महाभारत में कर्ण के सारथी बने थे राजा शल्य, लेकिन क्यों करते रहे उनका मनोबल कमजोर?
महाभारत युद्ध में राजा शल्य कर्ण के सारथी बने, लेकिन पूरे युद्ध के दौरान उनका मनोबल गिराते रहे। जानिए इसके पीछे की रोचक कथा और कृष्ण की रणनीति। ...और पढ़ें

महाभारत युद्ध का रहस्य (AI-Generated Image)
HighLights
राजा शल्य नकुल और सहदेव के मामा थे
शल्य दुर्योधन की चाल के कारण कौरव पक्ष में शामिल हुए
युद्ध में कर्ण के सारथी बने थे शल्य
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाभारत के युद्ध से पहले ही यह स्पष्ट हो चुका था कि कौरव और पांडव अब किसी समझौते पर नहीं पहुंच सकते। युद्ध ही अंतिम रास्ता बचा था। ऐसे में पूरे आर्यावर्त के राजाओं को दोनों पक्षों की ओर से युद्ध में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया।
मद्र देश के राजा शल्य भी अपने भांजों नकुल और सहदेव का साथ देने के लिए पांडवों की ओर से कुरुक्षेत्र जाने निकले। शल्य, माद्री के भाई थे और अपने दोनों भांजों से विशेष स्नेह रखते थे। कहा जाता है कि वे उन्हें अपने उत्तराधिकारी तक मान चुके थे।
राजा शल्य महाभारत के उन पात्रों में गिने जाते हैं, जो परिस्थितियों के कारण एक पक्ष में खड़े थे लेकिन उनका मन दूसरे पक्ष के साथ था।
जब दुर्योधन की चाल में फंस गए राजा शल्य
महाभारत कर्ण पर्व के अध्याय 35 के अनुसार, कुरुक्षेत्र की यात्रा के दौरान शल्य और उनकी सेना का भव्य स्वागत किया गया। रास्ते भर उनके लिए उत्तम भोजन, विश्राम और मनोरंजन की व्यवस्था अच्छे से की गई। शल्य को लगा कि यह सब पांडवों ने करवाया है। प्रसन्न होकर उन्होंने घोषणा कर दी कि जो व्यक्ति इतना सम्मान दे रहा है, उसके लिए वे युद्धभूमि में प्राण भी न्योछावर कर देंगे।
बाद में उन्हें पता चला कि यह सारी व्यवस्था दुर्योधन ने करवाई थी। जब दुर्योधन ने उनसे कौरव पक्ष से युद्ध करने का आग्रह किया, तो शल्य अपने वचन से पीछे नहीं हट सके और उनकी बात मानते हुए उन्हें कौरवों की ओर से युद्ध में शामिल होना पड़ा।
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हालांकि, मन से शल्य का दिल-ओ-दिमाग अपने भांजों के साथ ही था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि अगर अवसर मिले और वे कर्ण के सारथी बनें, तो उसकी प्रशंसा करने के बजाय अर्जुन और पांडवों की वीरता का उल्लेख करते रहें।
शल्य तोड़ते रहे कर्ण का मनोबल
जब महाभारत युद्ध का 16वां और 17वां दिन आया तब राजा शल्य कर्ण के सारथी बने। पूरे समय वे अर्जुन और पांडवों की प्रशंसा करते रहे। इससे कर्ण कई बार नाराज हुआ, और उनका मनोबल भी लगातार टूटता रहा। लेकिन, उन्होंने अपना ध्यान युद्ध पर ही केंद्रित रखा।

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जब कर्ण ने अर्जुन पर नागास्त्र (विनाशकारी अस्त्र है जो जहरीले नागों (सांपों) की शक्ति से युक्त) चलाने की तैयारी की, तब शल्य ने उसे अलग सलाह दी। लेकिन, कर्ण ने उनकी बात नहीं मानी। इसके बावजूद नागास्त्र अर्जुन का मुकुट गिराने में सफल रहा, हालांकि श्रीकृष्ण की सूझबूझ से अर्जुन के प्राण को बचा लिया।
कर्ण की मृत्यु और शल्य का अंत
महाभारत के सबसे प्रसिद्ध प्रसंगों में से एक यह भी है, जब कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया। कर्ण ने शल्य से मदद मांगी, लेकिन उन्होंने यह कहकर इनकार कर दिया कि सारथी का काम पहिया निकालना नहीं है।
इसी दौरान अर्जुन ने अंजलिका अस्त्र का प्रयोग कर कर्ण का वध कर दिया। कर्ण की मृत्यु के बाद शल्य कौरव सेना के सेनापति बनाए गए। हालांकि, उनका नेतृत्व ज्यादा समय तक नहीं चल सका और बाद में युधिष्ठिर के साथ हुए भयंकर युद्ध में उनका वध हो गया। विभिन्न पुराणिक एवं लोकप्रचलित महाभारत कथाएं (जहां कृष्ण अथवा युधिष्ठिर द्वारा शल्य को कर्ण का मनोबल तोड़ने की सलाह देने का उल्लेख मिलता है)।
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