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    Durga Kavach Path 2026: नवरात्र में क्यों जरूरी है 'दुर्गा कवच' का पाठ? नोट कर लें इसके नियम

    Updated: Thu, 19 Mar 2026 05:16 PM (IST)

    नवरात्र में दुर्गा कवच (Devi Kavach) का पाठ करना किसी वरदान से कम नहीं है। पढ़ें मार्कण्डेय पुराण के अनुसार इस पाठ के लाभ और महत्व। ...और पढ़ें

    दुर्गा कवच पाठ (Image Source: AI-Generated)

    दुर्गा कवच पाठ (Image Source: AI-Generated)

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    धर्म डेक्स, नई दिल्ली। चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri 2026) का पावन समय शक्ति की उपासना का उत्सव है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा (Maa Durga) को प्रसन्न करने के लिए कई पाठ और मंत्रों का सहारा लेते हैं, लेकिन 'श्री दुर्गा कवच' का स्थान सबसे ऊपर माना गया है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त पूरी श्रद्धा के साथ दुर्गा कवच का पाठ (Dura kavach Ka Path) करता है, मां दुर्गा स्वयं उसकी दसों दिशाओं से रक्षा करती हैं।

    दुर्गा कवच का महत्व

    सनातन धर्म में देवी कवच की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि यह पाठ साधक के चारों ओर एक ऐसा सकारात्मक ऊर्जा घेरा (Energy Shield) बना देता है, जिसे कोई भी नकारात्मक शक्ति भेद नहीं सकती।

    शास्त्रों में उल्लेख है कि यह पाठ न केवल मानसिक और आध्यात्मिक शांति देता है, बल्कि असाध्य रोगों और महामारियों से भी शरीर की रक्षा करने की शक्तिकरता है। इस कवच में मां के अलग-अलग स्वरूपों से शरीर के हर अंग की रक्षा की प्रार्थना की जाती है।

     

    Devi kavach

    (Image Source: AI-Generated)

    दुर्गा कवच के लाभ (Benefits of Durga Kavach)

    • अगर आपको बार-बार नजर लगती है या घर में तनाव रहता है, तो दुर्गा कवच का पाठ वातावरण को शुद्ध कर देता है।
    • डर, फोबिया या मानसिक बेचैनी को दूर करने में यह पाठ रामबाण माना जाता है। इसे पढ़ने से मन में गजब का साहस पैदा होता है।
    • अगर आपके पास समय की कमी है या आप संस्कृत का कठिन उच्चारण नहीं कर पा रहे हैं, तो इसे एकाग्र मन से सुनना भी उतना ही प्रभावशाली बताया गया है।
    • मान्यता है कि जो व्यक्ति कवच का पाठ करके किसी शुभ कार्य के लिए निकलता है, उसे हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है।

    मां दुर्गा कवच

    ॐ नमश्‍चण्डिकायै॥

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    मार्कण्डेय उवाच

    यद्‌गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।
    यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

    ब्रह्मोवाच

    अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।
    देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुश्व महामुने ॥ २ ॥

    प्रथमं शैलपुत्रीति द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
    तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ ३ ॥

    पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
    सप्तमं कालरात्रिश्च महागौरीति चाष्टमम् ॥ ४ ॥

    नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
    उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥ ५ ॥

    अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।
    विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥ ६ ॥

    न तेषां जायते किञ्चित् अशुभं रणसङ्कटे ।
    नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥ ७ ॥

    यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां सिद्धि: प्रजायते ।
    प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ॥ ८ ॥

    ऐन्द्री गजसमारुढ़ा वैष्णवी गरुडासना ।
    माहेश्‍वरी वृषारुढ़ा कौमारी शिखिवाहना ॥ ९ ॥

    ब्राह्मी हंससमारुढ़ा सर्वाभरणभूषिता ।
    नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥ १०॥

    दृश्यन्ते रथमारुढ़ा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।
    शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥ ११ ॥

    खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।
    कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥ १२॥

    दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।
    धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥ १३ ॥

    महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ।
    त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि ॥ १४ ॥

    प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ।
    दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी ॥ १५ ॥

    प्रतीच्यां वारुणी रक्षेत् वायव्यां मृगवाहिनी ।
    उदीच्यां रक्ष कौबेरी ईशान्यां शूलधारिणी ॥ १६ ॥

    ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेत् अधस्ताद् वैष्णवी तथा ।
    एवं दश दिशो रक्षेत् चामुण्डा शववाहना ॥ १७ ॥

    जया मे चाग्रतः स्तातु विजया स्तातु पृष्ठतः ।
    अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता ॥ १८ ॥

    शिखां मेऽद्योतिनी रक्षेत् उमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ।
    मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्-यशस्विनी ॥ १९ ॥

    त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ।
    शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ॥ २० ॥

    कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ।
    नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ॥ २१ ॥

    अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ।
    दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठ मध्येतु चण्डिका ॥ २२ ॥

    घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ।
    कामाक्षी चिबुकं रक्षेत् वाचं मे सर्वमङ्गला ॥ २३ ॥

    ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ।
    नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ॥ २४ ॥

    खड्ग्धारिन्यु भौ स्कन्धो बाहू मे वज्रधारिणी ।
    हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेत् अम्बिका चाङ्गुलीस्त्था ॥ २५ ॥

    नखाञ्छूलेश्‍वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेन्नलेश्वरी ।
    स्तनौ रक्षेन्महालक्ष्मी: मनः शोकविनाशिनी ॥ २६ ॥

    हृदय्म् ललिता देवी उदरम् शूलधारिणी ।
    नाभौ च कामिनी रक्षेत् गुह्यं गुह्येश्‍वरी तथा ॥ २७ ॥

    कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
    भूतनाथा च मेद्रं मे ऊरू महिषवाहिनी ॥ २८ ॥

    जङ्घे महाबला प्रोक्ता सर्वकाम प्रदायिनी ।
    गुल्फयोर्नारसिंही च पादौ चामित-तैजसी ॥ २९ ॥

    पादाङ्गुली: श्रीर्मे रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ।
    नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्‍चैवोर्ध्वकेशिनी ॥ ३० ॥

    रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्‍वरी तथा ।
    रक्तमज्जावसामांसानि अस्थिमेदांसि पार्वती ॥ ३१ ॥

    अन्त्राणि कालरात्रिश्‍च पित्तं च मुकुटेश्‍वरी ।
    पद्मावती पद्मकोशे कफे चूड़ामणिस्तथा ॥ ३२ ॥

    ज्वालामुखी नखज्वाला अभेद्या सर्वसंधिषु ।
    शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेत् छाया छत्रेश्‍वरी तथा ॥ ३३ ॥

    अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षमे धर्मचारिणी ।
    प्राणापानौ तथा व्यानं समानोदानमेव च ॥ ३४॥

    यशः कीर्तिंञ्च लक्ष्मीञ्च सदा रक्षतु वैष्णवी ।
    गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत् पशून्मे रक्ष चण्डिके ॥ ३५॥

    पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मी: र्भार्यां रक्षतु भैरवी
    मार्गं क्षेमकरी रक्षेत् वजया सवृतः स्थिता ॥ ३६॥

    रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।
    तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ॥ ३७॥

    पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।
    कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्राधिगच्छति ॥ ३८॥

    तत्र तत्रार्थलाभश्‍च विजयः सार्वकामिकः ।
    यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्‍चितम् ॥ ३९॥

    परमैश्‍वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।
    निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः ॥ ४० ॥

    त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ।
    इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ॥ ४१ ॥

    यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।
    दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येपपराजितः ॥ ४२ ॥

    जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।
    नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ॥ ४३ ॥

    स्थावरं जङ्गमं वापि कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।
    आभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ॥ ४४ ॥

    भूचराः खेचराश्‍चैव जलजाश्‍चोपदेशिकाः ।
    सहजाः कुलजा मालाः शाकिनी डाकिनी तथा ॥ ४५ ॥

    अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्‍च महाबलाः ।
    ग्रहभूतपिशाचाश्‍च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ॥ ४६ ॥

    ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ।
    नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ॥ ४७ ॥

    मानोन्नतिर्भवेद्-राज्ञ: तेजोवृद्धिकरं परम् ।
    यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले ॥ ४८ ॥

    जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।
    यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ॥ ४९ ॥

    तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी ।
    देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ॥ ५० ॥

    प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामाया प्रसादतः ।

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