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    क्या हिंदू धर्मग्रंथों में जायज है दहेज? जानिए वेद और मनुस्मृति में छिपा असली सच

    Updated: Fri, 22 May 2026 01:18 PM (IST)

    विवाह के दौरान वधू को उसके परिवार द्वारा दी जाने वाली संपत्ति, नकदी या मूल्यवान वस्तुओं को आजकल दहेज के नाम से जाना जाता है। ...और पढ़ें

    दहेज को लेकर क्या कहते हैं शास्त्र? (Picture Credit- AI Generated)

    दहेज को लेकर क्या कहते हैं शास्त्र? (Picture Credit- AI Generated)

    HighLights

    1. हिंदू धर्मग्रंथ में नहीं मिलता दहेज प्रथा का वर्णन

    2. 'स्त्रीधन' नवविवाहिता को स्वेच्छा से दिए गए उपहार होते हैं

    3. 'वरदक्षिणा' और 'कन्यादान' के अर्थ में बदलाव आया है

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। ट्विशा शर्मा और दीपिका नागर जैसी न जाने कितनी ही बेटियां परम्परा के नाम पर चली आ रही दहेज प्रथा की बली चढ़ चुकी हैं। दहेज प्रथा एक सामाजिक अभिशाप है, जो महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों का एक कारण बनता जा रहा है। साथ ही इस प्रथा से लैंगिक असमानता, घरेलू हिंसा और कन्या भ्रूण हत्या जैसे गंभीर अपराधों को बढ़ावा भी मिल रहा है। लेकिन क्या सच में हमारे धर्म ग्रंथों में दहेज प्रथा का वर्णन मिलता है? चलिए जानते है इस बारे में।

    क्या कहते हैं हमारे शास्त्र

    एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, सनातन धर्म में स्त्री को साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है, इसलिए विवाह जैसे पवित्र बंधन में किसी भी प्रकार की सौदेबाजी या लेन-देन का तो प्रश्न ही नहीं उठता। हिंदू धर्म शास्त्रों, विशेषकर मनुस्मृति में 'स्त्रीधन' का उल्लेख अवश्य मिलता है, परंतु यह आज की दहेज प्रथा से पूरी तरह भिन्न है।

    स्त्रीधन वह संपत्ति या धन है जो एक नवविवाहिता कन्या को उसके माता-पिता, परिवार और सगे-संबंधियों द्वारा पूरी तरह उपहार स्वरूप और स्वेच्छा से दिया जाता था। इसका मुख्य उद्देश्य केवल इतना था कि कन्या को अपनी नई गृहस्थी बसाने और नए जीवन की शुरुआत करने में आसानी हो। इस धन पर केवल और केवल उस स्त्री का ही पूर्ण अधिकार होता था, जिसे बाद में कुप्रथा के रूप में बदल दिया गया। जबकि शास्त्रों में दहेज का कोई वर्णन ही नहीं है।

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    (Picture Credit- AI Generated)

    इस प्रथा का भी निकाला जाता है गलत अर्थ

    यह कहा जा सकता है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में दबाव डालकर दहेज मांगने का कोई समर्थन नहीं किया गया। प्राचीन काल में कन्या के माता-पिता स्वेच्छा से वर को प्रेम स्वरूप उपहार या दक्षिणा देते थे। जिसे आजकल दहेज के रूप में देखा जाता है। इससे यह साफ होता है कि हमारे धर्म शास्त्र भी दहेज जैसी कुप्रथा का समर्थन नहीं करते हैं। इसी तरह धर्म शास्त्रों में वर्णित कन्यादान का अर्थ भी आज के समय में बदल चुका है, जो मूल अर्थ से बिल्कुल अलग है।

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    (Picture Credit- AI Generated)

    क्या है कन्यादान का सही अर्थ

    हिंदू धर्मग्रंथों में 'कन्यादान' से कहीं अधिक 'पाणिग्रहण' शब्द को प्राथमिकता दी गई है। इसका सीधा अर्थ है—'हाथ थामना' अर्थात वधू का हाथ हमेशा के लिए वर के हाथ में सौंपना। यह मात्र एक सामाजिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि वर-वधू द्वारा जीवनभर एक-दूसरे को प्रेम, विश्वास और सहभागिता का वचन देने का पवित्र माध्यम भी है। यह दो आत्माओं के बीच समर्पण और एक नए जीवन की सुंदर शुरुआत है। वहीं आज के समय में हम कन्यादान का अर्थ समझते हैं - कन्या को दान के रूप में वर पक्ष को दे देना, जो बिल्कुल गलत है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।