों किसी को वफा के बदले' और फिल्म 'तेजाब' के 'कह दो कि तुम' जैसे गानों का इस्तेमाल परिस्थिति अनुरुप सटीक है। हालांकि कई बार गाने कहानी में रुकावट की तरह लगते हैं।
कुल मिलाकर फिल्म हल्का-फुल्का मनोरंजन करती है, लेकिन मजबूत कहानी और नएपन की कमी साफ महसूस होती है।
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