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    देवशयनी एकादशी 2026: ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा, मिलेगा मोक्ष और समृद्धि, पढ़ें व्रत कथा, शुभ मुहूर्त और दान से जुड़े सभी नियम

    Updated: Sat, 25 Jul 2026 08:19 AM (GMT+05:30)

    देवशयनी एकादशी 2026 पर ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा। जानें व्रत कथा, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और दान के नियम। इस दिन की पूजा से मिलेगी मोक्ष और घर में ...और पढ़ें

    देवशयनी एकादशी से जुड़ी जरूरी बातें जानें। (Picture Credit- AI Generated)

    देवशयनी एकादशी से जुड़ी जरूरी बातें जानें। (Picture Credit- AI Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पूरे वर्ष में 24 एकादशी आती हैं और जिस वर्ष अधिकमास आता है तब 26 एकादशी पड़ती हैं। इन सभी एकादशियों में देवशयनी एकादशी को मनुष्यों पर सबसे भारी माना जाता है। क्योंकि इस दिन धरती के पालनहार श्री हरि विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं और चार महीनों के लिए चतुर्मास लग जाता है।

    देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi 2026) 25 जुलाई 2026 को है। इस दिन से चतुर्मास लग जाएगा और 20 नवंबर 2026 को समाप्त होगा।

    मान्यता है कि इस दिन श्री हरि विष्णु का व्रत रखा जाता है और विधि-विधान के साथ उनकी पूजा की जाती है। आइए जानते हैं देवशयनी एकादशी से जुड़ी व्रत कथा, पूजा विधि, आरती, भोग, पूजा का शुभ मुहूर्त और जरूरी दान-पुण्य से जुड़ी संपूर्ण जानकारी।

    कब है देवशयनी एकादशी 2026?

    पंचांग के अनुसार, देवशयनी एकादशी हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस वर्ष यह तिथि 24 जुलाई को ही सुबह 9 बजकर 12 मिनट पर प्रारंभ हो जाएगी, वहीं 25 जुलाई को सुबह 11 बजकर 34 मिनट तक यह तिथि रहेगी। उदया तिथि क्‍योंकि शनिवार की ही मानी जा रही है, इसलिए इस पर्व को 25 जुलाई के दिन ही मनाया जाएगा।

    देवशयनी एकादशी की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

    देवशयनी एकादशी पर आप 25 जुलाई को सुबह 4 बजकर 32 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 16 मिनट तक कभी भी पूजा कर सकते हैं। वहीं, पूजा के लिए आप इस विधि को अपना सकते हैं।

    खबरें और भी

    • सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान करके साफ और पीले रंग के वस्त्र पहन लें।
    • घर के मंदिर वाले स्‍थान पर एक लकड़ी की चौकी पर पीले रंग का वस्‍त्र बिछाएं और श्री हरि विष्‍णु जी की प्रतिमा को स्‍थापित करें।
    • अब भगवान को पीले फूल चंदन, अक्षत, धूप, देसी घी का दीपक अर्पित करें और साथ में पीले रंग के फूल चढ़ाएं। श्री हरि विष्‍णु की पूजा में तुलसी दल का महत्‍व भी है। इसलिए उनके चरणों में तुलसी दल रखना न भूलें।
    • अब व्रत का संकल्प करें और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का निरंतर जाप करें। आज के दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी करना अच्छा माना जाता है।

    देवशयनी एकादशी का भोग

    देवशयनी एकादशी पर आप भगवान विष्णु को कोई भी पीले रंग की मीठी चीज का भोग लगा सकते हैं। घर में बना पंचामृत हो या पीली बर्फी, श्री हरि को सभी का भोग लगाया जा सकता है, बस उसमें तुलसी दल जरूर हो। इस दिन किसी भी अन्न का भोग नहीं लगाया जाता है।

    देवशयनी एकादशी का व्रत कैसे रखें

    पूजा के वक्त ही व्रत का संकल्प ले लें। व्रत आप बिना कुछ खाए भी रख सकते हैं और चाहें तो फलाहार भी ले सकते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने वाले भक्त को जमीन पर ही लेटना चाहिए और रातभर जागकर पहरा देना चाहिए।

    देवशयनी एकादशी की व्रत कथा

    प्राचीन काल में एक पराक्रमी राजा मान्धाता का राज्य था। उनके राज्य में प्रजा सुखी और संतुष्ट थी। एक ऐसा वर्ष आया जब वहां वर्षा रुक गई, जिससे सूखा और भयंकर अकाल पड़ गया। प्रजा दुखी और भूख से त्रस्त होने लगी। राजा ने कई धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ और तप करवाए, लेकिन फिर भी कोई समाधान नहीं हुआ। तब राजा महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचे और उन्होंने स्थिति बताई। महर्षि अंगिरा ने राजा से कहा यह समय देवताओं की विशेष कृपा का है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'देवशयनी एकादशी' कहा जाता है। इस दिन जो व्यक्ति व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करता है और रात्रि जागरण करता है, वह सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति पाता है। आप स्वयं यह व्रत कीजिए और प्रजा को भी व्रत रखने के लिए कहें। राजा ने महर्षि की आज्ञा का पालन किया और पूरे राज्य में देवशयनी एकादशी पर श्री हरि विष्‍णु जी का व्रत रखा। लोगों ने इस दिन उपवास रखा, पूजा की, रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन किया। यह सब देखकर भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न हुए और फलस्‍वरूप राज्‍य में वर्षा हो गई। प्रजा खुश हो गई और उसके सारे दुख दूर हो गए। तब से इस व्रत को सभी रखने लगे ।

    देवशयनी एकादशी पर क्‍या करें दान

    • देवशयनी एकादशी पर अन्‍न का दान महादान माना जाता है।
    • किसी जरूरतमंद को पीले वस्‍त्र दान करने से भी श्री हरि विष्‍णु बहुत अधिक प्रसन्‍न होते हैं।
    • इस दिन व्रत रखने वालों को जल सेवा भी करनी चाहिए और प्‍यासों को पानी पिलाना चाहिए।
    • आप इस दिन तुलसी का पौधा भी दान कर सकते हैं, मगर ध्यान रखें कि जिसे आप पौधा दान कर रहे हैं, वह उसकी उचित देखभाल करे।

    देवशयनी एकादशी की आरती

    एकादशी की पावन आरती:

    ॐ जय एकादशी, जय एकादशी, जय एकादशी माता ।

    विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता ।। ॐ।।

    तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी ।

    गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी ।।ॐ।।

    मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी।

    शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई।। ॐ।।

    पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है,

    शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै ।। ॐ ।।

    नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै।

    शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै ।। ॐ ।।

    विजया फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला आमलकी,

    पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की ।। ॐ ।।

    चैत्र शुक्ल में नाम कामदा, धन देने वाली,

    नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली ।। ॐ ।।

    शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी,

    नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी।। ॐ ।।

    योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी।

    देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी ।। ॐ ।।

    कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए।

    श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए।। ॐ ।।

    अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला।

    इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला।। ॐ ।।

    पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी।

    रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी ।। ॐ ।।

    देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया।

    पावन मास में करूं विनती पार करो नैया ।। ॐ ।।

    परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी।।

    शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी ।। ॐ ।।

    जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै।

    जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै।। ॐ ।।

    भगवान विष्णु जी की आरती

    ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।

    भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

    ॐ जय जगदीश हरे।

    जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।

    स्वामी दुःख विनसे मन का।

    सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

    ॐ जय जगदीश हरे।

    मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।

    स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।

    तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥

    ॐ जय जगदीश हरे।

    तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।

    स्वामी तुम अन्तर्यामी।

    पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥

    ॐ जय जगदीश हरे।

    तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।

    स्वामी तुम पालन-कर्ता।

    मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥

    ॐ जय जगदीश हरे।

    तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

    स्वामी सबके प्राणपति।

    किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥

    ॐ जय जगदीश हरे।

    दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

    स्वामी तुम ठाकुर मेरे।

    अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥

    ॐ जय जगदीश हरे।

    विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा।

    स्वमी पाप हरो देवा।

    श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, सन्तन की सेवा॥

    ॐ जय जगदीश हरे।

    श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।

    स्वामी जो कोई नर गावे।

    कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥

    ॐ जय जगदीश हरे।

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