खपरैल से क्यों बनाई जाती थी पुराने घरों की छत? वजह जानकर आप भी कहेंगे- ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं!
पुराने जमाने में घर की छत बनाने के लिए खपरैल का इस्तेमाल किया जाता था।

क्या थीं खपरैल की छत बनाने की वजहें? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पुराने जमाने के घरों में छत ईंट या सीमेंट की नहीं बनाई जाती थी। छत बनाने के लिए मिट्टी से बने खपरैल या खपरा का इस्तेमाल किया जाता था। लाल-भूरे रंग की खपरैल की छत पुराने घरों की पहचान हुआ करती थी।
ऐसे में सवाल आता है कि आखिर खपरैल की छत क्यों बनाई जाती थी? आपको बता दें कि इसके पीछे काफी दिलचस्प कारण छिप हैं। खपरैल से बनी छतें उस समय की जरूरत हुआ करती थीं। आइए जानें क्यों पुराने घरों में खपरैल की छत बनाई जाती थी।
थर्मल इंसुलेशन का काम
खपरैल के छत मौसम की मार से बचाते थे। गर्मी के दिनों में ये घर को गर्म होने से बचाते, जिससे बिना एसी-कूलर के भी घर ठंडा रहता था। साथ ही, खपरैल की छत बनाने के लिए खपरैल एक-दूसरे के ऊपर ओवरलैप करके रखे जाते हैं, जिससे इनके बीच की जगह से घर के अंदर की गर्मी हवा ऊपर उठकर बाहर निकल जाती और घर के अंदर का वेंटिलेशन बेहतर होता था।
बारिश का पानी निकालने के लिए
पुराने समय के घर आज की तरह सीमेंट से नहीं बने होते थे। ऐसे में बारिश से घरों को बचाना एक बड़ी चुनौती थी। बारिश का पानी जमा होने से रोकने के लिए खपरैल की छतों को हमेशा ढलान की तरह बनाया जाता था। खपरैल का आकार और एक-दूसरे पर चढ़ाकर बिछाया गया डिजाइन पानी को छत पर जमा नहीं होने देता था, जिससे कितनी भी तेज बारिश हो, बारिश तुरंत बहकर नीचे गिर जाता था।
कम लागत और ईको-फ्रेंडली
खपरैल बनाने के लिए मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता था और इन्हें गांव के कुम्हारों के पास ही तैयार किया जाता था। इसलिए इन्हें बनवाने में बहुत ज्यादा खर्च नहीं आता था। साथ ही, मिट्टी से बने होने की वजह से ये ईको-फ्रेंडली भी होते थे।
आसान रखरखाव और टिकाऊ
खपरैल भले ही मिट्टी से बने होते थे, लेकिन ये काफी टिकाऊ होते थे। एक बार अच्छी तरह बिछाए जाने के बाद ये सालों तक चलते थे और एक आधा कोई खपरैल टूट भी जाए, तो पूरी छत की मरम्मत करने की जरूरत नहीं होती थी। सिर्फ टूट हुए हिस्से को बदलने से छत दोबारा नई हो जाती थी। इसलिए इन्हें मेंटेन करना भी काफी आसान और सस्ता था।
साउंड और फायर फ्रूफ
मिट्टी को भट्टी में पकाया जाता था, जिससे खपरैल पूरी तरह से फायर प्रूफ हो जाते थे। इसलिए अगर कहीं आस-पास आग लग जाए, तो छप्पर की छत आग नहीं पकड़ती थी। साथ ही, मिट्टी से बने होने की वजह से ये बारिश और तेज हवा की आवाज को काफी हद तक सोख लेते थे, जिससे घर के अंदर शोर कम आता था।
