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मीम्स और ट्रेंड्स पर विज्ञापन तो ठीक, लेकिन क्या Gen-Z के असली मुद्दों पर भी ब्रांड्स देते हैं उनका साथ?

Published: Tue, 11 Aug 2026 01:31 PM (IST)

भारतीय Gen-Z अपनी आर्थिक शक्ति को समझते हैं और मुद्दों को लेकर जागरूक भी हैं। ऐसे में ब्रांड्स सिर्फ लुक्स और मीम्स से उन्हें नहीं रिझा सकती।

जेन-जी के मुद्दों को समझते हैं ब्रांड्स (AI Generated Image)

जेन-जी के मुद्दों को समझते हैं ब्रांड्स (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के विज्ञापनों पर अगर आपने गौर किया होगा, तो नोटिस करेंगे ब्रांड्स अब जेन-जी यानी 14-29 साल की उम्र के लोगों की भाषा और लाइफस्टाइल को टार्गेट करते हुए ऐड बना रहे हैं। गंजी चुड़ैल जैसे ट्रेंड हो या सिचुएशनशिप जैसे शब्द या खुद की पहचान को सेलिब्रेट करने वाले कैंपेन लॉन्च करने हो, ब्रांड्स हर जगह काफी एक्टिव दिखते हैं। 

ऐसे में सवाल आता है कि क्या ब्रांड्स जेन-जी के सभी मुद्दों को सपोर्ट करते हैं। हाल ही में, जेन-जी अपनी कई चिंताओं और समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतरे हैं। इस दौरान भी क्या ब्रांड्स उनका साथ देते हैं? आइए जानें इस बारे में। 

आगे बढ़कर स्टैंड लेने का वक्त

ब्रांड्स को अब समझ आ चुका है कि सिर्फ सुंदरता और लुक्स को टार्गेट करके इस जेनरेशन को लुभाया नहीं जा सकता है। इनकी समस्याओं से दूरी बनाना अब आसान नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मशहूर स्पोर्ट्स ब्रांड ने नस्लभेद के मुद्दे को खुलकर उठाया। हालांकि, इसे लेकर काफी विवाद हुआ, लेकिन इस कैंपेन के जरिए कंपनी को लगभग 1,550 करोड़ रुपए की मीडिया वैल्यू मिली और बिक्री में काफी तेज बढ़ोतरी देखने को मिली। 

वहीं, जब ब्रांड्स दावा कुछ और करते हैं, लेकिन वैसा काम नहीं करते, तो उसका नुकसान भी उन्हें झेलना पड़ रहा है। कोविड-19 महामारी के दौरान यह साफ देखने को मिला था।  

युवा पीढ़ी की जागरुकता और आर्थिक ताकत

भारत में जेन-जी की आबादी लगभग 37.7 करोड़ है और ये आबादी करीब 82 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की क्षमता रखती है। सबसे अच्छी बात है कि ये पीढ़ी अपनी इस क्षमता को बखूबी समझती भी है। इसलिए जब पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन हुआ, तो इन युवाओं ने मीम्स, वीडियो और गेमिंग इमेजरी का बहुत क्रिएटिव तरीके से इस्तेमाल किया। 

इस आंदोलन के दौरान कई ब्रांड्स के दांव उल्टे भी पड़े। एक आइसक्रीम ब्रांड का ऐड नीट परीक्षा के टॉपर्स की डिजिटल मुस्कान के कारण आलोचना के घेरे में आ गया। इस आंदोलन में सेनेटरी पैड से जोड़कर भी कई नारे बनाए गए थे, लेकिन एक सेनेटरी पैड ब्रांड ने इनका इस्तेमाल करने का मौका गंवा दिया। वहीं, कुछ ब्रांड्स ने अपने ऐड्स न करके, छात्रों के साथ एकजुटता दिखाई। कुछ ने प्रदर्शन के दौरान लोगों को शरण दी और उनका समर्थन किया। ये कदम उनकी ब्रांड इमेज के लिए काफी अच्छा साबित हुआ। 

विवाद का भी है डर

भारतीय कंपनियों के लिए किसी एक पक्ष के समर्थन में दिखना हमेशा खतरा बना रहता है। सोशल मीडिया के दौर में यह और भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि लोगों की आलोचना काफी तेजी से देखने को मिलती है। कुछ सालों पहले एक जूलरी ब्रांड के ऐड में सेक्युलिरिज्म को दिखाने के लिए बनाया गया विज्ञापन उन पर उल्टा पड़ गया था और उन्हें वह ऐड वापस लेना पड़ा था। 

वहीं एक डिटर्जेंट ब्रांड ने भारी बहिष्कार और आलोचना के बावजूद अपना विज्ञापन नहीं हटाया और उस ऐड को करोड़ों बार देखा गया। इसलिए इस युवा पीढ़ी के साथ बढ़ने के सफर में सवाल ये नहीं है कि आलोचना होगी या नहीं, बल्कि यह है कि ब्रांड लंबे समय की विश्वसनीयता के लिए शुरुआती विवादों को सहने के लिए तैयार हैं या नहीं।