Exclusive: 13 साल तक कोमा में रहे हरीश राणा पर बनेगी बायोपिक, मुंबई के एक फिल्म राइटर ने वकील से जताई इच्छा
गाजियाबाद के हरीश राणा, जो 13 साल कोमा में रहे, उनकी जिंदगी पर अब बायोपिक बनेगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने और पिता द्वार ...और पढ़ें

कोमा में सो रहे हरीश राणा को निहारते उनके माता-पिता। फाइल फोटो

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शाहनवाज अली, गाजियाबाद। 13 वर्षों तक कोमा में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करते रहे गाजियाबाद के हरीश राणा की कहानी अब सिर्फ अदालतों और अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगी। परोक्ष इच्छामृत्यु को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद हरीश राणा की जिंदगी पर बायोपिक बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। मुंबई के एक लेखक ने इस संवेदनशील विषय पर फिल्म निर्माण की इच्छा जताते हुए हरीश के अधिवक्ता मनीष जैन से संपर्क किया है।
न्यायपालिका के लिए भी एक कठिन परीक्षा
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को दिल्ली स्थित एम्स के पैलिएटिव केयर वार्ड में भर्ती है। वहीं, हरीश के पिता अशोक राणा ने बेटे के अंगदान का साहसिक और मानवीय फैसला लेकर समाज को नई दिशा दी है। इन घटनाओं के बाद हरीश राणा की संघर्ष गाथा को लेकर देशभर में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष जैन ने कहा कि हरीश राणा का मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का था। 13 वर्षों तक माता-पिता और भाई द्वारा इस हालत में जीवित देखना और हर दिन उसी पीड़ा से गुजरना, न्यायपालिका के लिए भी एक कठिन परीक्षा थी।
11 मार्च 2026 का एक ऐतिहासिक दिन
11 मार्च 2026 को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दी। यह फैसला न सिर्फ एक पिता की इच्छा का सम्मान था, बल्कि 2018 के कामनकाज सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप देने वाला ऐतिहासिक कदम भी माना जा रहा है।
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बायोपिक में दिखेगा संघर्ष, संवेदना और न्याय
मुंबई के एक प्रसिद्ध फिल्म लेखक ने नाम प्रकाशित करने से मना करने पर बताया कि हरीश राणा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि भारत की न्यायिक और मानवीय चेतना पर आधारित होगी, जिसमें एक पिता की 13 साल की तपस्या, एक वकील की निश्शुल्क लड़ाई और न्यायपालिका की संवेदनशीलता ने इतिहास रचा। यह न केवल एक मार्मिक कहानी होगी, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर करेगी कि जीवन की गरिमा सिर्फ सांसों में नहीं, बल्कि सम्मानजनक विदाई में भी है। बायोपिक कानून, करुणा और मानवता के संगम की जीवंत दस्तावेज बनेगी।
हिमाचल के गांव प्लेटा से शुरू होगी कहानी
कांगड़ा जिले के जयसिंहपुर में सरी पंचायत का छोटा सा गांव है प्लेटा, जहां सन्नाटा पसरा हुआ है। इसी गांव का बेटा हरीश राणा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एम्स में असाध्य पीड़ा से मुक्ति पा रहा है। हरीश अपने तीन भाई बहनों में सबसे बड़ा है, उसकी छोटी बहन की शादी हो चुकी है जबकि छोटा भाई अविवाहित है।
हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने 1989 में दिल्ली का रुख इसलिए किया था कि बच्चों की अच्छी परवरिश हो सके। पत्नी व तीन बच्चों के साथ परिवार हंसी-खुशी जी रहा था, लेकिन हरीश राणा के साथ चंड़ीगढ़ पीजी में हादसे ने ने 13 साल तक आर्थिक और मानसिक सदमा दिया।
परिवार टूटा और हरीश की पीड़ा को देखकर दिल पर पत्थर रखकर माता-पिता ने परोक्ष इच्छामृत्यु मांगी और तीन वर्ष की जद्दोजहद के बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट से इसकी अनुमति मिली। अब हरीश एम्स में धीरे-धीरे विदाई की ओर है।
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