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    सब कुछ होने के बाद भी मजबूरी! पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिलाएं भी खराब शादी से क्यों नहीं निकल पातीं?

    Updated: Mon, 01 Jun 2026 06:20 PM (GMT+05:30)

    पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिलाओं के लिए भी शादी तोड़कर बाहर निकलना काफी मुश्किल है। वे सामाजिक और मानसिक बेड़ियों में जकड़ी रहती हैं। ...और पढ़ें

    क्यों मुश्किल से बाहर निकलने में झिझकती हैं महिलाएं? (AI Generated Image)

    क्यों मुश्किल से बाहर निकलने में झिझकती हैं महिलाएं? (AI Generated Image)

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    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के समय में महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं। घर संभालने के साथ-साथ वे अपने करियर को भी तवज्जो दे रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं। हालांकि, आत्मनिर्भर और शिक्षित होने के बावजूद कई महिलाएं मुश्किल शादी से बाहर नहीं निकल पाती हैं। 

    लोगों को अक्सर लगता है कि पढ़ाई और पैसे के दम पर फैसला आसान होता है, लेकिन असलियत इससे कोसों दूर है। दरअसल, महिलाओं को मुश्किल शादियों में बांधकर रखने वाली बेड़ियां आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और पारिवारिक होती हैं। आइए सीनियर साइकोलॉजिस्ट डॉ. मोनिका शर्मा से जानते हैं कि क्यों आत्मनिर्भर महिलाओं के लिए भी शादी के बंधन से बाहर निकलना मुश्किल होता है। 

    परिवार का दबाव और समझौतों का दौर

    एक परेशान महिला के लिए उसका अपना परिवार ही अक्सर मददगार बनने के बजाय समझौता कराने वाला मीडिएटर बन जाता है। इस दौरान उस पर कई तरह के दबाव बनाए जाते हैं। परिवार की इज्जत महिला की खुशियों से ज्यादा जरूरी मान ली जाती है। लोग क्या कहेंगे का डर महिला के मन में सबसे पहले घरवाले ही बैठाते हैं।

    महिलाओं को यह कहकर गिल्ट से भर दिया जाता है कि हमने तुम्हारे लिए इतना कुछ किया और तुम हमारे साथ ऐसा करोगी? अगर महिला के बच्चे भी हैं, तब तो गिल्ट ट्रिप की कोई सीमा नहीं रहती। बच्चों की खातिर बर्दाश्त कर लो कहकर महिला को उसी मुश्किल रिश्ते में बंधे रहने पर मजबूर कर दिया जाता है। कई बार माता-पिता का घर भी उस महिला के लिए सुरक्षित विकल्प नहीं बचता।

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    सामाजिक कलंक

    हमारे समाज में आज भी तलाक को एक बहुत बड़े कलंक के रूप में देखा जाता है, खासकर महिलाओं के लिए। समाज का यह रवैया महिलाओं का हौसला तोड़ देता है। तलाक को हमेशा एक नाकामी माना जाता है और इस नाकामी का पूरा ठीकरा सिर्फ और सिर्फ महिला के सिर पर ही फोड़ा जाता है। समाज हमेशा पहला दोष महिला को ही देता है कि उसी में कोई खराबी होगी।

    अगर बच्चे साथ हों, तो समाज का रवैया और ज्यादा कड़ा हो जाता है। इसके अलावा एक तलाकशुदा महिला के लिए दोबारा अच्छा रिश्ता मिलना बेहद मुश्किल माना जाता है। कुछ जगहों पर कामकाजी माहौल में भी तलाकशुदा महिलाओं को एक नेगेटिव नजरिए से देखा जाने लगता है।

    मानसिक उलझनें और अकेलेपन का डर

    लगातार मिलने वाले तनाव के कारण महिलाएं मानसिक रूप से भी कई बंधनों में जकड़ जाती हैं। हालात को सामान्य मान लेना कि शायद हर घर की यही कहानी है, उन्हें चुपचाप सब कुछ सहने पर मजबूर कर देता है। साथ ही, महिलाएं यह भी सोचने लगती हैं कि जब जिंदगी के इतने साल इस रिश्ते को दे दिए, तो अब इसे कैसे छोड़ दूं?

    घरवालों और ससुरालवालों के बार-बार गलत ठहराए जाने के कारण महिला का अपनी खुद की सोच और फैसले पर से भरोसा उठ जाता है। इसके अलावा, एक गहरे ट्रॉमा बॉन्डिंग के कारण उस मुश्किल रिश्ते में भी भावनात्मक जुड़ाव बना रहता है। कई बार अकेलेपन का डर भी महिलाओं के कदम रोक देता है। शादी कितनी भी मुश्किल और दर्दनाक क्यों न हो, लेकिन अकेले जिंदगी बिताने का ख्याल उन्हें काफी डरा देता है। 

    कानूनी पेचीदगियां 

    भले ही महिला कमाती हो, लेकिन आज भी ज्यादातर मामलों में घर, प्रॉपर्टी और सेविंग्स जैसी चीजों पर पति या पिता का नाम ही होता है। कई महिलाओं को यह भी पता ही नहीं होता कि वे कानूनी रूप से एलिमनी या प्रॉपर्टी में अधिकार पाने की हकदार हैं।

    एक डर कानूनी लड़ाई का भी होता है। अदालत के मामले सालों-साल खिंचते हैं, जो महिला की एनर्जी और पैसों को पूरी तरह निचोड़ देते हैं। इस डर से भी महिलाएं डिवोर्स लेने से हिचकिचाती हैं। साथ ही, कई मामलों में ससुरालवालों की तरफ से धमकी दी जाती है कि उनके बच्चे उनसे छीन लिए जाएंगे। इससे भी महिलाएं अपने कदम पीछे खींच लेती हैं। 

    इन बेड़ियों को कैसे तोड़ें?

    • खुद को सही ठहराएं- सबसे पहले यह स्वीकार करें कि आपका दर्द सही है और सच है। आप किसी बात पर ओवररिएक्ट नहीं कर रही हैं।
    • एक भरोसेमंद साथी ढूंढें- किसी सहेली या थेरेपिस्ट से बात करें।
    • आर्थिक रूप से खुद को सुरक्षित करें- अपना बैंक अकाउंट, सेविंग्स और सभी जरूरी डॉक्यूमेंट्स हमेशा अपने पास सुरक्षित रखें।
    • कानूनी रूप से जागरूक बनें- अपने अधिकारों को समझने के लिए महिलाओं की हेल्पलाइन से संपर्क करें।
    • थेरेपी और कम्युनिटी की मदद लें- थेरेपिस्ट आपके फैसले नहीं लेता, बल्कि आपको सोचने में मदद करता है। इसके अलावा ऑनलाइन सपोर्ट ग्रुप्स से जुड़ें जहां लोग अपनी सच्ची कहानियां शेयर करते हैं और आपकी मदद कर सकते हैं।
    • चुपचाप प्लान बनाएं- सब कुछ एक दिन में नहीं बदलता, इसलिए बाहर निकलने का एक एग्जिट प्लान बेहद शांति से तैयार करें।