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    पूजा-पाठ के दौरान कलाई पर क्यों बांधी जाती है मौली, इसका पौराणिक महत्व और नियम क्या है?

    Updated: Tue, 04 Aug 2026 12:23 PM (IST)

    पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान के दौरान कलाई पर रक्षा सूत्र या मौली क्यों बांधी जाती है? जानिए इसका पौराणिक महत्व, सही नियम और इससे जुड़े खास मंत्र के ब ...और पढ़ें

    रक्षा सूत्र या मौली बांधने के नियम (AI-Generated Image)

    रक्षा सूत्र या मौली बांधने के नियम (AI-Generated Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जब भी हम अपने घर में कोई पूजा-पाठ, हवन या किसी बड़े धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होते हैं, तो पंडित जी हमारी कलाई पर एक लाल-पीले रंग का धागा जरूर बांधते हैं। इसे हम रक्षा सूत्र या मौली के नाम से जानते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये धागा क्यों बांधा जाता है और इसके पीछे की असली वजह क्या है?

    दरअसल, कलाई पर रक्षा सूत्र बांधना कोई आम रिवाज नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन वैदिक परंपरा का एक बहुत ही पवित्र हिस्सा है। पुराने समय में जब यज्ञ या बड़े अनुष्ठान होते थे, तब इसे 'संकल्प सूत्र' के रूप में बांधा जाता था।

    रक्षा सूत्र का पौराणिक रहस्य

    स्कन्द पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, रक्षा सूत्र बांधने की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। भगवान विष्णु ने जब वामन अवतार लिया था, तब उन्होंने असुरों के राजा बलि की अमरता और रक्षा के लिए उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। इसके बाद से ही इस संकल्प सूत्र को 'रक्षा सूत्र' के रूप में बांधे जाने की परंपरा चल पड़ी। इतना ही नहीं, अपने पति की रक्षा की कामना के साथ माता लक्ष्मी ने भी राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा था, यही वजह है कि इसे रक्षा बंधन का भी प्रतीक माना जाता है।

    त्रिदेव और त्रिदेवियों से जुड़ा है मौली का रहस्य

    आपने गौर किया होगा कि मौली मुख्य रूप से तीन कच्चे धागों से मिलकर बनती है। इसे बांधने के भी खास नियम होते हैं- जैसे पुरुष और अविवाहित कन्याओं की दाईं कलाई पर, जबकि विवाहित महिलाओं की बाईं कलाई पर इसे बांधा जाता है।

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    जब भी कलाई पर मौली बांधी जाती है, तो पंडित जी एक खास वैदिक मंत्र का उच्चारण करते हैं:

    "येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।"

    हमारी कलाई पर तीन रेखाएं होती हैं, जिन्हें 'मणिबंध' कहा जाता है। ये तीनों रेखाएं ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) का प्रतीक मानी जाती हैं। साथ ही, इन रेखाओं में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती (त्रिदेवियों) का भी वास होता है। जब पंडित जी मंत्रों से अभिमंत्रित करके कलाई पर रक्षा सूत्र बांधते हैं, तो यह सीधे त्रिदेव और त्रिदेवियों को समर्पित हो जाता है और वे हमारी रक्षा करते हैं।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।