पंजाब में सोलर ऊर्जा नीति में खामियां उजागर; उपभोक्ताओं को हो रहा नुकसान, अतिरिक्त यूनिट हो जाते हैं शून्य
पंजाब में सोलर बिजली की अतिरिक्त यूनिट बिना मुआवजे खत्म होने से उपभोक्ताओं को नुकसान हो रहा है। विधानसभा समिति ने नीति में बदलाव कर यूनिट बेचने और आगे ...और पढ़ें

सोलर से बिजली बना रहे लोग, लेकिन मुफ्त में जा रही ऊर्जा। (फाइल फोटो)
HighLights
अतिरिक्त सोलर यूनिट्स साल के अंत में शून्य हो जाती हैं।
उपभोक्ताओं को अपनी पैदा की गई बिजली का लाभ नहीं।
नीति में बदलाव कर अतिरिक्त बिजली बेचने की सिफारिश।
रोहित कुमार, चंडीगढ़। पंजाब में सोलर ऊर्जा को बढ़ावा देने के दावों के बीच एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है। लोग अपने घरों, संस्थानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में सोलर प्लांट लगाकर बिजली तो पैदा कर रहे हैं, लेकिन मौजूदा नीतिगत प्रावधानों के कारण उन्हें इसका पूरा आर्थिक लाभ नहीं मिल पा रहा।
विधानसभा की संबंधित समिति की रिपोर्ट में इस मुद्दे को विस्तार से उठाते हुए इसे उपभोक्ताओं के साथ अन्याय बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में लागू नेट मीटरिंग पालिसी के तहत 1 अक्टूबर से 30 सितंबर तक का वार्षिक चक्र निर्धारित किया गया है। इस अवधि के भीतर यदि कोई उपभोक्ता अपने सोलर प्लांट से उत्पन्न पूरी बिजली का उपयोग नहीं कर पाता, तो बची हुई यूनिट्स वर्ष के अंत में स्वतः शून्य कर दी जाती हैं।
यानी उपभोक्ता की ओर से उत्पन्न अतिरिक्त बिजली बिना किसी मुआवजे के ग्रिड में चली जाती है, जिससे उसे सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
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अतिरिक्त बिजली का लाभ नहीं मिल रहा
समिति ने अपने अवलोकन में पाया कि बठिंडा, श्री मुक्तसर साहिब और एसबीएस नगर जैसे जिलों में बड़े स्तर पर सोलर प्रोजेक्ट्स स्थापित किए गए हैं और वहां बिजली उत्पादन भी पर्याप्त मात्रा में हो रहा है। इसके बावजूद उपभोक्ताओं को उनकी अतिरिक्त बिजली का लाभ नहीं मिल रहा।
कई मामलों में उपभोक्ताओं ने समिति के समक्ष यह भी रखा कि वे जानबूझकर अपनी खपत बढ़ाने या सिस्टम को सीमित करने को मजबूर हैं ताकि यूनिट्स व्यर्थ न जाएं।
रिपोर्ट में एक और अहम मुद्दा सामने आया है, जिसमें कहा गया है कि नीति में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद फील्ड स्तर पर उपभोक्ताओं को उनके सैंक्शन लोड के 100 प्रतिशत तक सोलर प्लांट लगाने की अनुमति नहीं दी जा रही।
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कई जगहों पर केवल 70 से 80 प्रतिशत तक ही इंस्टालेशन की अनुमति दी जा रही है, वह भी लिखित आदेशों के बजाय मौखिक निर्देशों के आधार पर। समिति ने इस प्रवृत्ति को मनमाना और पारदर्शिता के विपरीत बताया है।
नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार की गति पर पड़ सकता है असर
समिति ने यह भी कहा कि मौजूदा व्यवस्था सोलर ऊर्जा को प्रोत्साहित करने के बजाय हतोत्साहित कर सकती है, क्योंकि उपभोक्ताओं को उनके निवेश पर अपेक्षित रिटर्न नहीं मिल पा रहा। ऐसे में राज्य में नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार की गति पर भी असर पड़ सकता है।
सरकार को दी गई सिफारिशों में समिति ने सुझाव दिया है कि ऐसी नीति बनाई जाए, जिससे उपभोक्ता अपनी अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में बेच सकें और उन्हें इसका उचित मूल्य मिले। इसके लिए नेट बिलिंग और ग्रॉस मीटरिंग जैसे विकल्पों को और अधिक प्रभावी व व्यावहारिक बनाने की जरूरत बताई गई है। साथ ही वार्षिक चक्र के बजाय क्रेडिट को आगे ले जाने (कैरी फॉरवर्ड) की व्यवस्था पर भी विचार करने की सिफारिश की गई है।
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ट्यूबवेल कनेक्शनों को सोलर सिस्टम से जोड़ने का सुझाव
रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र को भी इस बदलाव से जोड़ने पर जोर दिया गया है। समिति ने सुझाव दिया कि किसानों के ट्यूबवेल कनेक्शनों को सोलर सिस्टम से जोड़ा जाए, ताकि अतिरिक्त बिजली का उपयोग सिंचाई या ग्रिड को बेचने में किया जा सके। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि राज्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी।
समिति ने अंत में स्पष्ट किया कि यदि इन खामियों को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो सोलर ऊर्जा को लेकर लोगों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है। ऐसे में पारदर्शी, उपभोक्ता हितैषी और व्यावहारिक नीति बनाना समय की मांग है, ताकि हरित ऊर्जा के लक्ष्य को सही मायनों में हासिल किया जा सके।