15 मीटर सिल्क, 2500 घंटे की मेहनत: Disha Madan ने कान्स इवेंट में बिखेरा 'बंजारा कसूती' का जलवा
14 मई की शाम को कान्स फिल्म फेस्टिवल की 'ब्रूट एक्स नेस्प्रेसो' आफ्टर-पार्टी में जब मशहूर इन्फ्लुएंसर दिशा मदान ने कदम रखा, तो हर किसी की निगाहें उन प ...और पढ़ें

Cannes इवेंट में पारंपरिक 'बंजारा कसूती' लुक में पहुंचीं Disha Madan (Image Source: Instagram)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 14 मई की शाम, कान्स फिल्म फेस्टिवल के 'ब्रूट एक्स नेस्प्रेसो' इवेंट में फैशन का एक नया इतिहास लिखा गया। जब मशहूर इन्फ्लुएंसर दिशा मदान इस पार्टी में पहुंचीं, तो उन्होंने कोई आम डिजाइनर गाउन नहीं पहना था।
उनका पहनावा उत्तरी कर्नाटक की मिट्टी, वहां के कारीगरों की मेहनत और 'बंजारा कसूती' की गौरवशाली कला का एक जीता-जागता कैनवास था। विदेशी चमक-दमक के बीच उनका यह देसी अंदाज एक अलग ही कहानी बयां कर रहा था।
विदेशी चमक-दमक के बीच 'देसी गौरव'
इस शानदार लिबास के पीछे की कहानी कान्स की चकाचौंध से कहीं ज्यादा गहरी है। यह कढ़ाई भारत के बंजारा या लंबानी समुदाय की उन महिलाओं की देन है, जो पीढ़ियों से अपनी कहानियां सूई और धागे से कपड़ों पर लिखती आई हैं।
कर्नाटक के विजयपुरा में काम करने वाली 'बंजारा कसूती' नाम की एक गैर-लाभकारी संस्था इस कला को सहेजने का काम कर रही है। यह संस्था ग्रामीण महिलाओं को ऐसा रोजगार देती है जिससे उन्हें पैसे कमाने के लिए अपना घर-बार छोड़कर शहरों की तरफ न भागना पड़े।
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छह महीने की मेहनत और एक साझा सपना
यह अद्भुत ड्रेस 'हाउस ऑफ बंजारा' और 'लेबल निहारिका विवेक' की साझा कोशिश का परिणाम है। इसे कर्नाटक के पारंपरिक कपड़ों को एक ट्रिब्यूट देने के लिए तैयार किया गया था। डिजाइनर निहारिका विवेक बताती हैं कि यह कोलैबोरेशन बंजारा महिलाओं के हुनर को दुनिया के सामने गर्व से पेश करने का एक सुनहरा मौका था। दिसंबर में इस सपने की नींव रखी गई और लगभग छह महीनों तक डिजाइनर्स और गांव की महिलाओं ने इसे सच करने के लिए दिन-रात एक कर दिया।
2500 घंटे, 15 मीटर सिल्क और कमाल की कारीगरी
'हाउस ऑफ बंजारा' की 4 से 5 महिला कारीगरों ने इस पर 55 दिनों तक लगातार काम किया। 15 मीटर असली रेशम पर इन महिलाओं ने 2,500 घंटों तक अपने हाथों का जादू चलाया। ड्रेस पर शीशे, पारंपरिक डिजाइन, रत्नों के रंग वाले धागे और 'फ्री-हैंड' कसूती का बेहतरीन काम किया गया। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि हाथों की कारीगरी के कच्चे और असली रूप को खोए बिना, इस कपड़े को एक स्मूथ और परफेक्ट लुक दिया जाए।
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80 घंटे की सिलाई और पारंपरिक गहने
इस परिधान की बनावट भी बेहद खास थी। इसमें एक ड्रॉप-वेस्ट वाला हाई-नेक कॉर्सेट था, जिस पर हाथों से पारंपरिक Passa Jewellery जड़ी गई थी। इसके साथ 18 पैनलों वाली एक खूबसूरत स्कर्ट थी, जो ड्रेस को एक शानदार और खुला हुआ रूप दे रही थी। सिर्फ इस ड्रेस की सिलाई और फिटिंग में ही 80 घंटे का एक्स्ट्रा टाइम लगा। इसे पूरा करने के लिए जो भी गहने इस्तेमाल हुए, वो सब खास तौर पर उत्तरी कर्नाटक से मंगाए गए थे।
"यह मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट था..."
'हाउस ऑफ बंजारा' की आशा पाटिल इस उपलब्धि को लेकर बेहद भावुक हैं। उनके शब्दों में, "यह मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है। अपने कारीगरों और इस कला को कान्स में देखना रुला देने वाला पल था। इससे हमारी महिलाओं को यह विश्वास मिलता है कि हमारी पारंपरिक कला ग्लोबल स्टेज पर भी अपना जलवा बिखेर सकती है।"
यह कोलैबोरेशन सिर्फ फैशन का एक नमूना नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय फैशन केवल नए डिजाइन बनाने तक सीमित नहीं है। यह उन हाथों का सम्मान है जो खामोशी से हजारों घंटे काम करके किसी उत्कृष्ट कला को जन्म देते हैं। जब कान्स में कैमरे चमके, तो असल में वो 'बंजारा कढ़ाई' की ताकत थी जो दुनिया को बता रही थी कि हमारी विरासत दुनिया के किसी भी मंच की शान बढ़ा सकती है।