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फिल्मी भोजपुरी गानों से बिल्कुल अलग है बिहार का ये लोकगीत, इस गाने में छिपी है परदेसी पिया से मिलन की तड़प

Published: Mon, 31 Aug 2026 05:13 PM (IST)Updated: Wed, 02 Sep 2026 09:38 AM (IST)

भोजपुरी लोकगीत 'सारी सारी रतिया जगावे' विरह और प्रेम से जुड़ा है, जिसे एक बार सुनकर दिल नहीं भरेगा।

कोयल की कूक से होती विरह का दर्द तेज (AI Generated Image)

कोयल की कूक से होती विरह का दर्द तेज (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार के गानों की बात करते ही आजकल के भोजपुरी गाने दिमाग में आते हैं, लेकिन ये बिहार के गीतों का असली आईना नहीं है। बिहार के लोकगीत ऐसे हैं, जिन्हें आप एक बार सुन लेंगे, तो बार-बार सुनने का मन करेगा। इन्हीं लोकगीतों में 'सारी सारी रतिया जगाए' भी शामिल है।   

ये भोजपुरी गाना पूरबी या कजरी शैली का गीत है, जिसमें प्रेमिका के विरह और प्रेम को बहुत खूबसूरती के साथ गाया गया है। इस गीत को भोलानाथ गहमरी ने लिखा था, जिन्होंने भोजपुरी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। आइए जानें इस लोकगीत के बारे में, जो आज भी लोगों के दिलों पर राज कर रहा है।    

विरह की कहानी

सारी सारी रतिया जगावे पुरबी या कजरी शैली का गीत है, जिसे सावन के महीने में खासतौर से गाया जाता है। सावन का मौसम बेहद सुहाना होता है, लेकिन जिस प्रेमिका का पति परदेस गया हो, उसके लिए ये मौसम बड़ा दुखदायी हो जाता है। 

प्रेमिका के विरह की इसी टीस को ये गीत बताता है, जो कोयल की आवाज सुनकर और तेज हो जाती है। इसलिए प्रेमिका गाने में कहती है ‘सारी सारी रतिया जगावे, कोयल तोरी बिरहिन बोलिया’। 

कोयल की कूक से बढ़ता विरह का दर्द

इस गीत में कहा गया है कि रात के सन्नाटे में जब कोयल कूकती है, तो उसकी आवाज से प्रेमिका रातभर सो नहीं पाती और उसे उसके प्रेमी की याद सताती रहती है। पुरवइया हवा और परदेस में बैठे प्रेमी की याद उसके मन की विरह की आग को और भड़का देते हैं।  

विरह और प्रकृति का संगम

इस गीत में विरह की तड़प के साथ-साथ प्रकृति का भी बहुत बेहतरीन वर्णन सुनने को मिलता है। रात को छिप-छिपकर झांकता चांद और कोयर की मीठी आवाज भले ही बहुत खूबसूरत हैं, लेकिन प्रेमिका कहती है कि उसके लिए ये जहर जैसे हैं, क्योंकि इन्हें सुनकर उसका दिल जलता है और उसे उसके प्रेमी की याद आती है। इसलिए प्रेमिका कोयल को उलाहना देती है कि भले ही तेरा शरीर काला है, लेकिन आवाज बहुत मीठी है, जो मेरे दिल में दर्द पैदा करती है। 

बिहार की लोक संस्कृति का हिस्सा

यह गीत बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की संस्कृति में खास जगह रखता है। इस गीत में महिलाओं की तनहाई और प्रेम का जो खूबसूरत वर्णन है, वो इस गीत को खास बनाते हैं और इसलिए सालों से महिलाएं इस गीत को गाती आई हैं। कई सिंगर्स भी इस गीत को अपनी आवाज दे चुके हैं, जिनमें दीपाली सहाय का गाया वर्जन काफी हिट हुआ था। 

भोलानाथ गहमरी का जीवन

इस कालजयी पूरबी या कजरी को भोलानाथ गहमरी ने लिखा था। इनका जन्म 17 दिसंबर 1923 को गहमर में हुआ था। भोलानाथ गहमरी का भोजपुरी साहित्य और लोक संगीत में बहुत बड़ा योगदान रहा है। इनके लिखे गीतों की खासियत थी कि वे बहुत ही साधारण भाषा और स्थानीय बोली में लिखे होते थे। 

वे अपने गीतों में आम बोलचाल के शब्दों का इस्तेमाल करते थे, जिन्हें धुनं में ढालना और गाना बेहद आसान हो जाता था। उनके गीतों की सादगी के कारण ही लोग आजतक उनके लिखे गानों को गाते हैं और उनसे इतना जुड़ाव महसूस करते हैं। इनके गीतों की एक खासियत ये भी होती थी कि इनमें विरह और प्रेम की भावना प्रमुख होती थीं, जो सारी सारी रतिया जगावे में भी सुनने को मिलता है।