भारत का 'चतुरंग' कैसे बना यूरोप का 'चेस'? बहुत दिलचस्प है शतरंज का 1500 साल पुराना इतिहास
शतरंज का इतिहास 1500 साल पुराना है, जिसकी शुरुआत प्राचीन भारत में चतुरंग के रूप में हुई थी। ...और पढ़ें

कैसे हुई थी शतरंज खेलने की शुरुआत? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। शतरंज एक ऐसा खेल है, जिसमें व्यक्ति की बुद्धि, रणनीति और फोकस की परीक्षा होती है। आज दुनियाभर में चेस का बोलबाला है, इसके टूर्नामेंट्स होते हैं, चैंपियनशिप होते हैं और लोग बड़े मजे से इस गेम को देखते हैं और खेलते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं इसकी शुरुआत कैसे हुई थी?
दरअसल, शतरंज की शुरुआत आज से कई शताब्दी पहले हुई थी और इसका स्वरूप भी आज से काफी अलग था। आइए जानें कैसे हुई शतरंज खेलने की शुरुआत और समय के साथ इसमें कैसे बदलाव आए।
गुप्त साम्राज्य में हुई थी शुरुआत
माना जाता है कि शतरंज की शुरुआत प्राचीन भारत में छठी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के समय हुई थी। उस समय इस खेल का नाम शतरंज नहीं, चतुरंग था। चतुरंग यानी सेना के चार अंगों वाला खेल। उस समय युद्ध की सेना जैसी गोटियों का निर्माण किया जाता था। हाथी, जो आज रुक कहलाता है, घोड़ा आज नाइट कहलाता है, रथ को आज बिशप के नाम से जाना जाता है और पदाति को पॉन कहा जाता है।
उस समय इन गोटियों के नाम सेना में इस्तेमाल होने वाले सैनिकों के नाम पर रखा गया था और खेल का तरीका भी थोड़ा अलग था। हालांकि, खेल की सबसे अहम नियम आज भी वहीं है। खेल में राजा और मंत्री भी शामिल होते हैं और खिलाड़ी का मकसद होता है अपनी रणनीति से सामने वाले राजा को घेरना।
फारस में बना चतुरंग से शतरंज
माना जाता है कि सातवीं शताब्दी के बाद व्यापारिक रास्तों के जरिए चतुरंग का खेल भी फारस पहुंचा, जहां उसे शतरंज नाम दिया गया। जब कोई खिलाड़ी राजा पर सीधा हमला करते, तो वह शह कहलाता और अगर राजा को घेर लिया जाए, तो उसे शह-मात कहा जाता। इसी से अंग्रेजी का शब्द चेकमेट बना, जिसका आज खेल में इस्तेमाल किया जाता है। फारस से फिर ये खेल पूरे मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में पहुंचा।
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यूरोप पहुंचकर बदला रूप
10वीं शताब्दी के बाद व्यापार के साथ-साथ शतरंज भी यूरोप पहुंचा। यूरोप में इस खेल में काफी बदलाव आए। 15वीं शताब्दी के करीब शतरंज के नियमों में बड़े बदलाव है। मंत्री को क्वीन कहा गया और बोर्ड की सबसे शक्तिशाली गोटी बनाया गया। बिशप को तिरछा खेलने की स्वतंत्रता दी गई और खेल को तेज बनाने के लिए प्यादों को अपनी पहली चाल में दो घर चलने का नियम बनाया गया। शतरंज के नियमों में हुए इन बदलावों से आज के चेस की शुरुआत हुई।
शुरू हुई शतरंज की प्रतियोगिताएं
19वीं शताब्दी में शतरंज एक प्रोफेशनल गेम बन गया और इसकी प्रतियोगिताएं शुरू हुईं। साल 1886 में विल्हेम स्टेइनिट्ज दुनिया के पहले चेस चैंपियन बने। हालांकि, 20वीं शताब्दी में सोवियत संघ ने चेस पर अपना दबदबा बनाया और चेस के टूर्नामेंट्स काफी रोमांचक होते गए। भारत के विश्वनाथन आनंद, नॉर्वे के मैग्नस कार्लसन और रूस के गैरी कास्परोव आज चेस की दुनिया के सबसे नामों शामिल हैं, जिन्होंने इस खेल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।