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    श्रीदेवी पर फिल्माया गया वो आइकॉनिक राजस्थानी लोकगीत, जो 35 साल बाद भी है हर लड़की की प्लेलिस्ट का हिस्सा

    Updated: Sun, 14 Jun 2026 01:09 PM (IST)

    1991 में आई यश चोपड़ा की फिल्म लम्हे का एक गाना बेहद सुपरहिट हुआ था, जो आज भी खूब पसंद किया जाता है। यह गाना राजस्थान के लोकगीत से जुड़ा है। ...और पढ़ें

    राजस्थान का लोकगीत है लम्हे फिल्म का ये गाना (Picture Courtesy: YouTube)

    राजस्थान का लोकगीत है लम्हे फिल्म का ये गाना (Picture Courtesy: YouTube)

    HighLights

    1. "मोरनी बागा मा बोले" फिल्म 'लम्हे' का प्रसिद्ध गीत

    2. यह राजस्थान के बंजारा समुदाय का पारंपरिक लोकगीत है

    3. मांड शैली में गाया गया यह विरह गीत आज भी लोकप्रिय

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। साल 1991 में आई श्रीदेवी की फिल्म लम्हें का नाम सुनते ही, सबसे पहले "मोरनी बागा मा बोले" का सीन आंखों के सामने आता है। इस गाने में रेगिस्तान में श्रीदेवी ने इस गाने पर जबरदस्त डांस किया है। भले ही ये गाना 35 साल पुराना हो चुका है, लेकिन आज भी यह लोगों की प्लेलिस्ट में जगह बनाए हुए है। 

    क्या आप जानते हैं कि लता मंगेशकर और ईला अरुण की आवाज में गाया गया यह गाना सिर्फ एक फिल्मी गीत नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा है। जी हां, “मोरनी बागा मा बोले” राजस्थान के एक मशहूर लोकगीत से प्रेरित है, जो बंजारा समुदाय से जुड़ा है। आइए इस फोरेवर ग्रीन गाने के बारे में और जानते हैं। 

    बंजारा संस्कृति और रेगिस्तान से जुड़ाव 

    फिल्मी पर्दे तक पहुंचने से सदियों पहले से ही, यह लोकगीत राजस्थान के गांवों, चौपालों और खामोश रेगिस्तानी रातों में गूंजता रहा है। यह गीत मुख्य रूप से राजस्थान के घुमंतू बंजारा संस्कृति से जुड़ा है। व्यापार और रोजी-रोटी की तलाश में जब पुरुष मीलों दूर निकल जाते थे, तब पीछे छूटी उनकी स्त्रियां उनकी याद में गीत गाकर अपने विरह का दुख बांटती थीं।

    “मोरनी बागा में बोले” भी एक ऐसा ही विरह गीत है। इस गीत में आधी रात को बागों में मोरनी की पुकार प्रेमिका की तन्हाई और बेचैनी को और भी गहरा कर देती है, जो अपने प्रेमी की बाट जोह रही है।

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    मांड गायकी का जादू

    इस लोकगीत की सबसे बड़ी खासियत इसकी गायन शैली है। यह गीत राजस्थान की मांड शैली पर आधारित है। मांड शैली का विकास राजस्थान के राजा-महाराजाओं के दरबार में हुआ था। यह शैली शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत का खूबसूरत मेल है। मांड शैली में राजा-रानियों की प्रेम कहानियां, विरह और ऐतिहासिक गौरव का गुणगान किया जाता है। 

    फिल्म के लिए लिखा गया गाना

    हालांकि, फिल्म में इस गीत को हुबहु इस्तेमाल नहीं किया गया है। फिल्म के लिए इस गाने के नए बोल लिखे गए थे, जिसे आनंद बख्शी ने लिखा था, लेकिन उन्होंने इस गाने को लिखते समय राजस्थान के बंजारा समुदाय और राजस्थान की संस्कृति को ध्यान में रखते हुए लिरिक्स दिए। इस गाने को संगीतकार शिव-हरि (पंडित शिवकुमार शर्मा और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया) ने संगीत दिया और उन्होंने इसके पारंपरिक स्वरूप और मांड शैली की आत्मा से कोई छेड़छाड़ नहीं की। यह गाना इतना सुपरहिट हुआ कि आज 35 साल बाद भी लोगों के दिलों पर राज कर रहा है।