मंगल मुद्दा: नए खनिज अधिनियम से झारखंड को वित्तीय नुकसान, राज्यों की स्वायत्तता पर कितना असर?
खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम 2026 में संशोधन से झारखंड जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों को भारी राजस्व नुकसान होगा। ...और पढ़ें

खनन बिल में सशोधन के खिलाफ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बड़े आंदोलन की चेतावनी दे चुके हैं। (तस्वीर: सांकेतिक)
HighLights
नए खनिज अधिनियम से झारखंड को भारी राजस्व नुकसान।
राज्यों की खनिज भूमि पर कर लगाने की शक्ति सीमित।
झारखंड को 14 हजार करोड़ रुपये का नुकसान संभव।
राज्य ब्यूरो, रांची। खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम 2026 में संशोधन का नुकसान खनिज पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले राज्यों पर होना तय है। हालांंकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट तौर पर दावा किया है कि राज्यों का हिस्सा लगभग 90 प्रतिशत तक बना रहेगा।
दावों के अनुसार, यह अधिनियम खनिज-युक्त भूमि पर कराधान को विनियमित करने का प्रयास करता है, भूमि अधिकारों में कोई बदलाव नहीं करता, साथ ही कई अतिरिक्त करों, शुल्कों और उपकरों की समस्या का समाधान करने की दिशा में भी काम करता है।
दूसरी ओर, इस संशोधन अधिनियम का विरोध करनेवालों का तर्क है कि इससे ऐसी संभावना प्रबल हो रही है कि झारखंड समेत तमाम राज्यों में खनिज पहले की तुलना में अधिक महंगे हो जाएंगे।
ऐसी परिस्थिति में घरेलू उद्योग विकल्प तलाशेंगे, आयात और आयात बिल बढ़ेगा जिससे आत्मनिर्भर भारत योजना को झटका लगने का दावा किया जा रहा है। संशोधित अधिनियम में कुछ अच्छी बातें हैं तो कुछ ऐसे भी पहलू हैं जिसको लेकर सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
खनिज क्षेत्र में मजबूत होगी प्रतिस्पर्द्धा
इस संशोधित विधेयक की अच्छी बात यह है कि यह खनिज कराधान में अधिक स्पष्टता लेकर आया है जिससे खनिज क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूती मिलने की उम्मीद है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट से राज्यों को मिली अनुमति के विपरीत यह अधिनियम खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर या उपकर लगाने को लेकर राज्यों की शक्ति को सीमित करता है।
ऐसे में झारखंड और ओडिशा जैसे खनिज-प्रधान राज्यों काे राजस्व नुकसान होने की पूरी संभावना है। कर लगाने के अधिकार को सीमित किए जाने से झारखंड को बड़ा वित्तीय नुकसान संभावित है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार झारखंड को 14 हजार करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है।
झारखंड समेत कई राज्यों के अधिकारों पर असर
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले को पलटनेवाले इस विधेयक से खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर या उपकर (सेस) लगाने की राज्यों की शक्तियों को सीमित किया गया है।
झारखंड और ओडिशा जैसे खनिज-प्रधान राज्यों के अधिकार सीमित होने से बड़ा वित्तीय नुकसान संभावित है। राज्य बड़ी योजनाओं के लिए स्वयं निर्णय नहीं ले पाएंगे और कहीं ना कहीं केंद्र सरकार पर अधिक निर्भर हो जाएंगे।
सेस के माध्यम से बड़ा आधार तैयार कर रहा था झारखंड
द झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस रूल-2024 के माध्यम से राज्य में खनिजों और खनन वाली भूमि पर सेस (उपकर) की वसूली शुरू की गई थी। इसके माध्यम से झारखंड आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर तो बन ही रहा था, लगातार भविष्य के लिए बड़ा आधार तैयार कर रहा था।
- वित्तीय वर्ष 2024-25 में 1,379 करोड़ रुपये की आमदनी हुई
- वित्तीय वर्ष 2025-26 में 7,487.91 करोड़ रुपये खजाने में आए
- वित्तीय वर्ष 2026-27 में 13800 करोड़ रुपये का लक्ष्य निर्धारित था
(अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच लगभग 4,400 करोड़ रुपये वसूले जा चुके हैं।
1957 में पहली बार बना था खनन कार्यों को नियंत्रित करनेवाला कानून
खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम पहली बार आजादी के बाद 1957 में सदन से पास हुआ था। यह देश में खदानों और खनिज संसाधनों के विकास, नियमन, खोज तथा खनन कार्यों को नियंत्रित करने वाला मुख्य केंद्रीय कानून है।
- खनिजों का नियमन : देश में सभी प्रकार के प्रमुख खनिजों (मेजर मिनरल्स) के खनन पट्टे, नीलामी और उनके नियमन का अधिकार इसके तहत तय होता है।
- पारदर्शिता : खनन क्षेत्रों के आवंटन और नीलामी में पारदर्शिता लाने के लिए समय-समय पर इसमें संशोधन किए गए हैं। खनन से प्रभावित इलाकों और लोगों के विकास के लिए जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) जैसी संस्थाएं बनाई गई हैं।
- हाल में किया गया संशोधन (2026) : इन संशोधनों के जरिए खनिज अधिकारों और खनिजयुक्त भूमि पर राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले करों, सेस और शुल्कों को केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप नियंत्रित किया गया है। पूरे देश में एक समान और संतुलित राजकोषीय ढांचा बना रहने का दावा किया जा रहा है।
तो राज्य सरकार खनिजों पर कर नहीं लगा सकेगी, यह अन्यायपूर्ण है: राधाकृष्ण
पूर्व मुख्यमंत्री व नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी कहते हैं कि केंद्र के बिल पर झारंखड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस दोनों भ्रम फैला रही है। इसमें राज्य का अहित कहीं से नहीं है। संशोधन से देश और राज्य दोनों का हित है। अवैध खनन और सिंडिकेट राज खत्म होगा।
वहीं झारखंड सरकार के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर का कहना है कि खान खनिज विकास संशोधन अधिनियम 2026 में नयी धारा- 9D का जोड़ा जाना झारखंड जैसे अन्य राज्यों के लिए सबसे नुकसानदायक बदलाव है। इससे राज्य सरकार खनिज अधिकारों या खनिज युक्त भूमि पर कोई भी टैक्स, सेस या अन्य कोई शुल्क नहीं लगा सकेगी।
केंद्र सरकार ने संशोधित अधिनियम के माध्यम से खनिज की मात्रा, मूल्य, रायल्टी तथा सभी प्रकार के शुल्कों को प्रतिबंधित कर दिया है। अब राज्य अपने खनिज संपदाओं पर कर नहीं लगा सकता है। टैक्स अथवा सेस लगाने के लिए राज्यों को केंद्र सरकार की अनुमति और शर्तों पर निर्भर रहना पड़ेगा।
झारखंड में कोयला, लौह अयस्क, अभ्रक, बाक्साइट, यूरेनियम जैसे बहुमूल्य खनिज बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं, और राज्य की अर्थव्यवस्था तथा राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खनन गतिविधियों पर निर्भर करता है।
झारखंड सहित अन्य खनिज-राज्यों को यह अपेक्षा थी कि वे रॉयल्टी के अतिरिक्त, भूमि और खनिज अधिकारों पर स्वतंत्र रूप से कर व उपकर लगाकर हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व राज्य की योजनाओं, अवसंरचना और कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए जुटा सकेंगे। यह संभावना अब लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई है।
राधाकृष्ण कहते हैं, केंद्र सरकार अब उस भूमि पर भी सीधा नियंत्रण रखेगी, जिसमें खनिज उपलब्ध है। यह राज्य के भूमि और राजस्व अधिकार क्षेत्र में एक 'तानाशाही' हस्तक्षेप है। केंद्र के इस संशोधित अधिनियम से पुराने कानून और उच्चतम न्यायालय के निर्णयादेश तत्काल प्रभाव से निष्प्रभावी हो गए हैं।
इस अधिनियम के लागू हो जाने से झारखंड सरकार कोल कंपनियों के पास बकाये राशि 1,36,042 करोड़ रुपये वसूल नहीं कर पाएगी। यह प्रविधान राज्यों के लिए अत्यंत अन्यायपूर्ण है।
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