क्या आप भी भूल रहे हैं छोटी-छोटी बातें? दिमागी बीमारियों से बचने के लिए डेली रूटीन में करें 5 बदलाव
हर साल 22 जुलाई को मनाया जाने वाला World Brain Day हमें याद दिलाता है कि बढ़ती उम्र के साथ शरीर के अन्य हिस्सों की तरह हमारे दिमाग को भी खास देखभाल की ...और पढ़ें

स्ट्रोक से बचने के लिए आज ही बदलें अपनी ये खतरनाक आदतें (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अचानक आने वाले स्ट्रोक या लकवे जैसे मामले किसी भी परिवार को झकझोर कर रख देते हैं। ऐसे मुश्किल वक्त में अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या इस खतरे को पहले ही टाला जा सकता था? न्यूरोलॉजी के जानकारों की मानें, तो इसका जवाब 'हां' है।
मेदांता नोएडा के इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेस के डायरेक्टर डॉ. मनीष वैश्य के मुताबिक, सर्जरी या दवाओं से कहीं ज्यादा असर इंसान की रोजमर्रा की साधारण आदतों का होता है। हालांकि, डीएनए और बढ़ती उम्र पर किसी का जोर नहीं है, लेकिन अपनी लाइफस्टाइल में सुधार करके हम अपने दिमाग को गंभीर बीमारियों से जरूर बचा सकते हैं।
आइए जानते हैं कि बिना किसी बड़े खर्च के रोजमर्रा की जिंदगी में क्या बदलाव किए जा सकते हैं।

(Image Source: AI-Generated)
मुफ्त का इलाज है वर्कआउट
हर हफ्ते कम से कम 150 मिनट की फिजिकल एक्टिविटी दिमाग के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। इसमें तेज चलना, तैरना, साइकिल चलाना या योग शामिल किया जा सकता है। इससे न सिर्फ दिमाग में ब्लड फ्लो अच्छा होता है और नए न्यूरल कनेक्शन बनते हैं, बल्कि ब्लड प्रेशर और शुगर भी नियंत्रण में रहते हैं। ध्यान रहे, स्ट्रोक के ज्यादातर मामलों के पीछे इन्हीं दो बीमारियों का हाथ होता है।
डाइट में करें ये जरूरी बदलाव
दिमाग को सेहतमंद रखने के लिए सही भोजन बहुत जरूरी है। अपनी डाइट में ताजे फल, हरी पत्तेदार सब्जियां, साबुत अनाज, नट्स और बीजों का सेवन बढ़ाएं।
- ओमेगा-3: इसके लिए अखरोट या फैटी फिश का सेवन किया जा सकता है।
- एंटीऑक्सीडेंट्स: यह बेरीज और हरी सब्जियों से भरपूर मात्रा में मिलता है।
इसके अलावा, खाने में ज्यादा नमक, चीनी और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाना खून की नसों को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभाता है।
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7 से 9 घंटे की नींद क्यों है जरूरी?
बिना किसी रुकावट के सात से नौ घंटे की गहरी नींद लेना दिमाग की 'सर्विसिंग' जैसा है। सोते समय ही हमारा दिमाग दिन भर की यादों को सहेजता है, अपनी टूट-फूट की मरम्मत करता है और हानिकारक तत्वों को बाहर निकालता है। जो लोग लंबे समय तक ठीक से नहीं सोते, उनकी याददाश्त और फोकस करने की क्षमता धीरे-धीरे, बिना कोई संकेत दिए, कमजोर पड़ने लगती है।
तनाव घटाएं और अपनों के साथ वक्त बिताएं
लंबे समय तक स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ा रहने से मूड और याददाश्त पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इससे बचने के लिए गहरी सांसें लें, ध्यान करें या बाहर सैर पर जाएं। स्मार्टफोन को किनारे रखकर परिवार के साथ समय बिताना और मजबूत रिश्ते बनाए रखना, ढलती उम्र में दिमाग के लिए किसी भी महंगी दवा से ज्यादा असरदार साबित होता है।
दिमागी कसरत भी है जरूरी
शरीर की तरह दिमाग को भी एक्टिव रखना चाहिए। इसके लिए अच्छी किताबें पढ़ें, पहेलियां सुलझाएं या फिर कोई नई भाषा या म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट सीखें। इन गतिविधियों से 'कॉग्निटिव रिजर्व' बढ़ता है, जो बढ़ती उम्र के असर से दिमाग को बचाने के लिए एक शील्ड की तरह काम करता है।
खतरे की घंटी है ऐसी सोच
वजन, कोलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और शुगर को हमेशा नियमित चेकअप के जरिए कंट्रोल में रखना चाहिए। शराब और सिगरेट जैसी बुरी आदतों को "अगले साल छोड़ देंगे" वाली सोच बहुत खतरनाक हो सकती है, क्योंकि कई बार यह सीधे स्ट्रोक का कारण बन जाती है।
इन लक्षणों पर तुरंत लें एक्शन
बीमारी के शुरुआती संकेतों को कभी भी हल्के में न लें। अगर शरीर में ये बदलाव दिखें तो बिना देर किए डॉक्टर के पास जाएं:
- अचानक भयानक सिरदर्द होना
- शरीर का कोई एक हिस्सा सुन्न या कमजोर महसूस होना
- बोलने में जुबान का लड़खड़ाना
- याददाश्त अचानक धोखा दे जाना
- हाथ-पैरों में कंपन होना
न्यूरोलॉजी के मामलों में वक्त की कीमत सबसे ज्यादा होती है। इलाज में देरी का मतलब है दिमाग को सीधा नुकसान।
भले ही दुनिया का कोई भी रूटीन 100% सुरक्षा की गारंटी नहीं देता, लेकिन जो लोग अपनी डाइट, नींद, एक्सरसाइज, स्ट्रेस और चेकअप पर ध्यान देते हैं, वे बुढ़ापे में भी अपनी याददाश्त खोते नहीं हैं और दूसरों पर निर्भर नहीं रहते। रोजमर्रा की यह छोटी-सी समझदारी जीवन भर के लिए सबसे बड़ा इनाम है।