Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के समय मुखाग्नि क्यों दी जाती है? गरुड़ पुराण में छिपे रहस्य के बारे में जानें

    Updated: Tue, 04 Aug 2026 10:00 AM (IST)

    हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के दौरान मुखाग्नि का विशेष महत्व है, जो आत्मा की मुक्ति और पुनर्जन्म की अवधारणा से जुड़ा है। गरुड़ पुराण में इस प्रक्रिया ...और पढ़ें

    हिंदू अंतिम संस्कार में मुखाग्नि का रहस्य गरुड़ पुराण के अनुसार (Picture Credit: AI Generated)

    हिंदू अंतिम संस्कार में मुखाग्नि का रहस्य गरुड़ पुराण के अनुसार (Picture Credit: AI Generated)

    HighLights

    1. मुखाग्नि आत्मा को सांसारिक मोह से मुक्ति दिलाती है।

    2. गरुड़ पुराण में मुखाग्नि की विधि और महत्व बताया गया है।

    3. यह अंतिम संस्कार का महत्वपूर्ण अंग, आत्मा की मुक्ति हेतु।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म पुनर्जन्म की धारणा पर आधारित है। इसका मतलब यह है कि मृत्यु के बाद आत्मा किसी दूसरे रूप में जन्म लेती है। उनका मानना है कि भले ही भौतिक शरीर नष्ट हो जाता है, लेकिन आत्मा कहीं न कहीं मौजूद रहती है।

    जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो अंतिम संस्कार की अलग-अलग प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं जिससे मृतक की आत्मा को मुक्ति मिलती है। अंतिम संस्कार के समय मृत शरीर को मुखाग्नि दी जाती है और यह प्रक्रिया सदियों से चली आ रही है।

    मुखाग्नि का अर्थ है मृतक को मुख की तरफ से अग्नि देना। मुखाग्नि को न केवल शरीर बल्कि आत्मा को भी मुक्क्ती देने की प्रक्रिया माना जाता है। आइए आपको बताते हैं अंतिम संस्कार के दौरान की जाने वाली मुखाग्नि की प्रक्रिया क्या है और गरुड़ पुराण में इसके बारे में क्या लिखा है?

    मृतक को क्यों दी जाती है मुखाग्नि?

    हिंदू धर्म में कुल 16 संस्कार होते हैं जिनका अलग महत्व होता है। इन सभी में से सबसे आखिरी संस्कार अंतिम संस्कार को माना जाता है जिसे मृत व्यक्ति के परिजनों द्वारा निभाया जाता है।

    खबरें और भी

    अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया विधि-विधान के साथ की जाती है जिससे उसकी आत्मा को मुक्ति मिलती है और आत्मा एक शरीर को छोड़कर अन्य जीवन में प्रवेश करती है। मृत्यु के बाद शरीर को अग्नि में जलाना शरीर और आत्मा दोनों को मुक्ति देने का रूप माना जाता है। वहीं अंतिम संस्कार के नियमों में से एक मुखाग्नि को माना जाता है।

    मुखाग्नि देने के लिए मृत शरीर के मुख पर चंदन का लेप किया जाता है उसके बाद मृतक का बड़ा पुत्र शव को मुख की तरफ से अग्नि देता है और धीरे-धीरे अग्नि पूरे शरीर में प्रवाहित होकर शरीर को जला देती है। इस पूर्ण प्रक्रिया को दाह संस्कार कहा जाता है।

    गरुड़ पुराण में मुखाग्नि के बारे में क्या लिखा है?

    हिंदू धर्म में जब किसी मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार किया जाता है तो सबसे पहले उसके मुख की ओर अग्नि प्रज्वलित की जाती है। मृतक को मुखाग्नि देने का काम उसका बेटा या अन्य कोई रिश्तेदार करता है।

    मुखाग्नि देने से पूर्व मृत शरीर को स्नान कराया जाता है और नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। उसके शरीर मुख्य रूप से चेहरे पर चंदन लगाया जाता है और उसके बाद ही दाह संस्कार की प्रक्रिया शुरू की जाती है।

    मुखाग्नि देने से पहले मृतक का पुत्र पानी से भरी मटकी को फोड़ता है और शव की परिक्रमा करने के बाद मुखाग्नि दी जाती है।
    गरुड़ पुराण के अनुसार मुखाग्नि देने का सीधा मतलब है कि अब व्यक्ति सांसारिक मोह माया को छोड़कर अन्य किसी लोक में प्रवेश करने जा रहा है और इस प्रक्रिया से उसकी आत्मा को मुक्ति मिलती है।

    मुखाग्नि के बिना अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को पूर्ण नहीं माना जाता है और ऐसा कहा जाता है कि यह सांसारिक मोह-माया को छोड़ने का एक तरीका है।

    यह भी पढ़ें- अंतिम संस्कार के बाद श्मशान घाट से लौटकर स्नान करना क्यों है जरूरी? जानिए धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

    यह भी पढ़ें- अंतिम संस्कार में किन लकड़ियों का इस्तेमाल होता है? गरुड़ पुराण में छिपे रहस्य से आप भी होंगे अनजान

    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।