गणपति बप्पा दूर करेंगे पैसों की तंगी! वरदा चतुर्थी के दिन जरूर करें ऋणमुक्ति गणेश स्तोत्र का पाठ
20 मई को वरदा चतुर्थी है, जिस दिन भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इस दिन ऋणमुक्ति गणेश स्तोत्र का पाठ करने से धन संबंधी परेशानियां दूर होती हैं और सुख- ...और पढ़ें
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कब है वरदा चतुर्थी? (AI Generated Image)

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, 20 मई को वरदा चतुर्थी है। इस दिन श्रद्धा भाव से गणेश जी की पूजा की जाती है। साथ ही फल और मोदक समेत आदि चीजों का भोग लगाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, चतुर्थी व्रत और गणपति बप्पा की साधना करने से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही जीवन में खुशियों का आगमन होता है।
अगर आप भी गणेश जी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो वरदा चतुर्थी के दिन ऋणमुक्ति गणेश स्तोत्र का पाठ करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्तोत्र का पाठ करने से धन संबंधी परेशानी से निजात मिलती है और धन लाभ के योग बनते हैं।
ऋणमुक्ति श्रीगणेश स्तोत्र के लाभ
धार्मिक मान्यता के अनुसार, विधिपूर्वक ऋणमुक्ति श्रीगणेश स्तोत्र के पाठ करने से से जीवन में आने वाले सभी प्रकार के दुख एवं संकट दूर हो जाते हैं। घर में खुशियों का आगमन होता है। आर्थिक तंगी दूर होती है और गणपति बप्पा की कृपा बरसती है।
॥ ऋणमुक्त श्री गणेश स्तोत्रम् ॥
ॐ स्मरामि देवदेवेशंवक्रतुण्डं महाबलम्।
षडक्षरं कृपासिन्धुंनमामि ऋणमुक्तये॥
महागणपतिं वन्देमहासेतुं महाबलम्।
एकमेवाद्वितीयं तुनमामि ऋणमुक्तये॥
एकाक्षरं त्वेकदन्तमेकंब्रह्म सनातनम्।
महाविघ्नहरं देवंनमामि ऋणमुक्तये॥
शुक्लाम्बरं शुक्लवर्णंशुक्लगन्धानुलेपनम्।
सर्वशुक्लमयं देवंनमामि ऋणमुक्तये॥
रक्ताम्बरं रक्तवर्णंरक्तगन्धानुलेपनम्।
रक्तपुष्पैः पूज्यमानंनमामि ऋणमुक्तये॥
कृष्णाम्बरं कृष्णवर्णंकृष्णगन्धानुलेपनम्।
कृष्णयज्ञोपवीतं चनमामि ऋणमुक्तये॥
पीताम्बरं पीतवर्णपीतगन्धानुलेपनम्।
पीतपुष्पैः पूज्यमानंनमामि ऋणमुक्तये॥
सर्वात्मकं सर्ववर्णंसर्वगन्धानुलेपनम्।
सर्वपुष्पैः पूज्यमानंनमामि ऋणमुक्तये॥
एतद् ऋणहरं स्तोत्रंत्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
षण्मासाभ्यन्तरे तस्यऋणच्छेदो न संशयः॥
सहस्रदशकं कृत्वाऋणमुक्तो धनी भवेत्॥
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गणेश मंत्र
1. वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरू मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।
2. वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरू मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।
3. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चिरचिर गणपतिवर वर देयं मम वाँछितार्थ कुरु कुरु स्वाहा ।
4. ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं में वशमानय स्वाहा।
5. ॐ एकदन्ताय विद्धमहे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥
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