Makar Sankranti 2026: आखिर क्यों मनाई जाती है मकर संक्रांति? जानें पौराणिक कथा
सभी संक्रांतियां पुण्यप्रद होती हैं, तथापि सूर्य के उत्तरायण (Uttarayan) होने का अवसर अर्थात मकर संक्रांति को विशेष पुण्यकाल के रूप में जाना जाता है। ...और पढ़ें
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उत्तरायण के छह महीनों में शरीर त्यागने वाले ब्रह्मवेत्ता परमगति को प्राप्त होते हैं
आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण (सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, अयोध्या)। तमसो मा ज्योतिर्गमय...की वैदिक प्रार्थना दोहराने वाला भारत देश सूर्य को अपने जीवन के केंद्र में मानता है। वेद कहते हैं सूर्य जड़-चेतन जगत की आत्मा है- ‘सूर्य आत्मा जगतः तस्थुषश्च।’ सूर्य के प्रति इस महत्व-बुद्धि का वैज्ञानिक निरूपण भारतीय परंपरा में अनादिकाल से चला आ रहा है।
सूर्य के सतत संचरण को बारहों राशियों में विश्लेषित करती हुई 12 संक्रांतियां हमारी कालगणना में परिगणित हैं। तकनीकी तौर पर इन संक्रांतियों को चार श्रेणियों में विभक्त किया गया है। अयन, विषुव, षड्शीति मुख एवं विष्णुपदी। इस ज्योतिषीय विश्लेषण की सूक्ष्मता में गए बिना हम सूर्य के मकर राशि में संक्रमण को थोड़ा समझते हैं। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को संक्रांति कहा जाता है।
सभी संक्रांतियां पुण्यप्रद होती हैं, तथापि सूर्य के उत्तरायण (Uttarayan) होने का अवसर अर्थात मकर संक्रांति को विशेष पुण्यकाल के रूप में जाना जाता है। इस अवसर पर स्नान-दान समेत अनेक धर्मकृत्यों का निर्देश प्राप्त होता है। वर्ष को छह-छह महीने के भेद से उत्तरायण तथा दक्षिणायन दो भागों में बांटा गया है।
अयन का अर्थ मार्ग अथवा स्थान होता है, ये अयन जीव की सद्गति आदि के संकेतक भी हैं। इहलोक का परित्याग करके उत्तमलोकों की प्राप्ति करने को निरूपित करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में उत्तरायण एवं दक्षिणायन को प्रतिपादित किया है। उनके अनुसार, प्रकाश के अभिमानी देवता से युक्त उत्तरायण के छह महीनों में शरीर त्यागने वाले ब्रह्मवेत्ता परमगति को प्राप्त होते हैं-
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अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥
सूर्य की गति से निर्धारित होने वाला यह पुण्यपर्व क्रमशः कुछ आगे की ओर बढ़ता जाता है। ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ लिखने वाले भारतरत्न श्रीकाणे महोदय के अनुसार, “आज से लगभग 80 वर्ष पूर्व, उन दिनों के पंचांग के अनुसार यह 12 या 13 जनवरी को पड़ती थी, किंतु अब विषुवतों के अग्रगमन (अयन चलन) के कारण तिथियों में 13 या 14 जनवरी को पड़ा करती है।
” श्री काणे के इस कथन का एक अद्यतन उदाहरण हमारे सम्मुख है और अब मकर संक्रांति 15 या 15 जनवरी तक आगे बढ़ गई है। यह आगामी सात-आठ दशकों के बाद एक और दिन आगे बढ़ सकती है। खगोल से भूगोल की परस्परता को प्रमाणित करती मकर संक्रांति अपने धार्मिक महत्व के साथ ही भारतवर्ष के एक बड़े सांस्कृतिक पर्व के रूप में भी प्रतिष्ठित है।
गोस्वामी तुलसीदास जी के श्रीरामचरितमानस में संक्रांति के इस अवसर को माघ मेले के रूप में रेखांकित किया गया है। गोस्वामी जी कहते हैं “माघ मकर गत रबि जब होई। तीरथ पतिहिं आव सब कोई॥” सूर्य के मकरगत होने पर देवता, दानव, मनुष्य, किन्नर आदि विविध वर्गों के लोग प्रयागराज में एकत्र होकर त्रिवेणी संगम में अवगाहन करते हैं और अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान संपादित करते हैं। इस अवसर पर एकत्र हुए मुनि समाज द्वारा होने वाले ज्ञान-सत्र और उससे प्रकट हुई श्रीरामकथा का भी वर्णन इस प्रसंग में प्राप्त होता है।
मकर संक्रांति के अवसर पर तीर्थजल में, विशेषतया संगम में स्नान, तिल-तंदुल तथा घृत आदि का दान परंपरा से होता आया है। त्रिवेणी संगम के अतिरिक्त गंगा-सागर संगम में मकर संक्रांति का स्नान विशेष प्रचलित है। यहां वर्ष भर की सर्वाधिक भीड़ इसी अवसर पर होती है। धार्मिक विधियों के अंतर्गत तिल का दान इस अवसर विशेष पुण्यप्रद कहा गया है। इतना ही नहीं छह प्रकार से तिल का उपयोग इस अवसर पर स्मृतियों में बताया गया है। तिल से स्नान, तिल का उबटन, तिल द्वारा तर्पण, तिल का होम, तिल का दान एवं भोजन परम पुण्यप्रद कहे गए हैं-
‘तिलोद्वर्ती तिलस्नायी शुचिर्नित्यं तिलोदकी।
होता दाता च भोक्ता च षट्तिली नावसीदति॥’
आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक स्तरों पर समायोजित मानव-जीवन में मकर संक्रांति भारतीयता का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व करता हुआ पर्व है। समय की चाल और ऋतुओं के प्रभाव को पहचानने तथा अपने समग्र पर्यावरणीय ताने-बाने के साथ जीवन को अनुकूलित करने की दृष्टि इस पर्व को विशिष्ट बनाती है।
अपने शुद्धीकरण की परंपरा स्नान बनकर, खाने से पूर्व खिलाने की प्रतिबद्धता दान बनकर तथा पुण्यपर्वों में सहकारिता का विज्ञान हमारी दिव्यता के साझा भाव का द्योतक बनकर सामने आता है। सूर्य की गतिमयता से व्यक्त होने वाला संक्रांति-पर्व हमें जीवन की गतिमयता तथा राशियों के भिन्न-भिन्न प्रभावों द्वारा जीवन की परिवर्तनशीलता के सहज स्वभाव की ओर भी उन्मुख करता है।