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    मृत्यु के बाद घर में मृत्युभोज का आयोजन जरूरी क्यों होता है? गरुड़ पुराण में छिपा है रहस्य

    Updated: Mon, 20 Jul 2026 03:30 PM (IST)

    मृत्यु के बाद तेरहवें दिन 'मृत्युभोज' का आयोजन मृतक की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, यह संस्कार पितृ ...और पढ़ें

    मृत्युभोज क्यों है जरूरी: गरुड़ पुराण में छिपा है इस परंपरा का रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

    मृत्युभोज क्यों है जरूरी: गरुड़ पुराण में छिपा है इस परंपरा का रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जब घर में किसी की मृत्यु होती है तो कई संस्कार निभाए जाते हैं। मृत्योपरांत ही घर में सूतक काल लग जाता है जो पूरे तरह दिनों तक चलता है।

    इस दौरान कई नियमों का पालन किया जाता है जिसके बारे में गरुड़ पुराण में भी कई नियम बनाए गए हैं। ऐसे ही मृत्यु के बाद तेरहवें दिन मृत्युभोज का आयोजन किया जाता है जिसमें ब्राह्मणों के साथ मान-दान को सम्मान पूर्वक भोजन कराया जाता है।

    ऐसा माना जाता है कि यदि मृत्युभोज नहीं किया जाता है तो मृतक की आत्मा को शांति नहीं मिलती है और घर में पितृ दोष भी लग सकता है। इसे सोलह संस्कारों का एक जरूरी हिस्सा माना जाता है। आइए आपको बताते हैं क्या होता है यह भोज और क्यों माना जाता है जरूरी?

    मृत्युभोज क्यों है जरूरी?

    हिंदू धर्म में मृतक की आत्मा को शांति दिलाने के लिए वंशजों द्वारा मृत्युभोज कराया जाता है। इस भोज को अत्यंत जरूरी माना जाता है क्योंकि यह मृतक के लिए मोक्ष का द्वार खोलता है।

    इस दौरान ब्राह्मण को भी भोजन कराया जाता है, कौवे को भोजन खिलाते हैं और गौ ग्रास भी निकाला जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस तरह के भोज से दिवंगत की आत्मा को शांति मिलती है और ये मृतक के साथ उसके कष्ट में शामिल होने का एक तरीका माना जाता है।

    मृत्युभोज का महत्व क्या है?

    गरुड़ पुराण में बताया गया है कि मृत्यु के बाद, आत्मा तेरहवें दिन तक अपने परिवार के सदस्यों के आस-पास ही घर पर मौजूद रहती है। इसके बाद, आत्मा परलोक के लिए अपनी यात्रा शुरू करती है।

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    ऐसा माना जाता है कि तेरहवें दिन प्रियजनों, मित्रों, ब्राह्मणों आदि को भोजन कराने से मृतक की आत्मा को मुक्ति मिलती है और परलोक जाने में आसानी हो जाती है। यही नहीं गरुड़ पुराण के नियमों के अनुसार, मृत्युभोज जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को कराना सबसे शुभ माना जाता है।

    मृत्युभोज के लिए गरुड़ पुराण में क्या लिखा है?

    गरुड़ पुराण में लिखा है कि जिस घर में किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है उस घर में बारह दिनों तक भोजन नहीं बनता है यही नहीं 13 दिनों तक अन्य कई नियमों का पालन भी किया जाता है।

    ऐसा इसलिए होता क्योंकि इससे मृत व्यक्ति को सम्मान दिया जाता है। वहीं तेरहवें दिन अपनी सामर्थ्य अनुसार मृत्युभोज का आयोजन करके मृतक की आत्मा को सही दिशा की ओर भेजा जाता है।

    यदि किसी वजह से इस तरह के भोज का आयोजन नहीं हो पाता है तो मृतक की आत्मा आस-पास ही भटकती रहती है और उसके लिए मुक्ति के द्वार नहीं खुलते हैं। यही नहीं ऐसे घरों में पितृ दोष भी लग जाता है और बनते काम भी बिगड़ने लगते हैं।

    गरुड़ पुराण की मानें तो मृत्युभोज अत्यंत जरूरी है और इसके बिना मृतक की आत्मा को पूर्ण रूप से शांति नहीं मिलती है। यही नहीं ऐसा न करने से घर के सदस्यों को भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही मृत्युभोज कराना चाहिए।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।