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    दक्षिण एशिया में बच्चों के कैंसर के 70% मामले अकेले भारत में, माता-पिता जरूर पढ़ें इस रिपोर्ट के मायने

    Updated: Tue, 04 Aug 2026 03:30 PM (GMT+05:30)

    मोटापा, तंबाकू, अल्कोहल जैसे कारणों से वयस्कों में कैंसर होने की आशंका रहती है, लेकिन बच्चों में कैंसर होने के पीछे अन्य कारण जिम्मेदार होते हैं। ...और पढ़ें

    भारत में बच्चों में बढ़ रहा कैंसर का खतरा (Picture Courtesy: Freepik)

    भारत में बच्चों में बढ़ रहा कैंसर का खतरा (Picture Courtesy: Freepik)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कैंसर की बीमारी किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य से ही जुड़ी समस्या ही नहीं होती, बल्कि इसमें जगह, स्वास्थ्य देखभाल की व्यवस्था और जांच-उपचार की सुविधाओं की भी भूमिका होती है।

    लांसेट के एक ताजा अध्ययन की मानें तो दक्षिण एशियाई देशों में बच्चों में होने वाले कुल कैंसर 37,717 में से 25,939 मामले अकेले भारत से संबंधित हैं, यानी कैंसर के 10 मामलों में से सात भारत से आते हैं। रिपोर्ट बताती है कि बच्चों में ल्यूकेमिया सबसे आम तरह का कैंसर है, यह 35 से 50 प्रतिशत मामलों में चिह्नित किया जाता है।

    आइए जानें इस बारे में डॉ. नरेंद्र अग्रवाल (सीनियर कंसल्टेंट, हेमैटो-आन्कोलाजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट, आरजीसीआइआरसी, दिल्ली) से।

    वयस्कों से अलग है बच्चों का कैंसर 

    बच्चों में कैंसर होने की सबसे बड़ी वजह कोशिकाओं के डीएनए में होने वाले बदलाव (म्यूटेशन) हैं। बच्चों और बड़ों के कैंसर में काफी फर्क होता है। वयस्कों में कई तरह के कैंसर तंबाकू, अल्कोहल, मोटापा या लंबे समय तक कुछ हानिकारक पदार्थों के संपर्क से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन बच्चों में ज्यादातर कैंसर इन कारणों से नहीं होते। 

    जब बच्चा बढ़ रहा होता है, तब उसके शरीर में नई कोशिकाएं बहुत तेजी से बनती हैं। इस दौरान कभी-कभी डीएनए की कॉपी बनने में छोटी-छोटी गलतियां हो जाती हैं। 

    सामान्य तौर पर शरीर का डीएनए रिपेयर मैकेनिज्म और प्रतिरक्षा प्रणाली ऐसी अधिकांश गलतियों को संभाल लेते हैं। लेकिन अगर ये बदलाव ठीक नहीं हो पाते, तो वे कोशिकाओं की सामान्य वृद्धि पर असर डाल सकते हैं और समय के साथ कैंसर विकसित हो सकता है। 

    ज्यादातर बच्चों में कैंसर का कोई एक निश्चित कारण पता नहीं चलता। कुछ मामलों में जन्म से मौजूद जेनेटिक सिंड्रोम या कुछ दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियां जोखिम बढ़ा सकती हैं। हालांकि, अधिकांश मामलों में इसका संबंध माता-पिता की किसी गलती, खान-पान या सामान्य जीवनशैली से नहीं होता, इसलिए अगर किसी बच्चे को कैंसर होता है, तो परिवार को खुद को दोषी नहीं मानना चाहिए।

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    बच्चों में ल्यूकेमिया की गंभीर समस्या

    ल्यूकेमिया यानी ब्लड कैंसर, बच्चों में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला कैंसर है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि बचपन में बोन मैरो बहुत सक्रिय रहता है। यही वह जगह है जहां खून की नई कोशिकाएं बनती हैं। बढ़ते शरीर को लगातार नई रक्त कोशिकाओं की जरूरत होती है, इसलिए बोन मैरो में कोशिकाएं तेजी से बनती और विभाजित होती रहती हैं। 

    इस दौरान कभी-कभी डीएनए में ऐसे बदलाव हो जाते हैं जो कोशिकाओं की सामान्य वृद्धि और परिपक्व होने की प्रक्रिया को प्रभावित कर देते हैं। यदि ऐसे बदलाव उन जीनों में हों जो कोशिकाओं की वृद्धि को नियंत्रित करते हैं, तो असामान्य श्वेत रक्त कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं और ल्यूकेमिया विकसित हो सकता है। 

    यह भी समझना जरूरी है कि अधिकांश बच्चों में ल्यूकेमिया का कोई एक निश्चित कारण नहीं मिलता। यह किसी एक भोजन, संक्रमण या माता-पिता की किसी गलती से नहीं होता। ज्यादातर मामलों में यह शरीर के अंदर होने वाले आनुवंशिक बदलावों का परिणाम होता है।

    बच्चों में कैंसर के शुरुआती लक्षण

    यह इस बात पर निर्भर करते हैं कि बीमारी शरीर के किस हिस्से में है। कई लक्षण सामान्य बीमारियों में भी दिखाई देते हैं, इसलिए अगर ये लंबे समय तक बने रहें या बार-बार लौटें, तो डाक्टर से जांच जरूर करानी चाहिए।

    • ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर)- बार-बार या लंबे समय तक बुखार रहना, अत्यधिक कमजोरी, खून की कमी, बार-बार संक्रमण होना, शरीर पर बिना चोट के नीले निशान पड़ना, मसूड़ों या नाक से खून आना तथा हड्डियों या जोड़ों में लगातार दर्द इसके प्रमुख लक्षण हो सकते हैं।
    • विल्म्स ट्यूमर (किडनी का कैंसर)- बच्चे के पेट में बिना दर्द की गांठ महसूस होना इसका सबसे आम लक्षण है। कुछ बच्चों में पेट दर्द, पेशाब में खून या बुखार भी हो सकता है।
    • रेटिनोब्लास्टोमा (आंख का कैंसर)- फ्लैश वाली फोटो में आंख की पुतली में सफेद चमक दिखाई देना इसका सबसे महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। इसके अलावा अचानक भेंगापन आना या नजर कमजोर होना भी इसके लक्षण हो सकते हैं।

    जरूरी बात यह है कि केवल इन लक्षणों का होना कैंसर होने का मतलब नहीं है। लेकिन अगर इलाज के बावजूद ये लक्षण बने रहें या लगातार बढ़ते जाएं, तो बिना देर किए बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

    बरतें जरूरी सावधानी

    मेडिकल साइंस के अनुसार बच्चों में होने वाले अधिकांश कैंसरों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। इसकी वजह यह है कि ये कैंसर आमतौर पर जीवनशैली से नहीं बल्कि शरीर की कोशिकाओं में होने वाले आनुवंशिक बदलावों से जुड़े होते हैं।

    भले कैंसर को रोकना मुश्किल है, पर समय पर पहचान होने से उपचार उपलब्ध हो जाता है और जीवन सामान्य ढंग से चलने लगता है। अगर बच्चे को लंबे समय तक बुखार रहे, बार-बार संक्रमण हो, बिना कारण खून आए, लगातार हड्डियों में दर्द हो, आंख में सफेद चमक दिखाई दे या शरीर में कोई असामान्य गांठ महसूस हो, तो जांच में देरी नहीं करनी चाहिए।

    क्या हैं उपाय

    • बच्चे को संतुलित आहार दें
    • समय पर सभी टीके लगवाएं
    • साफ-सुथरा वातावरण दें
    • संक्रमण से बचाएं

    कैंसर होने पर क्या है उपाय

    अगर किसी बच्चे का कैंसर का इलाज चल रहा है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार संक्रमण से बचाव, सही पोषण और नियमित फालो-अप इलाज की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अच्छी बात यह है कि आज आधुनिक इलाज की बदौलत बच्चों में होने वाले कई प्रकार के कैंसर का समय पर इलाज शुरू होने पर सफलतापूर्वक उपचार संभव है।