जीवन में हार मान चुके लोगों के लिए संजीवनी हैं गीता के ये 10 श्लोक, पढ़ें श्रीकृष्ण का सरल संदेश
भगवद्गीता में दिए गए श्री कृष्ण के ये अनमोल विचार आपके तनाव को दूर कर जीवन जीने का सही रास्ता कैसे दिखाते हैं।

भगवद्गीता के प्रभावशाली श्लोक (AI-Generated Image)

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, चिंता और मुश्किल समय में सही फैसला न ले पाना बेहद आम बात है। जब भी मन अशांत होता है तो हमें एक ऐसे मार्गदर्शन की जरूरत होती है जो बिना किसी पक्षपात के सही रास्ता दिखाए। ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक बेहतरीन और प्रैक्टिकल गाइड साबित होती है।
कुरुक्षेत्र में श्री कृष्ण ने अर्जुन को जो सीख दी थी, वह सिर्फ उस दौर के लिए नहीं थी, बल्कि आज हजारों साल बाद भी हमारे जीवन में उतनी ही सटीक बैठती है। अगर आपके पास पूरी गीता पढ़ने का समय नहीं है, तो भी ये 10 श्लोक आपके सोचने और जीने का नजरिया पूरी तरह बदल सकते हैं। आइए जानते हैं भगवद्गीता के 10 सबसे प्रभावशाली श्लोक और उनका मतलब।
1. भगवद्गीता (4.7)
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थ: श्री कृष्ण कहते हैं कि जब-जब दुनिया में सच्चाई, ईमानदारी और अच्छाई कम होने लगती है और पाप, अत्याचार व बुराई बढ़ने लगती है, तब-तब माहौल में संतुलन बनाने, अच्छाई को बचाने और बुराई को खत्म करने के लिए मैं खुद अवतार लेता हूं।
2. भगवद्गीता (2.47)
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थ: आपका पूरा ध्यान सिर्फ अपने काम को ईमानदारी से करने पर होना चाहिए, उसका क्या नतीजा निकलेगा इसकी चिंता पर नहीं। फल क्या मिलेगा, यह आपके हाथ में नहीं है। इसलिए न तो परिणाम के लालच में काम करें और न ही फल न मिलने के डर से काम करना छोड़ें।
3. भगवद्गीता (2.22)
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि
अन्यानि संयाति नवानि देही॥
अर्थ: जैसे हम पुराने या फटे कपड़ों को निकालकर नए कपड़े पहन लेते हैं, ठीक वैसे ही हमारी आत्मा भी एक शरीर के वृद्ध या कमजोर हो जाने पर उसे छोड़कर नया शरीर धारण कर लेती है। मौत सिर्फ शरीर की होती है, आत्मा कभी नहीं मरती।
4. भगवद्गीता (9.34)
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥
अर्थ: भगवान कहते हैं कि अपने मन को मुझमें लगाओ, सच्चे दिल से मेरी भक्ति करो, मुझे प्रणाम करो और अपने हर काम को ईश्वर को समर्पित मानकर करो। जब आप पूरी तरह मुझ पर विश्वास रखेंगे, तो अंत में आपको शांति और ईश्वर की प्राप्ति ही होगी।
5. भगवद्गीता (2.48)
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
अर्थ: हार हो या जीत, सफलता मिले या असफलता हर परिस्थिति में अपने दिमाग को शांत और स्थिर रखकर काम करो। फायदे या नुकसान के बारे में सोचे बिना, समभाव से अपना फर्ज निभाना ही असली 'योग' है।
6. भगवद्गीता (18.66)
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थ: अपनी तमाम चिंताओं, डर और दुविधाओं को साइड में रखकर पूरी तरह से मेरी शरण में आ जाओ। तुम बिल्कुल मत डरो और न ही शोक करो, मैं तुम्हें तुम्हारे सारे पापों और कष्टों से मुक्त कर दूंगा।
7. भगवद्गीता (2.50)
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
अर्थ: जो इंसान समझदारी से काम करता है और फल की उम्मीद छोड़ देता है, वह जीवन में सही-गलत के मानसिक तनाव से ऊपर उठ जाता है। अपने काम को बिना किसी स्वार्थ और पूरे ध्यान के साथ करना ही काम करने की असली कला है।
8. भगवद्गीता (2.20)
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थ: आत्मा न कभी पैदा होती है और न ही कभी मरती है। यह हमेशा से थी, है और हमेशा रहेगी। शरीर भले ही नष्ट हो जाए, लेकिन इसके अंदर मौजूद आत्मा अमर और अविनाशी है।
9. भगवद्गीता (13.25)
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥
अर्थ: परमात्मा को महसूस करने या पाने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ लोग शांत बैठकर ध्यान लगाकर अपने अंदर ईश्वर को महसूस करते हैं, कुछ लोग ज्ञान के जरिए, तो कुछ निस्वार्थ भाव से अपना काम (कर्मयोग) करके ईश्वर को पा लेते हैं।
10. भगवद्गीता (3.35)
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
अर्थ: दूसरों की देखा-देखी या नकल करने से कई गुना बेहतर है कि आप अपनी काबिलियत और स्वभाव के हिसाब से अपना काम करें। भले ही उसमें थोड़ी गलतियां हों, लेकिन अपना काम करते हुए असफल होना भी सही है। दूसरों के रास्ते पर चलने से हमेशा डर और असंतोष ही मिलता है।
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