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    सावन सोमवार और प्रदोष व्रत एक साथ पड़ जाए तो? कन्फ्यूजन छोड़ें, यहां देखें पूजा का सटीक नियम

    Updated: Wed, 05 Aug 2026 10:00 AM (IST)

    जब सावन सोमवार और प्रदोष व्रत एक साथ पड़ें, तो यह भगवान शिव और माता पार्वती की असीम कृपा पाने का महा-संयोग होता है। ...और पढ़ें

    सावन सोमवार और प्रदोष व्रत की पूजा विधि (AI-Generated Image)

    सावन सोमवार और प्रदोष व्रत की पूजा विधि (AI-Generated Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सावन का महीना महादेव को अत्यंत प्रिय है। इस पवित्र महीने में पड़ने वाले हर सोमवार का अपना एक खास महत्व होता है। कई भक्त इस दौरान 16 सोमवार के व्रत की शुरुआत भी करते हैं। वहीं, हर महीने की त्रयोदशी तिथि को रखा जाने वाला प्रदोष व्रत भी पूरी तरह से भगवान शिव को ही समर्पित है। शास्त्रों में प्रदोष काल को शिव-पूजन के लिए सबसे फलदायी समय माना गया है।

    लेकिन, कई बार पंचांग में ऐसा दुर्लभ संयोग बन जाता है जब सावन का सोमवार और प्रदोष व्रत दोनों एक ही दिन पड़ जाते हैं। ऐसे में शिव भक्तों के मन में यह दुविधा पैदा होना स्वाभाविक है कि पूजा कैसे करें? दोनों में से किस व्रत को प्रमुखता दें और भगवान का अभिषेक किस समय करना सही रहेगा आइए जानते हैं।

    शास्त्र क्या कहते हैं?

    धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, जब सावन सोमवार और प्रदोष व्रत एक साथ पड़ें, तो इसे भगवान शिव और माता पार्वती की असीम कृपा पाने का महा-संयोग मानना चाहिए। इस दिन की गई श्रद्धापूर्ण पूजा से जीवन में सुख-शांति आती है। आपको दोनों व्रत अलग-अलग करने की कोई जरूरत नहीं है। आप एक ही दिन में दोनों व्रत के नियमों का पालन बड़ी ही आसानी से कर सकते हैं।

    Somwar vrat puja

    (AI-Generated Image)

    पूजा की सही विधि

    इस खास संयोग में आपको सुबह और शाम, दोनों समय शिव आराधना करनी चाहिए:

    सुबह की पूजा (सोमवार व्रत के लिए): सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। भगवान शिव का स्मरण करते हुए दोनों व्रत का एक साथ संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग का जल या पंचामृत से अभिषेक करें। 'ॐ नमः शिवाय' का जप करते हुए बेलपत्र अर्पित करें और सोमवार व्रत की कथा जरूर पढ़ें।

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    शाम की पूजा (प्रदोष व्रत के लिए): प्रदोष व्रत की असली महत्ता संध्या काल यानी 'प्रदोष काल' में होती है। यह समय सूर्यास्त से लेकर लगभग 2 घंटे बाद तक रहता है। शाम के समय एक बार फिर स्नान करें या हाथ-मुंह धोकर स्वच्छ हो जाएं। अब शिवलिंग पर दूध, बेलपत्र, धतूरा, चंदन और अक्षत चढ़ाएं। इसके बाद प्रदोष व्रत की कथा सुनें, दीपदान करें और अंत में श्रद्धापूर्वक शिव जी की आरती करें।

    व्रत का पारण (खोलना) आप अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार शाम की पूजा के बाद या अगले दिन सुबह कर सकते हैं।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।x