मृत्यु के बाद तेरहवीं का भोज क्यों करवाया जाता है? जानिए क्या है इसका रहस्य
गरुड़ पुराण और हिंदू मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के 13वें दिन तेरहवीं का भोज आत्मा की शांति और सांसारिक मोह-माया से मुक्ति के लिए किया जाता है। यह परंप ...और पढ़ें

क्यों की जाती है तेरहवीं (Picture Credit: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। गरुड़ पुराण और हिंदू मान्यताओं के अनुसार, व्यक्ति की मृत्यु के 13वें दिन तेरहवीं करने का विधान है। ऐसा माना जाता है कि तेरहवीं करने से आत्मा सांसारिक मोह-माया से मुक्त होकर पितृ लोक की यात्रा में शांति प्राप्त होती है। तेरहवीं के दौरान ब्राह्मण भोज कराया जाता है।
शांति पाठ, हवन और विशेष पिंडदान किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, तेरहवीं के समय इन कामों को करने से आत्मा को परलोक की यात्रा के लिए बल और शांति मिलती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि व्यक्ति की मृत्यु के 13वें दिन क्यों किया जाता है तेरहवीं का भोज। अगर नहीं पता, तो ऐसे में आइए इस लेख में आपको एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषियों के अनुसार बताते हैं इसके पीछे का कारण।
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(Picture Credit: AI Generated)
क्यों होता है तेरहवीं का भोज?
एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषियों के अनुसार, तेरहवीं का भोज केवल एक रीति-रिवाज नहीं, बल्कि आत्मा के देवलोक प्रस्थान पर उसे दी जाने वाली भावपूर्ण विदाई और शोक में डूबे परिवार को फिर से जीवन पथ पर आगे बढ़ाने की सामाजिक परंपरा है।
आत्मा का अंतिम सफर और विदाई
संसार का नियम है कि जो आया है, उसे जाना ही है। तेरहवीं का श्राद्ध और भोज मृत आत्मा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और उनके अगले सफर की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने का सबसे पावन मार्ग है।
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जीवन की निरंतरता और अन्नदान का रहस्य
यह प्रथा हमें सिखाती है कि जीवन क्षणभंगुर है और दुख में डूबे रहकर रुकना उचित नहीं:
शोक की समाप्ति: 13 दिनों का शोक समाप्त कर दूसरों को अन्नदान देना इस बात का प्रतीक है कि जीवन रुकता नहीं, बल्कि नए सूर्योदय के साथ निरंतर आगे बढ़ता रहता है।
सामाजिक सहयोग: इस दिन स्वजनों और समाज को भोजन कराने से परिवार के दुख का बोझ कम होता है और जीवन में नया मोड़ आता है।
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तेरहवीं में क्या-क्या करते हैं?
ब्राह्मण भोज और दान-पुण्य- तेरहवीं में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। इसके बाद उन्हें वस्त्र, अन्न और जरूरी चीजों को दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, तेरहवीं के दौरान दान करने से उसका पुण्य मृत व्यक्ति की आत्मा को प्राप्त होता है, जिससे उस आत्मा की आगे की यात्रा सरल होती है। इसके अलावा इस दिन घर के शुद्धिकरण और आत्मा की शांति प्राप्ति के लिए हवन भी किया जाता है।
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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।