आखिर कितनी गर्मी बर्दाश्त कर सकता है इंसान... कब जान ले लेता है बढ़ा हुआ तापमान?
गर्मी के बढ़ते रिकॉर्ड के बीच यह समझना जरूरी है कि इंसान का शरीर कितनी गर्मी सह सकता है। ...और पढ़ें

आखिर इंसान का शरीर कितनी गर्मी बर्दाश्त कर सकता है? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हर साल गर्मी नए रिकॉर्ड तोड़ रही है। कई शहरों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है। ऐसे में, आपके मन में भी यह सवाल जरूर आता होगा कि आखिर एक इंसान का शरीर कितनी गर्मी बर्दाश्त कर सकता है?
क्या कोई ऐसा तापमान है, जिस पर पहुंचते ही हमारे शरीर के अंग काम करना बंद कर देते हैं और जान का खतरा बन जाता है? आइए, एशियन हॉस्पिटल के पेलिएटिव केयर और जेरिएट्रिक्स के कंसल्टेंट फिजिशियन डॉ. चारु दत्त अरोड़ा से डिटेल में जानते हैं इस बारे में।

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बाहरी तापमान से ज्यादा अंदरूनी तापमान है अहम
डॉक्टर मानते हैं कि खतरा सिर्फ बाहर के तापमान से नहीं, बल्कि शरीर के अंदर के तापमान और वातावरण की नमी से भी तय होता है। हमारे शरीर का सामान्य तापमान लगभग 37 डिग्री सेल्सियस रहता है। हमारा शरीर पसीने और त्वचा के जरिए खुद को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने का काम करता है, लेकिन जब हवा में नमी और गर्मी बहुत ज्यादा होती है, तो शरीर का यह 'कूलिंग सिस्टम' फेल होने लगता है, जो हीट स्ट्रेस और आगे चलकर हीटस्ट्रोक का कारण बनता है।
कब बन जाती है मेडिकल इमरजेंसी?
डॉ. अरोड़ा बताते हैं, "लोग अक्सर 45 या 50 डिग्री के बाहरी तापमान से डरते हैं, लेकिन असली खतरा तब पैदा होता है जब शरीर का अंदरूनी तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर चला जाता है।"
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जब शरीर के अंदर की गर्मी 40 डिग्री के पार जाती है, तो दिमाग, दिल, किडनी और लिवर पर भारी दबाव पड़ता है। इस स्थिति में शरीर के अंग बुरी तरह प्रभावित होने लगते हैं और यह एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी बन जाती है।
ये खतरनाक लक्षण दिखें तो हो जाएं सावधान
अंदरूनी तापमान बढ़ने पर शरीर कई तरह के संकेत देने लगता है। मरीज को चक्कर आना, उलझन होना, दिल की धड़कन का तेज होना, उल्टी आना, सांस लेने में दिक्कत होना या बेहोशी छा जाना जैसी परेशानियां हो सकती हैं।
डॉ. अरोड़ा के मुताबिक, हीटस्ट्रोक में शरीर का तापमान 40–41 डिग्री या उससे भी ज्यादा हो सकता है। इस स्थिति में सबसे पहले हमारा दिमाग प्रभावित होता है, जिससे मरीज को भ्रम होता है, दौरे पड़ सकते हैं या वह बेहोश हो सकता है। अगर समय पर इलाज न मिले, तो किडनी फेलियर, लिवर डैमेज और मल्टी-ऑर्गन फेलियर का खतरा काफी बढ़ जाता है।

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मौत का खतरा किन बातों पर करता है निर्भर?
यह साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता कि बाहर का तापमान कितने डिग्री होने पर किसी व्यक्ति की मौत हो जाएगी। यह कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे- व्यक्ति की उम्र, उसकी सेहत, शरीर में पानी की मात्रा, हवा में नमी और वह कितनी देर तक धूप के संपर्क में रहा।
उदाहरण के लिए, अगर 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में बहुत ज्यादा उमस हो, तो वह शरीर के लिए कहीं ज्यादा जानलेवा साबित होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उमस में पसीना सूख नहीं पाता और शरीर खुद को ठंडा करने में असमर्थ हो जाता है।
किन्हें है सबसे ज्यादा खतरा?
डॉक्टर के अनुसार, वे लोग जो लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी में काम करते हैं, वे सबसे ज्यादा जोखिम में होते हैं:
- मजदूर
- ट्रैफिक पुलिस
- डिलीवरी कर्मी
- बुजुर्ग और बच्चे
- पहले से दिल या फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे मरीज

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बचाव ही है सबसे बड़ा इलाज
बढ़ते तापमान में खुद को सुरक्षित रखने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है:
- शरीर में पानी की कमी न होने दें, खूब पानी पिएं।
- दोपहर की तेज धूप में बाहर निकलने से बचें।
- हल्के रंग के और ढीले कपड़े पहनें।
कमजोरी, चक्कर या बहुत ज्यादा पसीना आने जैसे शुरुआती लक्षणों को कभी नजरअंदाज न करें।
अगर किसी व्यक्ति का शरीर तेज बुखार की तरह गर्म हो जाए, उसे भ्रम हो या वह बेहोश हो जाए, तो तुरंत मेडिकल मदद लें। याद रखें, हीटस्ट्रोक कोई मामूली 'गर्मी लगना' नहीं है, बल्कि यह एक जानलेवा स्थिति है। शरीर के संकेतों को समझना और समय रहते सावधानी बरतना ही बचाव का सबसे अच्छा तरीका है।