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    आखिर लंकापति रावण की नाभि में कहां से आया था अमृत? पढ़ें रामायण का अनसुना प्रसंग

    Updated: Mon, 25 May 2026 08:30 PM (IST)

    यह लेख रावण की नाभि में अमृत होने के रहस्य को उजागर करता है, जिसके कारण वह युद्ध में अजेय प्रतीत होता था। इसमें मंदोदरी और विभीषण की भूमिका के साथ-साथ ...और पढ़ें

    रावण की नाभि में अमृत कैसे आया था? (Picture Credit- AI Generated)

    रावण की नाभि में अमृत कैसे आया था? (Picture Credit- AI Generated) 

    HighLights

    1. रावण की नाभि में अमृत होने का गहरा रहस्य

    2. मंदोदरी और विभीषण ने अमृत स्थापित करने में मदद की

    3. रावण को ब्रह्मा के वरदान से मिला था यह अमृत

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। धार्मिक ग्रंथ रामायण में लंकापति रावण का चरित्र अहंकारी और क्रूर प्रतीत होता है। वह बेहद विद्वान अकल्पनीय शक्तियों का स्वामी भी था। युद्ध के दौरान जब भगवान श्रीराम बाण से रावण के सिर और भुजाओं को धड़ से अलग कर रहे थे, तो तब जैसे ही एक सिर कटकर धरती पर गिरता, उसकी जगह एक नया सिर उत्पन्न हो जाता है।

    इसके पीछे की वजह रावण की नाभि में अमृत था, लेकिन क्या आप जानते हैं कि रावण की नाभि में कैसे आया अमृत। अगर नहीं पता, तो ऐसे में आइए हम आपको बताते हैं इसकी वजह के बारे में।

    कहां से आया रावण की नाभि में अमृत?

    पौराणिक कथा के अनुसार, जब बाली और रावण के बीच युद्ध चल रहा था, तो उस दौरान रावण घायल हो गया था। ऐसे में रावण की पत्नी ने मंदोदरी ने उसे अमर बनाने का प्रण लिया। इसके बाद मंदोदरी चंद्रलोक पहुंची। वहां से अमृत की कुछ बूंदें चुरा कर लाईं। इसके बाद मंदोदरी ने रावण की नाभि में अमृत स्थापित करने का फैसला लिया।

    रावण के भाई विभीषण को नाड़ी-शास्त्र का अधिक ज्ञान था। इसलिए मंदोदरी ने रावण की नाभि में अमृत स्थापित करने के लिए विभीषण की मदद ली। इसके बाद विभीषण ने अशोक वाटिका लंकापति रावण को बेहोश किया। कमल-नाल का इस्तेमाल कर अमृत रावण की नाभि में स्थापित कर दिया। इस बात की जानकारी सिर्फ मंदोदरी और विभीषण को ही थी।

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    पौराणिक कथा के अनुसार, रावण को ब्रह्मा जी ने अमर होने का वरदान नहीं दिया था, क्योंकि उसकी मृत्यु राम जी के द्वारा निश्चित थी। ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए लंकापति रावण ने कई वर्षों तक तपस्या की। उसने हर हजार वर्ष में अपना एक सिर काटकर अग्नि में आहुति दी। जब रावण के 10वें सिर की बारी आई, तो ऐसे में ब्रह्मा जी प्रकट हुए और रावण से वरदान मांगने के लिए कहा। रावण ने वरदान मांगा की उसका कोई भी वध न कर सके। रावण के इसी वरदान की वजह से उसकी नाभि में वह अमृत कुंड स्थापित हुआ। रामचरितमानस के लंका कांड में रावण की नाभि में अमृत के बारे में वर्णन किया गया है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।