विचार: फिर असहाय-निरुपाय दिखी दिल्ली
यदि सरकार हालात संभालने के लिए बीते दो दिन से जो कुछ कर रही है, वह पहले करती तो शायद दिल्ली के त्रस्त और अस्तव्यस्त होने की नौबत नहीं आती।
HighLights
सीजेपी के संसद मार्च में प्रदर्शनकारियों ने की हिंसा।
पुलिस और सरकार हालात समझने में फिर चूकी।
पिछली घटनाओं से सबक न लेने पर दिल्ली त्रस्त।
राजीव सचान। कथित राजनीतिक दल काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के संसद चलो मार्च के समय प्रदर्शनकारियों ने जैसी हिंसा की, वह उनके अलावा उन सबको दिखी, जिन्हें केवल पुलिस की सख्ती दिखाई दी। इस संसद मार्च के दौरान हिंसा इसलिए हुई, क्योंकि भीड़ बेलगाम थी और उसमें छात्रों के साथ अराजक तत्व भी थे। इन तत्वों को मनमानी करने का अवसर इसलिए मिला, क्योंकि संसद मार्च का न तो कोई नेतृत्व करने वाला था और न ही भीड़ को निर्देशित करने वाला। जब दिल्ली की सड़कों पर हंगामा और हिंसा हो रही थी, तब सीजेपी के दो नेता केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात करने और उन्हें ज्ञापन देने में लगे हुए थे।
यह ज्ञापन देने में उन्हें चार घंटे से ज्यादा लग गए। जो नेता बचे थे, उनमें से एक बर्गर खाने चले गए और जो मौके पर थे, उनका इरादा भीड़ को लेकर येन-केन-प्रकारेण संसद के करीब तक पहुंचना था। वे लगभग सफल भी हो गए, लेकिन इस जबरिया कोशिश में पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी, दोनों ही बड़ी संख्या में घायल हुए। इस दौरान जिस तरह दर्जनों वाहन क्षतिग्रस्त हुए, उससे यही पता चलता है कि भीड़ में हिंसा फैलाने वाले भी शामिल थे और इसकी तैयारी से आए थे। प्रदर्शनकारियों की भीड़ में ऐसे तत्व हों तो हिंसा से बचना संभव नहीं होता। यही दिल्ली में हुआ-बीते सात साल में तीसरी बार। जितना यह सही है कि सीजेपी के संसद मार्च के दौरान पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे और लाठी चार्ज किया, उतना ही यह भी कि भीड़ ने अराजकता का सहारा लिया और जमकर पथराव किया। स्पष्ट है कि पुलिस न तो भीड़ का अनुमान लगा सकी और न ही उनके इरादों का। कुछ ऐसा ही 2019-20 में शाहीन बाग धरने के समय हुआ था और 2021 में किसान आंदोलन और खासकर गणतंत्र दिवस पर उनकी ट्रैक्टर रैली के वक्त भी।
नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के खिलाफ शाहीन बाग में एक मुख्य सड़क को घेरकर करीब सौ दिन तक धरना दिया गया था। इस धरने के कारण ही दिल्ली में तब भीषण दंगा हुआ, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप राजधानी में थे। इस दंगे का पहला शिकार बने थे कांस्टेबल रतन लाल। इस दंगे में 50 से ज्यादा लोग मारे गए थे। इनमें एक आइबी कर्मी अंकित शर्मा भी थे। उनकी हत्या के आरोप में आम आदमी पार्टी के पार्षद रहे ताहिर हुसैन को हाल में दोषी ठहराया गया है। वही ताहिर, जिसे मीडिया के एक हिस्से के साथ अन्य अनेक ने निर्दोष होने का सर्टिफिकेट दे दिया था। ऐसे ही सर्टिफिकेट तब बांटे गए थे, जब किसान आंदोलन के दौरान 26 जनवरी को कथित किसानों ने दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकाली थी। इस रैली में शामिल अराजक ट्रैक्टर सवारों ने लाल किले पर धावा बोल दिया था। उस समय करीब सौ पुलिस वाले पीटे गए थे। तब भी अराजक भीड़ के सामने पुलिस और प्रशासन के साथ मोदी सरकार असहाय सी दिखी थी।
यह भी याद रखें कि शाहीन बाग धरने पर बैठे लोगों और किसान आंदोलनकारियों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ नहीं किया था। जो किया भी था, वह समस्या बढ़ाने वाला रहा। उसने शाहीन बाग में धरनारत लोगों से बातचीत के लिए एक समिति गठित कर दी थी। इसी तरह तीन कृषि कानूनों की वैधानिकता जांचे बिना उनके अमल पर रोक लगा दी थी। इससे आंदोलनकारियों और उनके समर्थकों में संदेश गया कि उनका पक्ष सही है और फिर वे करीब एक साल तक दिल्ली को एक तरह से बंधक बनाकर बैठे रहे। वे तब लौटे, जब मजबूत मानी जाने वाली मोदी सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी। इस बार क्या होगा, कहना कठिन है, क्योंकि सीजेपी समर्थक अब भी जंतर-मंतर पर जुटे हैं। इसी के साथ पंजाब के किसान संगठनों को अचानक यह पता चला कि अमेरिका के साथ संभावित व्यापार समझौते में उनके हित की अनदेखी हो सकती है, इसलिए वे दिल्ली जाने को मचल उठे।
चूंकि संसद का सत्र चल रहा है, इसलिए विपक्ष को भी नीट पेपर लीक कांड के साथ अन्य मुद्दों पर सरकार को घेरने का मौका मिल गया है। अब उसके पास एक नया मुद्दा सीजेपी के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा का भी है। विपक्ष को यह मौका इसलिए मिला, क्योंकि पहले तो सरकार ने जंतर-मंतर पर दिए जा रहे धरने को कोई भाव नहीं दिया और जिस दिन संसद सत्र शुरू होने वाला था, उस दिन उसे यह याद आई कि सीजेपी नेताओं से बात करनी चाहिए। आखिर यह काम पहले और खासकर उस दिन क्यों नहीं हो सकता था, जब अनशन कर रहे लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से उठाकर अस्पताल में भर्ती कराया गया था?
इसमें कोई दो राय नहीं कि नीट पेपर लीक कांड ने छात्रों को उद्वेलित किया और सीजेपी को सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की एक अवांछित टिप्पणी के बहाने कटाक्ष के तौर पर ही सही, खुद को राजनीतिक दल में तब्दील करने का मौका मिला, पर अब इस मौके को हर कोई भुनाने को तैयार है। सरकार इसका सामना कैसे करती है, यह वही जाने, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि वह हालात को भांपने में एक बार फिर चूकी। इसकी ही कीमत दिल्ली ने चुकाई। यदि सरकार हालात संभालने के लिए बीते दो दिन से जो कुछ कर रही है, वह पहले करती तो शायद दिल्ली के त्रस्त और अस्तव्यस्त होने की नौबत नहीं आती।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)





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